श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “भूमा पुरुष”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 80 !!
भाग 2
आइए मेरे नर नारायण !
मुस्कुराते हुए उन प्रेमपुरुष ने श्रीकृष्ण और अर्जुन का स्वागत किया ।
अर्जुन तो देखता रह गया ……ये तो मेरे श्रीकृष्ण की तरह ही हैं ….अर्जुन श्रीकृष्ण को देखता है फिर उन पुरुष को …..मनमोहिनी मुस्कान थीं उन पुरुष की …….पीताम्बर भी धारण कर रखी थी उन्होंने ….वो बस दोनों को देख रहे थे ।
कुछ देर में उनकी मधुर वाणी गूंजी ….”धर्म की रक्षा के लिए मेरे ही स्वरूप ने अवतार लिया था ….तुम मेरे ही स्वरूप हो ।
“अब तो अवतार कार्य पूर्ण होने को आया है ….अधर्मियों का भी संहार तुमने कर दिया है …
अब आजाओ मेरे पास ……हे नर नारायण ! “
ये कहते हुए फिर श्रीकृष्ण और अर्जुन को वो पुरुष निहारने लगे थे ।
“अर्जुन ! आगे आओ”…….उन पुरुष की बात सुनते ही अर्जुन आगे आगये….
सामने से उन्हीं ब्राह्मण के दस पुत्र प्रकट हो गए थे ….
अर्जुन आनंदित हो उठे …..पर आप ब्राह्मण के दस पुत्रों को क्यो यहाँ लाए ?
अर्जुन ने इतना पूछ ही लिया था ।
“मैं अपने अवतार नर नारायण यानि तुम श्रीकृष्ण अर्जुन को देखना चाह रहा था….इसलिए मैंने ये लीला की …..इस लीला को मेरे स्वरूप नारायण समझते हैं …….इतना कहते ही वो पुरुष श्रीकृष्ण की और देखकर मुस्कुराए ….अंजलि बांधे खड़े थे श्रीकृष्ण ……उनका मुस्कुराना क्या हुआ कि वो मण्डल ही नेत्रों से ओझल हो गया था ।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण को देखा और अपने साथ खड़े उन ब्राह्मण पुत्रों को …….
ये कौन थे ? अर्जुन ने वापस लौटते हुये श्रीकृष्ण से पूछा था ।
“भूमा पुरुष”…….श्रीकृष्ण बोले ।
भूमा पुरुष ? अर्जुन का प्रश्न था ।
भूमा माने असीम, भूमा माने अखण्ड सत्ता ……श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया ।
अर्जुन कुछ समझ नही पा रहा था …तब श्रीकृष्ण ने कहा …मूढ़ हैं वे लोग जो अपनी सीमित बुद्धि से असीम को समझने का प्रयास करते हैं …अर्जुन ! गोलोक बिहारी श्रीकृष्ण ही मूल हैं …वो अवतारी हैं …..हम उनके अवतार हैं । वो नित्य लीलाबिहारी हैं ….उनकी लीला “गोलोक धाम” में अनादि काल से सतत चलती ही रहती है । उनकी लीला में कभी कोई विक्षेप नही होता ।
मैं कुछ समझ नही पा रहा …..अर्जुन को सच में कुछ भी समझ में नही आरहा था ।
पर श्रीकृष्ण भी इससे ज़्यादा कुछ बोले नही ।
जीव अहंकार क्यो करता है …..हे केशव ! इस अनन्त ब्रह्माण्ड में हमारी सत्ता कहाँ है ।
अनन्त अनन्त ब्रह्माण्ड हैं उनमें अनन्त अनन्त देव हैं ….उनमें भी देवों के भी देव विराजे हुए हैं ….क्या इन सब को ये जीव अपनी तुच्छ बुद्धि से समझ पाएगा ।
श्रीकृष्ण मुस्कुराते रहे ……और कुछ ही समय में , द्वारिका पहुँच गए थे ।
ब्राह्मण को उनके पुत्र सौंप दिए अर्जुन ने …..ब्राह्मण ने गदगद भाव से अर्जुन को भूरी भूरी आशीष दिया ।
पर अर्जुन के मन में अभी भी उन भूमा पुरुष की बातें प्रेम प्रकट कर रही थीं ।
नित्य गोलोक बिहारी श्रीकृष्ण …..वही अवतारी हैं …….अर्जुन ने अपनी बुद्धि पर ज़ोर डाला ….किन्तु ….हमारी सीमित बुद्धि क्या समझेगी उन्हें ।
अर्जुन के मन का अहंकार अब पूर्ण रूप से गलित हो गया था …….
शेष चरित्र कल


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