श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “द्वारिका में ऋषि दुर्वासा”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 81 !!
भाग 2
दुर्वासा रथ के पास गए और दूसरी आज्ञा दे डाली थी ……”रथ से अश्वों को हटाया जाए”…..
दुर्वासा की हर आज्ञा का पालन रुक्मणी या स्वयं श्रीकृष्ण को ही करना था ।
हटा दिए अश्व……..कृष्ण ! अब तुम और स्वयं रुक्मणी अश्वों के स्थान में जुतो ।
ये क्या आज्ञा थी ? श्रीकृष्ण पुत्र प्रद्युम्न को क्रोध आया दुर्वासा के ऊपर ……किन्तु श्रीकृष्ण ने रोक दिया ।
हाँ , तुम राजाओं को भी तो पता चले कि बेचारे मूक अश्वों को कितना कष्ट होता है ।
लगो तुम दोनों रथ में ……..और मेरे हाथों में चाबुक दो । दुर्वासा कठोर थे ही और कठोर बन कर बोले थे आज ।
वही किया …..रथ में ये अत्यन्त कोमल अंग वाले श्रीकृष्ण जुते, और दूसरी और कोमलांगी रुक्मणी ।
दुर्वासा रथ में बैठ गए थे ……..और अट्टहास करते हुये बोले ….खींचो रथ को ….और श्रीकृष्ण और रुक्मणी रथ को खींच रहे हैं ।
इधर उधर रथ क्यो जा रहा है …..मारा चाबुक दुर्वासा ने …….रथ दौड़ रहा है …..अश्व के स्थान पर रुक्मणी कृष्ण हैं …..और मार्ग पर ये दोनों रथ को लेकर दौड़ रहे हैं …..द्वारिका वासी इस दृश्य को देखकर विकल हुए जा रहे हैं …..पीठ से रक्त बहने लगा था श्रीकृष्ण और रुक्मणी के ।
ये अत्याचार है …..हमारे द्वारिकानाथ को इतना कष्ट देने वाला ये कौन है …….द्वारिका वासी कहते ….पर मन ही मन में ……एक श्राप दे दें दुर्वासा तो पूरा का पूरा वंश खत्म है ….इसलिए कोई बोल नही रहा ….दुर्वासा के क्रोध से पूरा विश्व जगत परिचित है ।
आप कुछ कहते क्यो नही …..ये अत्याचार है …..श्रीकृष्ण पुत्र प्रद्युम्न ने बलराम जी को कहा था ।
बलराम जी रथ के पास जैसे ही पहुँचे ….. दुर्वासा रथ से नीचे उतर गए ।
श्रीकृष्ण और रुक्मणी का कन्धा पूरा छिल गया था रक्त से , वस्त्र भींग गए थे ।
दुर्वासा ऋषि मुस्कुराए ….और श्रीकृष्ण के कन्धे में हाथ रखा …..रुक्मणी के मस्तक में हाथ रखा…..शिवांश हैं ऋषि दुर्वासा …श्रीकृष्ण और रुक्मणी को दुर्वासा ऋषि के छूते ही सब ठीक हो गया था ।
मैं तुम दोनों से बहुत प्रसन्न हूँ …….तुम्हारी सेवा धन्य है …..किन्तु कृष्ण ! मेरी एक सेवा और करनी है अब तुम दोनों को ….किन्तु ये कठिन सेवा है , ऋषि ने कहा ।
आज्ञा भगवन् ! कृष्ण सदैव तत्पर है आपकी सेवा में ।
सहर्ष श्रीकृष्ण के साथ रुक्मणी ने भी अपना मस्तक झुका लिया था ।
शेष चरित्र कल –


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