श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “उद्धव गीता – “अपना उद्धार करो” , उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 88 !!
भाग 1
तात ! मुझे उपदेश देते हुए समस्त मनुष्य जाति के प्रति एकाएक भगवान श्रीकृष्ण के हृदय में करुणा उमड़ पड़ी थी….वो अत्यन्त करुणार्द्र होकर बोल उठे थे
उद्धव ने विदुर जी को कहा था ।
उद्धव ! वो मनुष्य अपने आत्मा की हत्या कर रहा है …..जो दुर्लभ मनुष्य देह प्राप्त होने के बाद भी , मेरी अनुकूलता की वायु चलने के बाद भी …सदगुरु रूपी केवट मिलने के बाद भी ….जो अपने उद्धार का उपाय न करे । भगवान श्रीकृष्ण करुणा से भर कर बोल रहे थे ।
असंख्य योनियाँ हैं …..उद्धव ! कीट पतंग से लेकर पर्वत तृण इन सबके सामने मनुष्य कितना है ?
पर क्या कीट पतंग तृण आदि मनुष्य के ही कर्म का परिणाम नही है ?
मनुष्य तो वो चौराहा है जिससे नर्क का मार्ग भी जाता है , स्वर्ग का भी और मुक्ति का भी …..आप मनुष्य देह से देवता भी बन सकते हैं , दानव भी और पशु भी, ये स्वतन्त्रता मात्र मनुष्य को ही प्राप्त है ….करुणानिधान की करुणा आज बोल रही थी ।
उद्धव ! पशु और मनुष्य का भेद तो समझो ….मनुष्य देह प्राप्त करने के बाद कमसे कम मनुष्यता को तो उपलब्ध हो जाओ । आज भगवान हमको सावधान कर रहे थे ।
आहार , निद्रा, भय, और मैथुन ……ये तो पशुओं में भी होता है उद्धव !
और देखा जाए …तो ये सब पशुओं में और व्यवस्थित होता है …..
पशु , पेट भरने के बाद वो खाने की लालसा नही करता ….न वो कल के खाने की चिन्ता में भटकता है …आज पेट भर गया …कल का कल ……किन्तु मनुष्य ! पेट भरने के बाद भी वो और खाता है …..फिर अस्वस्थ होकर पड़ा रहता है ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल


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