श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “प्रभास क्षेत्र की ओर”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 90 !!
भाग 2
नाथ ! नाथ ! ये क्या हो रहा है ?
सामने से दारुक सारथी रोता हुआ आया और भगवान के श्रीचरणों में गिर गया ।
तुम शोक क्यो कर रहे हो …..शान्त हो और रथ लेकर आओ ….मुझे आज सभा में जाना है ।
अनिरुद्ध को भेज दिया भगवान ने , यादवों को सभा में बुलाने के लिए …..रथ शीघ्र आगया …मैं दूर खड़ा था …..मेरी और भगवान ने देखा ….फिर नयनों के संकेत से कहा …आओ , अभी मेरे साथ चलो ।
मैं दौड़ कर भगवान के साथ रथ में बैठ गया था …दारुक ! ये जो हो रहा है ….ये होगा । और और बढ़ेगा ….ये द्वारिका समुद्र में डूब जाएगी …..भगवान कितने शान्त भाव से अपने सारथी से बातें कर रहे थे …..दारुक रोते रोते रथ चला रहा था ….उसका मुख अश्रुओं से भर गया था ।
हे यादवों ! लगता है कलियुग के आगमन की वेला आगयी है ….इसलिए ये अपशकुन शुरू हो गए हैं …….काल स्वयं ईश्वर होता है ….उस काल की गति को कोई रोक नही सकता ।
मैं सुन रहा था …..सुधर्मा सभा में आकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने यादवों को संदेश देना शुरू कर दिया था …….काल ये स्वयं हैं ….ये सब उनकी ही तो लीला थी …..मुझे हंसी भी आ रही थी और रोना भी आरहा था ।
भगवान आगे बोले थे ….हे यदुवंशियों ! सावधान ! हमें ये नही भूलना चाहिए कि जिस द्वारिका में हम हैं ….वो समुद्र में है ……समुद्र के मध्य में है । समुद्र कभी भी इस द्वारिका को अपने भूगर्भ में समा ले सकता है ……..
यदुवंशी लोग भगवान के मुख से ये सब सुनकर काँप उठे थे ।
क्या आज्ञा है आपकी ? सबने एक स्वर में भगवान से ही पूछा ।
हम अब सब लोग होकर प्रभास क्षेत्र में चलते हैं ……वहाँ सरस्वती का स्रोत है ….बड़ी पावन हैं वो …वहाँ दान पुण्य यज्ञादि करने से मंगल होता है …..इसलिए मेरी बात मानों हम लोग द्वारिका से निकलें और प्रभास के लिए चलें ….कुछ धनादि ले लो …ताकि वहाँ जाकर दान पुण्यादि हम लोग कर सकें ।
भगवान श्रीकृष्ण की बातें सुनकर सब लोग चलने के लिए तैयार हो गए थे …..अक्रूर जी ने महारानियों के चलने की व्यवस्था तुरंत बना दी थी …बाक़ी यादव लोग तो अश्व रथ या अन्य साधनों से प्रभास की ओर जा ही रहे थे ।
दारुक के साथ जब भगवान रथ में बैठे और वो भी जब जाने लगे तब मेरी ओर भगवान ने देखा और इस बार फिर कहा ….तुम अब बद्रीनाथ चले जाओ ।
मैं सिर झुका कर खड़ा रहा ।
भगवान का वो गरूण ध्वज रथ तो चला गया किन्तु …पीछे से बलराम जी आए और उन्होंने मुझे अपने रथ में बैठने के लिए कहा …मैं कुछ समझ नही पा रहा था कि ये हो क्या रहा है…मैं रथ में बैठा और बलराम जी ने मेरी ओर देखकर इतना ही कहा – उद्धव ! अभी मत जाओ ……क्यो की लीला धारी पता नही क्या लीला करने वाले हैं । इनको सब पता था कि भगवान ने मुझे क्या आज्ञा दी है ….बस संकर्षण के मुखारविंद को ही देखता रहा मैं ।
शेष चरित्र कल –


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