श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “भगवान बलभद्र का स्वधाम गमन” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 92 !!
भाग 1
ये , ये तुम लोग ऐसे मूढ़ कैसे हो गए हो ….तुम्हारा विवेक कहाँ गया ….ये राक्षसी स्वभाव के तुम लोग कैसे हो गए …..ओह ! तुम लोग तीर्थ में आकर मदिरा का पान कर रहे हो ….छोड़ो, नही तो मैं तुम सब को अभी भस्म करता हूँ …..बलभद्र जी कूद पड़े थे उस भयानक समर में ……समस्त यदुवंशी एक दूसरे को मार ही रहे थे ….वहाँ कौन सुनता बलराम जी की इस बात को …..पर बलभद्र जी को अब क्रोध आगया था …..साम्ब को पकड़ा , उसे रोकने का प्रयास किया तब तक सत्यभामा के पौत्र सत्या ने तलवार का प्रहार किया साम्ब के ऊपर …..उसके हाथ में लगी …..रक्त की धारा बह चली …..साम्ब ने मदिरा का सेवन उन्मुक्त रूप से किया था ….इधर देखा न उधर बलराम जी को झटक कर दूर किया …..ओर येरका वनस्पति से अपने ताऊ बलराम जी को ही मारने के लिए दौड़ा …….साम्ब ऐसा करेगा सोचा नही था बलराम जी ने …..उन्हें क्रोध आया ……उन्होंने भी उस घास को उखाड़ा और जैसे ही ……ओह ! ये तो शापित घास है …..ऋषियों के शाप के संस्कार इस घास में हैं …….भगवान बलभद्र को समझने में देरी नही लगी …..साम्ब अक्रूर से उलझ गया था अब ।
घास को फेंक दिया बलभद्र जी ने …….वो सब कुछ समझ गए थे ।
नाथ ! बलराम जी को साम्ब मारने के लिए दौड़ा है ।
दारुक ने बिलखते हुए भगवान को सूचना दी ।
इस सूचना को पाते ही भगवान श्रीकृष्ण उठ गए …..और तेज चाल से चलते हुए कुटिया से बाहर आगये थे ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –
