श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! व्याध ने जब बाण मारा – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 93 !!
भाग 2
ये लोग सत्ता और सम्पत्ति के मद में अन्धे हो गए हैं ….ओह ! ये लोग अब आपस में लड़ कर मर रहे हैं …..व्याध ने जब देखा कि उसके क्षेत्र में आकर रक्त पात कर रहे थे यदुवंशी ….तब ये और चिढ़ उठा था ….”मरना था तो अपने ही द्वारिका में मरते …..अब तो मृग कहाँ मिलेंगे …भाग गए होंगे इन यादवों के युद्ध से …आज भी मेरे परिवार को आहार नही मिलेगा”…..वो दुखी होता हुआ व्याध वन की ओर चला गया था ….
“भगवान श्रीकृष्ण वो तो करुणानिधान हैं…..उनको कितना कष्ट होगा ये सब देखकर” ।
वो व्याध यही सब सोचता हुआ यादवों के कृत्य से दुखी होता हुआ जा रहा था ……और सबसे बड़ा दुःख तो इसका ये की …..शिकार नही मिला ….
यहाँ भी कहाँ पशु मिलेंगे ….मैं बेकार में परिश्रम कर रहा हूँ …..अपने धनुष को उसने कंधे में रख लिया था ….बाण को भी रखने के लिए तैयार ही था कि ….
वो एकाएक खुश हो गया…..झरमुट से कुछ हिला था ……
धनुष व्याध ने कंधे से उतारा ……बाण को लगाया ….और ……..
हिरण ही है ….वो सावधानी से आगे बढ़ने लगा था …..
दूसरी बार फिर हलचल हुई ……तो उस व्याध का बाण छूटा …..
बाण सीधे लगा था ….वो दौड़ा ….बड़ी फुर्ती से दौड़ा था वो कहीं वो आहत मृग भाग न जाए ।
पर जैसे ही वो पास में गया …….वो तो काँप उठा …..ओह ! मैंने ये क्या किया ?
अब आओ न …..प्यारे , अपनी लीला को समेट लो ।
हाँ , राधे ! मैं आरहा हूँ …….
मैं भी अब जा रही हूँ ….गोलोक में मैं प्रतीक्षा करूँगी …..अब आओ ।
नाथ ! मैं पापी हूँ ……मैंने ये क्या किया आपके चरणों में , मैंने बाण मारा ।
क्रंदन सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने नेत्र खोले …उन्हें तो पता भी नही था कि उनके चरणों में किसी ने बाण भी मारे हैं ।
क्या हुआ ! तुम रोते क्यो हो ……व्याध से वो करुणानिधान पूछ रहे थे ।
मैंने आपके चरणों में बाण मार दिया ……
तो क्या हुआ , कोई रोष नही …शान्त भाव से बोले जा रहे थे भगवान श्रीकृष्ण ।
हाँ हृदय में बाण मारा होता तो मुझे कष्ट होता ….क्यो की हृदय में मेरे श्रीराधा विराजमान हैं ।
उठो व्याध ! उठो ! शोक न करो …..मेरी ही इच्छा से ये सब हो रहा है ।
पर मैं नर्क जाऊँगा …..मैंने आपको बाण मारा …..वो बिलख रहा था ।
नही ….तुम मेरे धाम जाओगे ….देखो …..तभी देखते ही देखते नभ से एक विमान उतरा …देवों ने पुष्प वृष्टि की …..आहा ! करुणानिधान ने उसे अपने धाम में भेज दिया था ।
उद्धव रो उठे …….विदुर जी की हिलकियों से रो उठे थे …..वो बोले ….कम् वा दयालुम् शरण् ब्रजेम …..शरण में जाने योग्य यही हैं उद्धव ! येसा दयालु और कौन है ।
शेष चरित्र कल –


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