श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! विदा – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम 94 !!
भाग 1
दारुक !
भगवान श्री कृष्ण ने अब अपने प्रिय सारथी को अपने पास बुलाया था । ये दारूक मथुरा से ही भगवान श्री कृष्ण के साथ था ……प्रिय था भगवान का ये ।
दारुक दौड़ा हुआ आया उसके नेत्रों से अश्रु अभी भी अविरल बह रहे थे । नाथ ! चरणो में वो गिर गया था ।
मेरे प्रिय दारुक , तुम अब द्वारिका जाओ ,…..
क्यों नाथ , मैं आपको छोड़कर कहीं नही जाऊंगा ।
बालक की तरह बिलख उठा था ये ।
द्वारिका डूब रही है ….तुम जाओ और जो भी बचे उसे बचा लो…. गम्भीर बनकर बोल रहे थे द्वारकेश ।
मैं बचाऊँगा ? ये दारूक आपकी द्वारिका बचाएगा ।
मेरी आज्ञा नही मानोगे ? आज तक तुमने मेरी कोई आज्ञा टाली नही है फिर आज क्यों ?
सेवक धर्म कठोर होता है ….. श्री कृष्ण का ये सारथी इस बात को समझता है ……वो उठा , अपने अश्रुओं को पोंछा हृदय को पाषाण के समान कठोर बना लिया ।
सामने रथ खड़ा था उस रथ की ओर देखा ….उस गरुण ध्वज के अश्व भी आंसू बहा रहे थे ……. पैदल ही जाने लगा रथ को भगवान के पास छोड़ कर ।
दारुक ! रथ में जाओ । भगवान की फिर कठोर आज्ञा गूंजी ।
पर रथ तो आपको चाहिए न ,नाथ ! नही मुझे अब रथ की कोई आवश्यकता नहीं है …..इस भगवान की वाणी ने दारुक का हृदय बिंध दिया था ।
वो भगवान के चरणो को देखता रहा …..भगवान फिर बोले ….रथ में बैठो और जाओ ।
आज्ञा , अपने स्वामी की आज्ञा ….. दारुक रथ की ओर बढ़ा अश्व मना कर रहे थे …. दारुक ये सब देखकर फिर बिलखने लगा …..पर भगवान ने संकेत से कहा ….जाओ ।
दारुक रथ में बैठा ….और जैसे लगाम खींची …. ओह ! ये क्या …..अश्व तो उड़ चले थे …..संभालना चाहा दारुक ने किंतु आज अश्व उससे संभले नही …..वो उड़ते चले गए ….अंतरिक्ष को पार कर गए थे ….पितृ लोक होते हुए स्वर्ग और सत्य लोक फिर तो ब्रह्माण्ड का भेदन करते हुए …..स्थूल देह दारुक को कबका छूट चुका था …उसे पता ही नही चला , उसने जब देखा तब वो रथ से एक दिव्य लोक में पहुंच चुका था …. दारुक ने जब ध्यान से देखा तो वो चकित था . ओह ! ..भगवान के दिव्य लोक बैकुंठ ! !
तात ! गोलोक धाम में न अश्वों की आवश्यकता थी न चतुर्भुज रूप श्री कृष्ण के उपासक दारूक की इसलिए इसे बैकुंठ में ही भगवान श्री कृष्ण ने भेज दिया …..
दारुक अब भगवान नारायण के सामने नतमस्तक था …. श्री कृष्ण उसे नारायण के रूप में ही दिखाई दे रहे थे ।
अर्जुन ! मेरे प्रिय पार्थ !
भगवान ने अब अर्जुन को अपने पास बुलाया ।
हे भगवन् ! मैं अब क्या करूं …मेरे लिए क्या आज्ञा है ?
क्रमशः …
शेष चरित्र कल


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