!! इति श्रीकृष्णचरितामृतम् !! – भाग 1 : Niru Ashra

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!! इति श्रीकृष्णचरितामृतम् !!

भाग 1

प्रभास क्षेत्र एक सौ आठ कोस में फैला हुआ था …ये समुद्र के तट में है …द्वादश ज्योतिर्लिंग में प्रथम सोमनाथ भगवान यहीं विराजे थे ……वसुदेव महाराज उग्रसेन आदि ने जब सुना की यदुवंशियों में आपस में ही कलह प्रारम्भ हुआ फिर उसी कलह ने एक भीषण संग्राम का रूप ले लिया है , सुनते ही ये लोग महादेव की अर्चना करने के लिए यहाँ आगये थे …….भगवान शिव की अर्चना से यदुवंश का मंगल हो ध्येय यही था । भगवान श्रीकृष्ण की रानियों को भी इधर ही ठहराया गया था ….किन्तु उन्हें यादवों के आपसी युद्ध और भगवान के स्वधाम जाने की कोई सूचना नही थी ।

अर्जुन आया …कहाँ हैं पितु वसुदेव जी ! वो घबड़ाया हुआ था …उसके मुख का तेज आज अत्यन्त मलीन हो गया था ….उससे ठीक से बोला नही जा रहा था …”शिवालय में हैं आर्यपुत्र”माता देवकी ने ये सूचना अर्जुन को दी थी …पर अर्जुन तुम ठीक तो हो ना ! माता देवकी के इस बात का बिना उत्तर दिए अर्जुन शिवालय की ओर दौड़ा …उससे आज गाण्डीव भी नही उठाया जा रहा था । ध्यान में बैठे हुए हैं वसुदेव जी …अर्जुन ने जाकर उन्हें झकझोरा ….

गम्भीर वसुदेव जी ने नेत्र खोलकर संकेत से पूछा ……सब ठीक तो है ?

कुछ ठीक नही है …सब कुछ समाप्त हो गया …भगवान श्रीकृष्ण परमधाम को चले गए …इतना कहकर अर्जुन वसुदेव जी के चरणों में गिर गया था ।

ऐसी हृदय विदारक सूचना ! ओह , वहाँ समय नही लगा ….वसुदेव जी का देह क्षण में ही धरती में गिर गया ….चेतन निकल गया था उनके देह से ।

अर्जुन की स्थिति देखकर देवकी माता भी दौड़ी पीछे पीछे आगयीं थीं …..अर्जुन के मुख से जब ये सुना उनका प्राण प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण चलागया….और सामने ही उनके पतिदेव ने देहोत्सर्ग कर लिया देवकी माता का भी शरीर वहीं छूट गया था ।

अर्जुन कुछ समझ नही पा रहा है ……उसका मस्तक असह्य पीड़ा का अनुभव कर रहा है….वो बैठ कर चीखने लगा था …..एक क्षण को तो उसे भी लगा कि मैं भी समुद्र में कूद कर देह त्याग दूँ किन्तु भगवान की आज्ञा का क्या होगा । “तू सबको सम्भालना अर्जुन”….यही तो आज्ञा थीं मेरे नाथ की ।

अपने केशों को नोचते हुये वो रोने चीखने चिल्लाने लगा था ।

किन्तु उसे सम्भालना था, सब को सम्भालना था ।

उग्रसेन रो रहे थे ……अर्जुन अब वहाँ से रानियों के पास गया ।

रुक्मणी महारानी ….जाम्बवती, सत्यभामा , कालिन्दी , मित्रविंदा आदि सब दौड़ीं अर्जुन के पास …..क्या हुआ अर्जुन ! सुना है आपस में यदुवंशी लड़ रहे हैं ….ये प्रश्न भी सत्यभामा ने पूछा था …..रुक्मणी तो शान्त भाव से बस खड़ी थीं ….अर्जुन रोने लगा ….सब समाप्त हो गया ……अर्जुन यही कह रहा था ।

हुआ क्या ? आगे बढ़कर रुक्मिणी ने शान्त और गम्भीरता से प्रश्न किया , अर्जुन कुछ बोले उससे पहले ही रुक्मणी ने फिर प्रश्न किया था – मेरे नाथ कहाँ हैं ?

अर्जुन की स्थिति पागलों जैसी हो गयी थी ……

“वो हम सबको अनाथ करके परम धाम चले गए”….अर्जुन चीखते हुए आकाश की ओर देखकर बोला ।

रुक्मणी शान्त भाव से चल पड़ीं ……उनके मुख मण्डल पर इतना तेज आगया था कि अर्जुन देख भी न सका था ….रुक्मणी के पीछे अन्य रानियाँ भी चल रही थीं ।

नही नही , आप लोगों को कुछ नही करना है …..आप सब रुकिए ! अर्जुन हाथ जोड़ रहा है बिलख रहा है ….पर ये रानियाँ अब किसी की सुनने की स्थिति में नही हैं ।

क्रमशः ….

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