!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 7 !!
श्रीराधारानी का प्राकट्य
भाग 3
एक कहता है …………हे भान महाराज ! कल शाम को मैनें गड्डा खोदा था ………..मुझे मिट्टी की जरूरत थी …….तो मैने खोदा …….पर मैं क्या बताऊँ ……मुझे तो चमकते हुए पत्थर मिले ……….मेरी पत्नी कह रही थी……ये हीरे हैं ……ये मणि हैं ।
.मार्ग के लोग बृषभान को अपनी अपनी बातें बताते हुए चल रहे हैं ………और क्यों न बताएं ……..पृथ्वी नें रत्नों को प्रकट करना शुरू कर दिया था ।
एक ग्वाला दौड़ा आया ………महाराज बृषभान की जय हो !
रुक गए बृषभान जी ………..क्या हुआ कुछ कहना है ?
हाँ ………रात में ही बिजली गिरी था ……….मैं खेत में था …..डर गया ……..जहाँ बिजली गिरी ……वहाँ जब मैं गया ……..तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही ।
क्यों ? क्या था वहाँ ? बृषभान नें पूछा ।
एक काली मूर्ति गिरी है ……….पता नही क्या है………उस मूर्ति में से दिव्य तेज़ निकल रहा है ………ग्वाला बोलता गया ।
कहाँ है मुझे दिखाओ …………बृषभान उस ग्वाले के साथ गए ।
उन्हें जो लग रहा था वही था ………सपना पूरा हुआ था ……..शनिदेव ही विग्रह में आगये थे ……..ये तो ? हँसे बृषभान ।
पर किसी को कुछ बताया नही …….और ये मणि माणिक्य सब यही प्रकट कर रहे थे बरसानें में । ( “कोकिलावन” जो बरसानें के पास है वहाँ विश्व् प्रसिद्ध शनिदेव का मन्दिर भी है )
प्रणाम करके बृषभान चल दिए अब स्नान को …………..पर आज बिलम्ब पर बिलम्ब हुआ जा रहा है …….स्नान नित्य करते थे ब्रह्म मुहूर्त में …..पर आज तो सूर्योदय भी होनें वाला है ।
पर क्या करें …..लोग मिल रहे हैं …..बातें करते हैं …..तो उनकी बातों का उत्तर देना , ये कर्तव्य है गाँव के मुखिया का ।
जैसे तैसे पहुँचे यमुना जी में …………….
आहा ! आज यमुना भी आनन्दित हैं …………कितनी स्वच्छ और निर्मल हो गयी हैं ………किनारों में कमल खिले हैं ……..उन कमलों में भौरों का गुँजार हो रहा है ………।
स्नान करके बाहर आये बृषभान …….और फिर नित्य की तरह ध्यान करनें बैठ गए ……….आज मन शान्त है ……आज मन अत्यन्त प्रसन्न हैं …..आज मन आनन्दातिरेक के कारण झूम रहा है ।
ये क्या ! यमुना के किनारे एक दिव्य कमल खिला है …….बहुत बड़ा कमल है ये तो ………….उसके आस पास कई कमल हैं …….उन कमल के पराग उड़ रहे हैं ……..सुगन्ध फ़ैल रही है वातावरण में ।
तभी ……उस मध्य कमल में ……बिजली सी चमकी ।
और देखते ही देखते ………..एक सुन्दर सी कन्या खिलखिलाती हुयी उसमें प्रकट हुयीं ।
उस कन्या के प्रकट होते ही ……आकाश में देवों नें पुष्प बरसानें शुरू कर दिए ………
.!! जय राधे जय राधे राधे , जय राधे जय श्री राधे !!
सब देवियों नें एक स्वर में गाना शुरू कर दिया ।
अरे ! महाराज उठिये ! उठिये ! पता है मध्यान्ह का समय हो गया है ……आप अभी तक ध्यान में बैठे हैं ?
एक ग्वाले नें आकर बड़े संकोच पूर्वक उठा दिया बृषभान को…….
उस आनन्द से बाहर आना पड़ा बृषभान को ……उठे …….चौंके….. सूर्य नारायण को देखकर ……..सच में मध्यान्ह का समय हो गया था ।
इधर उधर देखा ………उस कमल को खोजा …………पर ध्यान में ये सब घटा था ………धीरे धीरे उसी आनन्द की खुमारी में बढ़ते जा रहे थे अपनें महल की ओर बृषभान जी ।
महाराज ! महाराज ! एक दासी दौड़ी ………….
बाबा ! बाबा ! एक महल का सेवक दौड़ा ………
श्रीदामा दौड़े…..ये दो वर्ष के हो गए हैं ।
बाबा ! बाबा ! कहते हुए ये दौड़े ।
बृषभान समझ नही पा रहे हैं कि महल में ऐसा क्या हुआ ?
दौड़े वो भी महल की ओर …………….
और जैसे ही कीर्तिरानी के महल में गए …………….
कीर्तिरानी लेटी हुयी हैं………उनके बगल में एक सुन्दर अति सुन्दर कन्या खेल रही है ……….गौर वर्णी …………कमल की सुगन्ध उस कन्या के देह से निकल रही थी ………….
नेत्रों से अश्रु बह चले बृषभान के …………..आनन्दाश्रु ………।
बाहर आये ………भीड़ लग चुकी है लोगों की ……समझ में नही आरहा कि क्या करूँ ?
मुखरा मैया दीपों की कई थाल अपनें सिर में सजाकर आज नाच रही हैं …………
लोगों नें गाना नाचना शुरू कर दिया है ………..
बधाई हो ……बधाई हो ……बधाई हो ………..।
“देंन बधाई चलो आली, भानु घर प्रकटी हैं लाली”
सुन्दर सुन्दर सखियाँ बधाई लेकर चलीं भानु के महल की ओर ।
महर्षि शाण्डिल्य उस आनंदातिरेक में मौन हो गए ……क्या बोलें ?
शेष चरित्र कल –


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