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August 30, 2025 10:34 am

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सखियों के श्याम (भाग 14)-(नातो नेह को मानियत)-‘चल उजरी, अब खेलें।’ : Niru Ashra

सखियों के श्याम (भाग 14)-(नातो नेह को मानियत)-‘चल उजरी, अब खेलें।’ : Niru Ashra

सखियों के श्याम (भाग 14)

(नातो नेह को मानियत)

‘चल उजरी, अब खेलें।’

“कैसे ?”

‘तू छिप जा, मैं तुझे ढूँढू और मेरे छिपने पर तू मुझे ढूँढ़ना !’

‘अच्छा! किंतु तू ही मुझे ढूँढ़ना। मुझसे यह न होगा, तू कहीं खो जाय तो!’– उजरीने व्याकुल स्वरमें कहा।

‘अच्छा आ तू ही छिप जा! मैं अपनी आँखें मूँद कर खड़ा हूँ। —

कन्हाईने छोटी-छोटी हथेलियोंसे अपनी बड़ी-बड़ी आँखें ढाँप लीं।

उजरी अनमने मनसे छिपने चली। वह समीपकी एक झाड़ीमें ही बैठ गयी। कुछ समय बाद श्यामसुंदरने आँखें खोली और ढूँढ़ने चले। सामनेकी कुंजोंमें झाँकते हुए वे आगे बढ़े। उजरी अपने स्थानसे उन्हें देख रही थी। उसे दूर जाते देख वह व्याकुल हो उठी।

कितना सुन्दर भाई मिला है उसे! यदि वह साथ चलना चाहे तो, घर ले जाकर बाबा–मैयाको दिखायेगी। इतनी देरमें वह ऐसी हिल-मिल गयी थी, मानो जन्मसे ही उसके साथ खेलती रही हो ।

अचानक चौंक पड़ी वह
‘कहाँ गया कन्हाई?’
अपने स्थान से निकल वह आकुल स्वर में पुकार उठी—

‘कन्हाई रे कन्हाई’

कभी इस कुंज और कभी उस झाड़ीमें उसका रूँधा कंठ-स्वर गूँजता —
‘कन्हाई रे कन्हाई।’

तभी किसीने पीछेसे उसकी आँखें मूँद ली। झँझलाकर उसने हाथ हटा दिये, घूमकर देखते ही वह उससे लिपट गयी। नन्ही शुक्तियां मुक्ता वर्षण करने लगीं।

‘क्या हुआ उजरी?

मैं तो तुझे ढूँढ़ रहा था।

तू क्यों रो रही है ?’

‘मैं तो पास ही उस झाड़ीमें थी। तू क्यों दूर ढूँढ़ने गया मुझे ?’ – वह हिल्कियोंके मध्य बोली।

‘तू मुझे क्यों ढूंढ़ रही थी ?’- मैं तो तेरी पीठ पीछे ही खड़ा था। तू पुकार रही थी और मैं संग-संग चलता मुस्करा रहा था।

“ऐं!”

‘हाँ ऊजरी, सच!’

तूने ऐसा क्यों किया ?

‘मैं तुझे अच्छा लगता हूँ कि नहीं, यह देखनेके लिये।’

‘कन्हाई!’– उजरीके होंठ मुस्करा दिये, जल भरी आँखें श्यामके मुखपर टिकाकर वह बोली।

‘उजरी!’– श्याम भी उसी प्रकार पुकार उठे और दूसरे ही क्षण दोनों एक दूसरेकी भुजाओंमें आबद्ध हो हँस पड़े।

‘अब मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूँगी! कहीं फिर खो जाय तो ?’

‘मैं तुझे छोड़ कहीं जाऊँगा ही नहीं!’

‘सच ?’

‘सच!’

सच ही तो है, एक बार आँखों में समाकर यह निकलता ही कहाँ है।🌹

जय श्री राधे…

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