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August 30, 2025 11:01 am

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उद्धव गोपी संवाद(भ्रमर गीत)९ एवं १० : Niru Ashra

उद्धव गोपी संवाद(भ्रमर गीत)९ एवं १० : Niru Ashra

उद्धव गोपी संवाद
(भ्रमर गीत)
९ एवं १०

ये सब सगुन उपाधि, रूप निर्गुण है उनको।
निर्विकार,निरलेप,लगत नहीं तीनों गुन को।।
हाथ-पांइ नहिं नासिका,नेंन बेंन नहिं कान।
अच्युत जोति प्रकाश ही,सकल बिस्व के प्रान।।
भावार्थ:-
उद्धव जी गोपियों से कह रहे हैं कि ये सब सगुण उपाधि जो आप बता रहीं हैं,वह उनका निर्गुण रूप ही है। निर्विकार,निरलेप हैं।
न उनके हाथ हैं,न पांव हैं,नाक कान नैंन बैंन कुछ नहीं हैं। केवल अच्युत जोति प्रकाश ही सकल बिस्व के प्राण हैं।

जो मुख नाहिन हुतो,कहो किन माखन खायो।
पाइंन बिन,गौ संग कहौ,बन बन को धायो।।
आंखिन में अंजन दियो,गोवरधन लियो हाथ।
नंद -जसोदा पूत है,कुंवर कान्ह ब्रज-नाथ।।
सखा सुन स्याम के।
भावार्थ:-
गोपियां ऊधौ जी से पूछ रही हैं कि,ऊधौ जी यदि उनके मुख नहीं है तो फिर माखन किसने खाया और बिना पैरों के गौऔं के संग बन बन में कौन फिरता रहा।ऊधौ जी, उन्होंने अपनी आंखों में अंजन लगाया, गोवर्धन पर्वत को अपने हाथों से उठाया, वे नंद और जसोदा के पुत्र कुंवर कान्ह ही ब्रज के नाथ हैं।

शेष कल…

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