उद्धव गोपी संवाद:-
(उद्धव लीला)
गतांक से आगे:-
३१ एवं ३२
( उद्धव कौ आइ कै प्रणाम करनौं)
श्रीकृष्ण:-आओ प्रिय सखे, मैं तुम्हारौ ही स्मरण कर रह्यौ हूं।
उद्धव:-नाथ,आज आपकौ श्री मुख मलीन कैसें, चंद्रमा पै छाया कैसे।
श्रीकृष्ण:-ऊधौ सखे,ब्रज की विशेष याद आज मोकूं सताय रही है।
उद्धव:-कारण , विशेष कछु आय पर्यौ होयगौ नाथ?
श्रीकृष्ण:-कारण तुमहूं तौ जानौ हौ,आज दो महीनां सों मोकूं,मेरे ब्रज को कोई समाचार नहीं मिल्यौ है।
उद्धव:-हां ठीक है प्रभो,आप कंस वध के उपरांत अवंतिका पुरी में गुरु सान्दीपन की पाठशाला में विद्याध्ययन करिवे कूं पधार गए रहे, वहां दोय माह निवास करिकै अब लौटे हो,जब आप वहां रह्यौ करे हैं,तब नंद बाबा को एक भृत्य नितप्रति मथुरा आयकें आपकी कुशलता बूझि जातौ,और ब्रज की कुशलता सुनाय जातौ।
श्रीकृष्ण:-और मैया यशोदा मेरी सुरभी गैयांन कौ माखन देती, वाकूं दै जातौ।आज दौ महीना सों मैया को माखन नहीं खायौ है और उनको समाचार नहीं पायौ है,याही सों मेरौ चित्त विशेष व्याकुल ह्वै रह्यौ है।
उद्धव:- यथार्थ है नाथ,याद आवनो ही चहियै,जा ब्रज में आपनें प्रायः ग्यारह वर्ष की अवस्था पर्यंत नाना विधि सुखमयी लीला करी है,वा ब्रज और ब्रजवासिन की याद आवनी ही चहियै, परंतु हम यादव हू तौ आपही के जाति बन्धु हैं, आपही के परिवार परिजन हैं, यहां आपकौ कहा दुख है,जो आपकूं ब्रज में नहीं है और कहा सुख नहीं,जो आपकूं ब्रज में प्राप्त हौ।
शेष कल…
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