!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!- पंचविंशति अध्याय : Niru Ashra

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!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!

( पंचविंशति अध्याय: )

गतांक से आगे –

विष्णुप्रिया निमाई के द्वारा दिए गये उपदेश को सुन रही थी ….माता शचि देवि को उपदेश दिया था …पर कृष्णविषयक उपदेश करते हुये निमाई मूर्छित हो गये थे ….मूर्छित तो ये पूर्व में भी होते रहे हैं ..जब से गयातीर्थ से आये हैं भाव में उन्मत्त होना और मूर्छित हो जाना ये निमाई के जीवन की सामान्य सी घटना थी । कोई “कृष्ण” कह देता तो ये सात्विक भाव से भर जाते और हुंकार भरते हुये मूर्छित हो जाते । पर आज कुछ अलग सा था ….गम्भीर उपदेश अपनी माता शचि को देकर निमाई गिर पड़े ….विष्णुप्रिया बाहर बैठी उपदेश सुन रही थी …जब उसने देखा कि इस बार न तो निमाई ने कोई हुंकार भरी ….ना ही संकेत हुआ कि मूर्छित होने वाले हैं …ये “कृष्ण” कहते हुये बस गिर गये और मूर्च्छा आगयी । बाहर बैठी विष्णुप्रिया भागी भीतर ….उसने अपने प्राणधन निमाई को गोद में रख लिया ….लाज भी नही की …जल का छींटा देने लगी …..खुल कर रुदन कर रही थी प्रिया …वो रोते हुये कह रही थी ……माँ ! मेरे प्राणेश्वर को क्या हुआ , देखो ना माँ ! ये कुछ बोल भी नही रहे ! मुख में जल डाल दिया ..सिर में जल और तैल मिलाकर मलने लगी ।

शचि देवि अपनी इस प्यारी सी बहु को इस तरह उन्माद में देख कर उनका हृदय रो उठा था ….निमाई का उन्माद क्या कम था जो अब प्रिया भी उन्मादिनी हो गयी थी । पर प्रिया आज अपने में नही थी …..वो अपने निमाई के सिर को सहलाते हुए बारम्बार शचिदेवि को कह रहीं थीं …..माँ ! मुझ से क्या अपराध बन गया कि मेरे प्रियतम मुझ से बात नही करते …मेरी ओर देखते नहीं ….क्या मेरे कारण इनकी ये स्थिति बनी है ? कहीं मैं ही दोषी तो नही ?

उस बालिका के मुख से ये सब सुनकर शचि देवि के नयनों से अश्रु प्रारम्भ हो गये थे ।

प्रिया ! निमाई ने अपने नेत्र खोले …प्रिया ने देखा …..उसे अतीव प्रसन्नता हुई …वो उठी और अपनी सासु शचि देवि के गले से लग गयी । प्रिया ! निमाई ने फिर नाम लिया था । बेटी ! तुझे बुला रहा है निमाई । माँ ने भी आनंदित होकर अपनी बहु को कहा । गया तीर्थ से आने के बाद प्रथम बार निमाई ने अपनी इस अर्धांगिनी को पुकारा था ।

विष्णुप्रिया आई ……तू रोती बहुत है ! निमाई बोले । अब प्रसन्नता में रोते हुए प्रिया ने अपनी सासु माँ को देखा ….शचि देवि ने संकेत में कहा …अभी बैठी रह उसके पास । प्रिया बैठी रही।

क्यों रोती हो ? अपने कर से प्रिया के कपोल में ढुरक रहे अश्रुओं को निमाई ने पोंछा । रोमांच हुआ प्रिया को …..निमाई के छुवन से प्रेम सिन्धु में डूब गयी प्रिया । निमाई मुस्कुराये और उठ गये ।

जाओ गौर ! तुया संग किसेर पीरिति ।

हे गौरांग ! जाओ …मत मुस्कुराओ …तुम तो मुस्कुरा रहे हो …पर मेरे हृदय में क्या बीत रही है पता है ? अरे ! मेरे हृदय को तुमने समझा ही नही । तुम से कैसी प्रीति ?

क्या सोच रही हो ? फिर निमाई ने प्रिया के कोमल करों का स्पर्श किया ।

सिर हिला दिया प्रिया ने ….”कुछ नही”।

मैं जा रही हूँ …मुझे पड़ोस में कुछ काम है ….प्रिया ! निमाई को सम्भालना । ये कहते हुये शचि देवि थोड़ा मुसकुराईं ….वो अब प्रसन्न हैं …बहुत प्रसन्न । एकान्त दिया था अपने बेटे बहु को शचि देवि ने । ताकि दोनों में प्रीत बढ़े ।

तभी ……

क्या निमाई प्रभु हैं ? दो तीन वैष्णव आगये थे ….वो बाहर आकर पूछ रहे थे ।

कोई आगन्तुक आये हैं ? निमाई ने पूछा। प्रिया ने जाकर देखा …बाहर शचि देवि थीं वो कह रहीं थीं ..अभी नही , अभी जाओ …कहाँ कहाँ से आजाते हैं …मेरे बेटे को तुम लोग ही बिगाड़ते हो ।

तभी निमाई आगये ….शचि देवि को देखा तो निमाई बोले …माँ ! तुम पड़ोस से बहुत शीघ्र आगईँ ?

शचि देवि बिना कुछ बोले भीतर चली गयीं …..और प्रिया को समझाने लगीं …बेटी ! थोड़ा केश बना ले …ये क्या साड़ी पहनी है …सुन्दर सी पहन …आँखों में कजरा लगा …केश में गजरा लगा ….शरमा कर प्रिया अपने कक्ष में चली गयीं । वो आइने के सामने खड़ी हैं ….अपने अंगों को देखती हैं …यौवन झांक रहा है प्रिया के अंगों से ….वो फिर अकेले शरमा जाती हैं ।

पहली बार निमाई ने उसे छुआ …..छुआ तो पहले भी था पर गया तीर्थ से आने के बाद …ये पहली घटना थी ….मुस्कुराये मेरे प्राण ! अकेले हंसती है विष्णुप्रिया । मेरे अश्रुओं को उन्होंने पोंछा ! उन्हें मुझ से प्रेम है …तभी तो मेरे कपोल का स्पर्श ! उसे बारम्बार रोमांच हो रहा है ….वो अपने केशों को संवार रही है …बिन्दी लगा कर आइने में इतरा रही है ।


भाई ! मैं तुम लोगों को एक सार की बात बताता हूँ …..रात्रि का समय बहुत अद्भुत होता है …दिन में किया गया संकीर्तन और रात्रि में किया संकीर्तन ….दोनों में बहुत अन्तर होता है …रात्रि का समय कितना सुन्दर शान्त होता है । हम उसे व्यर्थ सो कर गुज़ार देते हैं ….नही , आज से हम रात्रि में संकीर्तन करेंगे । बोलो , तुम लोग तैयार हो ?

जो वैष्णव आये थे मिलने उन्हीं को निमाई ये सब बता रहे थे ….वो लोग गदगद होकर प्रणाम करके जब चलने को हुये तो निमाई ने फिर कहा – आज से संकल्प करो कि …रात्रि को हम व्यर्थ नही जाने देंगे ….रात भर संकीर्तन ! रात भर हरिनाम ! आहा ! रात भर उसे पुकारेंगे ! प्रेम की गंगा में रात भर उन्मत्त पड़े रहेंगे …डूबे रहेंगे । और हाँ , रात्रि धन्य हो जाएगी ….वातावरण में हरि नाम व्याप्त हो जायेगा । ये कहकर उन वैष्णवों को निमाई ने विदा किया ।

आज रात्रि में निमाई संकीर्तन करेगा …कहाँ ? शचि देवि ने निमाई की सारी बातें सुन ली थीं ।

पर रात्रि के लिए तो विष्णुप्रिया ! वो सज रही है !

शचि देवि ने देखा ……निमाई कन्धे में गमझा डाले निकल गये घर से ।

अब सन्ध्या भी जा रही है …और रात्रि का आगमन हो रहा है ।

उफ़ ! इधर विष्णुप्रिया ने सेज में कुछ गुलाब की पंखुडियाँ भी बिखेर दीं हैं ।

शेष कल –

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