!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 40 !!
गहरो प्रेम समुद्र को
भाग 2
तभी ………रँग देवि ! सुदेवी ! विशाखा ! चित्रा ! आओ इधर इधर आओ ! ललिता सखी फिर चिल्लाईं ।
ये सारी सखियाँ फिर दौड़ीं ……..हाँ क्या हुआ ललिता ! क्या हुआ ?
ये देखो ! ललिता सखी फिर दूसरे चरण चिन्ह दिखानें लगी थीं ।
ध्यान से देखो ! ये दूसरे चरण चिन्ह कहाँ से आगये यहाँ ?
ललिता सखी नें तनिक मुस्कुराते हुए अपनी सखियों से पूछा ।
ओह ! रँगदेवी उछल पडीं और ललिता सखी के गले लग गयीं …….
तो क्या ? हमारी स्वामिनी श्रीराधा रानी को वे ले गए हैं ?
हाँ …..हाँ …सखी ! हाँ ……….हमारी श्रीराधा रानी को वह छलिया अपनें साथ ले गए हैं ।
हाँ ………..सब सखियाँ बैठ गयीं और दूसरे चरण चिन्हों को भी देखनें लगीं ……इनमें भी वही – चक्र , शंख, गदा, कमल , धनुष, दो बिन्दु, लता, मछली, षटकोण………..
सखियों ! मैं क्या बताऊँ ? मुझे चिन्ता अपनी श्रीराधा रानी की थी ……कि वो कहाँ है ? वो हमारी कोमलांगी कहीं कृष्ण वियोग में अपनें प्राण न त्याग दें …….पर ये सही किया हमारे प्राण नाथ नें …..कि श्रीराधा रानी को अपनें साथ ले गए ।
इतना कहते हुये…फिर सब सखियाँ उठीं …..और उन “चरण चिन्ह” को देखती हुयी ……आगे बढ़ती गयीं ……बढ़ती गयीं ।
सखियों ! फिर चिल्लाईं ललिता सखी …………….
यहाँ वे बैठे हैं……..देखो ! यहाँ कुछ कनक बिन्दु जैसे कुछ गिरे हैं ….फूल भी बिखरे हुए हैं ……..पर इस फूल में केश लगे हैं ………केश तो लम्बे हैं………रँगदेवी केश को देखती हुयी बता रही हैं ।
अरी ! इतना भी नही जानती …….यहाँ बैठकर उस छलिया नें अपनी प्रिया कि बेणी गुँथी होगी ।
ये ललिता के मुख से सुनते ही …..सब सखियों कि आँखें मूंद गयीं …….और ध्यान सहज लग गया ……..जो जो कृष्ण नें श्रीराधा का श्रृंगार किया था ……वो सब ध्यान में देखनें लगीं गोपियाँ ।
ओह ! थक गए ……..हे मेरी राधे ! तुम भी थक गयी होगी ना !
अब नही दौड़ा जा रहा……….अब कहीं बैठ जाएँ ?
साँसें चल रही थी दोनों की ………..यहाँ तक नही पहुँच पाएंगी सखियाँ …….कुछ देर बैठ जाते हैं ……….कृष्ण नें अपनी पीताम्बरी बिछा दी ………उसमें श्रीराधा रानी को बिठाया ।
दौड़ कर गए …………कमल के पत्ते में यमुना जल ले आये …….राधे ! प्यास लगी है ……..जल पी लो ।
बेचारी गोपियाँ ! श्रीराधा रानी नें कृष्ण कि ओर देखते हुए कहा ।
पर तुम अंतर्ध्यान क्यों हुये ? श्रीराधा रानी नें पूछा ।
उनके प्रेम को बढ़ानें के लिये ………..कृष्ण का उत्तर था ।
हाँ राधे ! विरह प्रेम को पुष्ट करता है ………मिलन प्रेम को घटा सकता है ……….पर विरह प्रेम को बढ़ाता है …….इसलिये मैं अंतर्ध्यान हुआ हूँ ………फिर गम्भीर हो गए थे कृष्ण ……..राधे ! गोपियों जैसा प्रेम इन जगत में किसी का नही है ….न था ….न है ….न होगा ………..ऐसे निःस्वार्थ प्रेम से अपरिचित है ये जगत ………..मैं इन गोपियों के प्रेम को जगत में प्रकाशित करना चाहता हूँ ……….जगत के स्वार्थ से भरे लोगों को इस प्रेम का दर्शन कराना चाहता हूँ …….
कृष्ण बोल रहे थे …………..श्रीराधा बस सुन रही थीं ।
ओह ! तुम्हारी लटें उलझ गईं हैं ……..सुलझा दूँ प्यारी !
मन्द मुस्कान के साथ बोले थे श्याम सुन्दर ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल ………


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