!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!
( चतुस्त्रिंशत् अध्याय: )
गतांक से आगे –
प्रियतमे ! तुमसे किसने कहा कि मैं तुम्हें छोड़ रहा हूँ ? तुम मिथ्या शोक कर रही हो । हे प्रिया ! तुम मेरी प्राण हो …ये कहते हुए निमाई ने विष्णुप्रिया को अपने गोद में बिठा लिया था ….बेचारी प्रिया निमाई का संसर्ग पाकर फूली नही समाई ….वो सब भूल गयी ….निमाई ने अपनी प्रिया के मुख को चूम लिया …..इससे प्रिया के हृदय में प्रेम का वर्षण होने लगा । उसने अपने नेत्रों को बन्द कर लिये …..गौर वक्ष में बिहार करने लगी थी ये विष्णुप्रिया । नेत्रों के अश्रु निमाई के इन प्रेम प्रसंगों से सब सूख गये थे ….मुख मण्डल में मुस्कान फैल रही थी निमाई के , और सलज्ज भाव प्रिया के ….दोनों ही मानों रास कर रहे हों ….प्रेम संभाषण …प्रेमालिंगन ….के कारण विष्णुप्रिया प्रेमानन्द में ही डूब गयी थी । ये सब कर रहे थे रसिक शेखर निमाई ….प्रेम के मर्मज्ञ थे …प्रेम के रहस्य को इनसे ज़्यादा और किसने जाना है ।
अजी , पूरी रात्रि बीत गयी …ये प्रथम रात्रि थी …जो इस तरह प्रेम में बीती । किन्तु विष्णुप्रिया के मन में कहीं अभी भी ये बात है कि मेरे प्राणेश्वर ने स्पष्ट नही कहा कि – मैं सन्यास लूँगा ही नहीं । तो ये सन्यास लेंगे ! गौर वक्ष में बिहार कर रही विष्णुप्रिया को भी वियोग व्याप्त होने लगा ….ये अद्भुत और वैचित्र्या स्थिति थी । विष्णुप्रिया का हृदय अब रो उठा ….ये मुझसे कपट करके चले जायेंगे ….मुझे अपनी मीठी मीठी बातों में फँसा कर सन्यास ले लेंगे …फिर मैं कुछ नही कर सकूँगी । मर जाऊँगी ….पर उससे क्या ? ये तो मुझ से छूट ही जायेंगे ना । ये विचार आते ही फिर उन्माद चढ़ गया प्रिया को …..निमाई के वक्ष में अपना मुख रखकर ये रोने लगी । निमाई ने फिर सम्भाला …पुचकारा ….मुख चुम्बन किया । पर इस बार कोई लाभ हुआ नही ।
अब क्या हुआ ? तुम इस प्रकार अब क्यों रो रही हो ? मैंने तुम्हें कहा ना ।
क्या कहा नाथ ? फिर कहिये तो ? विष्णुप्रिया ने स्पष्ट जानना चाहा ।
क्या आप सन्यास नही लेंगे ? बोलिये ! क्या आप गृहत्याग नही करेंगे ? वचन दीजिये मुझे ।
विष्णुप्रिया का यह रूप निमाई ने आज तक देखा नही था …..वो अब वचन माँग रही थी …कि कहिये आप सन्यास नही लेंगे ! कुछ देर निमाई मौन हो गये …..फिर अपने पर्यंक से उठे ….झरोखे के पास आये …..झरोखा खोल दिया ….आकाश में पक्षी उड़ रहे हैं …. पक्षियों की चहक से प्रातः का समय होने वाला है इसकी सूचना मिल रही है ।
हे विष्णुप्रिये ! सन्यास तो मैं लूँगा ही …..
ओह ! निमाई के ये शब्द विष्णुप्रिया के कानों में शीशा घोल गये …प्राण घातिनी वाणी थी प्रिया के लिए ये ……उठ गयी प्रिया भी …वो निमाई के पास आई …निमाई झरोखे से बाहर देख कर बोल रहे हैं…..सब कुछ मिथ्या है यहाँ …किसे सत्य समझ रही हो ? जितने सम्बन्ध हैं इस जगत के सब झूठे हैं …..सत्य केवल कृष्ण हैं …कृष्ण के साथ हमारा सम्बन्ध सत्य है । माया के कारण हम सब भ्रमित हैं …असत्य को सत्य मान बैठे हैं …..अपवित्र को हम पवित्र समझते हैं ….हे प्रिये ! देखा जाये तो रज और वीर्य से जन्मा जीव मूत्र और विष्टा के स्थान पर जन्म लेता है …और पृथ्वी पर गिरते ही वो सच्चा ज्ञान भूल जाता है ….अपने सच्चे साथी को भी भूल जाता है …अपने सच्चे सम्बन्धी को भूल जाता है ….झूठे माया प्रपंच में उलझता चला जाता है …इन्हीं को वो अपना मान लेता है ……ये सब झूठे हैं प्रिया ! ये मल मूत्र से भरा प्राणी सत्य है क्या ? जो आज है कल नही रहेगा और कल नही था …उसमें हम अपनी आसक्ति को लगा कर चलते हैं ये बहुत गलत करते हैं हम प्रिया ! बताओ , यहाँ कौन किसका है ? इस जन्म में जो माता पिता हैं वो दूसरे जन्म में माता पिता नही रहेंगे ….फिर कौन किसका ? केवल केवल श्रीकृष्ण ही हमारे हैं ….बाकी सब झूठ है …माया है । कृष्ण का भजन करो …मिथ्या शोक त्याग दो …..निमाई इतना बोलकर फिर आकाश को देखने लगे थे ।
विष्णुप्रिया समझ गयी कि उसके निष्ठुर प्रियतम उसे छोड़कर चले जायेंगे । उनके द्वारा कहे ज्ञान-उपदेश आदि से तो यही अर्थ निकलता है ….और अब ये पहले की भाँति मुस्कुरा भी नही रहे …..गम्भीर हैं ….गम्भीर ही बने हुये हैं ….प्रिया को जब निश्चय हो गया कि सन्यास लेना ही इनका लक्ष्य है ….तब ये फिर बिलख उठी …..नेत्रों से अश्रु धार फिर बह चले ….किन्तु इस बार निमाई ने अपनी गम्भीरता नही छोड़ी । क्यों की विष्णुप्रिया भी अब स्पष्ट सुनना चाहती है …एक प्रकार से पकड़े गए थे भक्त द्वारा भगवान ।
क्या तुम सुन पाओगी मैं जो कहूँगा ? निमाई मुड़ें अपनी प्रिया की ओर …..इस बार निमाई के नेत्रों में अश्रु थे ………
मेरा जन्म दुःख भोगने के लिए हुआ है प्रिया ! मेरे जितना दुःख कौन भोगेगा ! मैं रोने के लिए जन्मा हूँ …मैं जितना रोऊँगा जीव का हृदय उतना पिघलेगा ….हृदय पिघलने पर शुद्धता और पवित्रता उसके हृदय में आजाएगी । तब कृष्ण नाम का जीव उच्चारण करेगा ….उससे उसे सब कुछ मिल जायेगा …..हे विष्णुप्रिया ! मैं रोने आया हूँ ….मैं दुःख भोगने आया हूँ ….ये कहते हुए निमाई हिलकियों से रोने लगे थे । प्रिये ! तुम सोचोगी फिर हम ? तुम दोनों मेरी माँ और तुम , तुम दोनों को भी मेरा साथ देना है …..तुम दोनों की भी मेरे दुःख में हिस्सेदारी है ….क्या अपनी हिस्सेदारी नही लोगी ? मेरी माँ दुखी होगी ….वो मुझे पुकारेगी …वो तड़फ़ेगी ….वो रोएगी …तो जगत का हृदय पिघलेगा ….मैं यही चाहता हूँ । तुम मेरे वियोग में अपने जीवन को झोंक दोगी …विरह में डूब जाओगी ….रोओगी …चीखोगी …पुकारोगी …हे प्रिये ! गोपियों ने जिस तरह प्रेम का उदात्त उदाहरण जगत के सामने रखा ऐसे ही तुम्हें रखना है । देखो , अपना स्वार्थ नही …इस जगत के जीवों के दुखों को देखो ….इनका कैसे उद्धार होगा ….कर्मकाण्ड से नही होने वाला ….सत्य असत्य मार्ग के विवेक से इनका उद्धार नही होने वाला ….योगायोग का मार्ग इन कलि के लोगों के लिए नही हैं …..हे प्रिये ! मैं बहुत सोचता रहा ….कैसे कैसे इनका उद्धार हो….तब मेरे समझ में एक ही मार्ग दिखाई दिया ….रोने का…….रोने से हृदय द्रवित होता है …हृदय के द्रवित होते ही उसके पाप बह जाते हैं …वो निष्पाप हो जाता है ….फिर कृष्ण भक्ति बीज उसके भीतर डालो तो वो परम भक्त बन जाएगा ….ये मैंने किया है ….बड़े बड़े पापियों पर मैंने ये प्रयोग किया है ….अरी मेरी प्रिया ! रुदन सबसे बड़ी साधना है ….कोई भी प्रायश्चित इतनी शीघ्रता से पापों को नही धो पाता जितनी जल्दी रुदन धो देता है…इसलिए हे विष्णुप्रिया ! बैठ गये निमाई …विष्णुप्रिया के सामने हाथ जोड़ने लगे …विष्णुप्रिया काँप गयी ….ये क्या कर रहे हैं आप ? निमाई बोले ….अब तुम्हें मेरे इस जगत मंगल के कार्य में साथ देना होगा …भगवान श्रीकृष्ण तुम्हें शक्ति प्रदान करें …तुम्हारे क्रन्दन से जीवों का मंगल हो …इतना ही बोलकर निमाई शान्त हो गये ।
बेचारी विष्णुप्रिया ! क्या कहे अब उफ़ !
शेष कल –


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