उद्धव गोपी संवाद
( भ्रमर गीत)
४९ एवं ५०
कोहू कहै री मधुप,भेष उन्हं कौ क्यौं धारयौ।
स्याम,पीत,गुंजार -बेनुं-किंकिनि झंनकारयौ।।
वा-पुर गोरस चोरि कें,फिरि आयौ इहि देस।
इन्ह कों जिन्ह मानों कोऊ,कपटी इन्ह कौ भेष।।
— चोरि जिन्ह जाइ कछु।।
भावार्थ:-
कोई गोपी कह रही हैं कि भंवरे तूने अपना भेष कृष्ण की तरह क्यों बनाया है,वही स्याम रंग,पीली बांसुरी और गुन गुन करती तेरी आवाज़ जैसे हमारे प्रिय स्याम की पैरों में गुन गुन करती पायल की झंकार। भ्रमर, वहां की नगरी की बालाओं का प्रेम रस चुराकर फिर इस देस में आ गए हो। तुम्हें मानना ऐसे जैसे कपटी स्याम को मानना, जैसे कोई चोरी करने आए हो।
कोहू कहै रे मधुप,कहा मोहन गुन गावैं।
हृदय कपट सों परम प्रेम, नाहिंन छवि पावैं।।
जानति हों सब भांति कै,सरबस लियौ चुराय।
ऐसे कहुं ब्रज बासिनि को जु तुम्हें पतियाई।।
– लहै सब जानिंकें-
क्या कह रहे हो भंवरे, तुम वो कपटी श्याम के गुण गा रहे हो…. जिसके हृदय में कपट है वो प्रेम को क्या जाने…. उसने हम सभी का सब कुछ चुरा लिया है और यहां से चले गए हैं, अब तुम यहाँ क्या लेने आए हों


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