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August 30, 2025 7:11 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 51 !!-“होरी” – मधुर रस का अद्भुत समर्पण भाग 1 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 51 !!-“होरी” – मधुर रस का अद्भुत समर्पण भाग 1 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 51 !!

“होरी” – मधुर रस का अद्भुत समर्पण
भाग 1

मधुर रस कहो, या आत्मसमर्पण कहो……..अद्भुत भाव है ।

पर स्वार्थ कलुषित चित्त मानव ठीक न समझ सके – स्वाभाविक है ।

हे वज्रनाभ ! मधुररस में अपना सुख, अपनी तृप्ति, अपना सम्मान कुछ है ही नही । इसमें तो अपना उत्सर्ग है ….अपनें आपका सम्पूर्ण दान ।

श्रृंगार इसलिये कि वे देख कर प्रसन्न होते हैं ……..भोजन इसलिये कि उनका प्रिय यह देह स्वस्थ रहे ……..अरे ! रूठना और मनाना भी इसलिये कि उनके सुख में वृद्धि हो ……उन्हें आनन्द मिले ।

उनका सुख, उनका आनन्द, उनका आल्हाद…….अपनेंपन का इतना उत्सर्ग कि ….”अपनी” सत्ता ही समाप्त ।

उनका, उनका , उनका और वे – “मैं” कहीं खो गया है ……….और वे इतनें करीब आगये कि ……अब तो “वे ही रह गए हैं” ।

तुम जानते हो वज्रनाभ ! यह बरसाना है ……”मधुर रस” का केन्द्र……

और इस माधुर्य रस की अधिष्ठात्री देवी हैं – श्रीराधा रानी …।

खूब रस बरसा था उस दिन………खूब रंग बरसा था बरसानें में ।

महर्षि शाण्डिल्य आज आँखें मूंद कर बोल रहे हैं ………….मानों उनके हृदय को अभी भी कोई रँग रहा हो…………अनुराग के रँग से ।

होरी में क्या होता है ? बरसानें वारी श्रीराधा रानी रँग बरसाती हैं ।

किस पर ?

कृष्ण पर …………फिर प्रसादी सब पर, महर्षि नें समझाया ।

कौन सा रँग ?

प्रेम का रँग, अनुराग का रँग ……….

अच्छा वज्रनाभ ! एक बात तो बताओ ….रँग का अर्थ क्या होता है ?

फिर स्वयं ही महर्षि “रँग” का अर्थ बतानें लगे ।

जिससे हृदय रंग जाए…….उसे ही रँग कहते हैं ……आहा !

पता है बरसानें की होली कैसी होती है ?

महर्षि बतानें लगे – कृष्ण प्रेम का रँग श्रीराधा रानी दूसरों पर डालती हैं ……..ये इन करुणामयी की कृपा है…….फिर कृष्ण, “श्रीराधा प्रेम” का रँग दूसरों पर डालते हैं ………..अब दोनों तरफ से प्रेम का रँग इतना डलता है कि…….चारों और सृष्टि लाल ही लाल हो जाती है ।

रँग वृष्टि से बादल रंग गए ……धीरे धीरे आकाश भी रंग गए …..इस तरह सम्पूर्ण जगत ही रंग गया ………..

बाह्य जगत ही नही रँगा….अंतर जगत भी अनुराग के रँग से रँग गया ।

फिर जब अंतर यानि मन बुद्धि इत्यादि रँग गए …………तब तो प्रेम में इह लोक भी रँग गया ….और परलोक भी रँग गया …….सब प्रेममय हो गया ……सब प्यार की सृष्टि चारों ओर दीखनें लगी ।

बड़ी गम्भीरता से आज “रस चर्चा” कर रहे थे महर्षि शाण्डिल्य ।


प्यारे ! देखो मेरी ओर …….ध्यान से देखो इधर …….मुझ से आँखें मिलाओ ………इधर उधर नजरें क्यों चुराते हो ………ओह ! समझी अब मैं ……देख रही हूँ तुम्हारी ये आँखें लाल क्यों हो गयी हैं ?

गुलाल से भी ज्यादा लाल …..क्या हुआ बताओ ?

कमल और गुलाल को भी तुम्हारे आँखों की लालिमा नें पीछे छोड़ रखा है ….क्यों ? बताओ ! कैसे , किसनें बिना किसी साज बाज के लाल कर दीं तुम्हारी आँखें …….बोलो ?

हाँ बहुत चतुर होगी वो ……है ना ? और ये तो बताओ कि इन आँखों की रंगाई का मोल तुमनें कितना दिया है ?

पकड़ लिया था श्रीराधा नें अपनें श्याम सुन्दर को …….जब बृषभान जी के महल में चुपके से चढ़ तो गए थे ……..पर “श्रीजी” सामनें ….. तब प्रश्नों की बौछार कर दी थी श्रीराधारानी नें ।

कहाँ खेलकर आये हो होरी ? किसनें खिला दिया तुम्हे होरी ?

व्यंग बाणों की चोट सह रहे थे श्याम सुन्दर ।

आँखें तो लाल हो गयीं ………..पर तुम्हारे लाल अधर कैसे काले पड़ गए ? ये होंठ तो तुम्हारे लाल थे ना ……..फिर कैसे काले पड़े ?

श्रीराधा रानी फिर व्यंग कसती हैं ।

सखी के काजल लगे नयनों को चूमा होगा तुम्हारे अधरों नें …….मैं सब समझती हूँ …………..जाओ ! मेरे पास से जाओ ।

क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –

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Author: admin

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