श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! जब पहली बार श्रीकृष्ण सुदामा मिले !!
अवन्तिका पहुँच गए थे संध्या के समय …….श्रीकृष्ण और बलराम ।
महाकाल की भूमि में रथ को त्यागकर साष्टांग प्रणाम किया था ।
रथवान को कह दिया ……..”अब तुम जाओ ……हम यहाँ से पैदल गुरुकुल के लिये जायेंगे”……….रथवान को बात माननी पड़ी ….वो प्रणाम करके मथुरा के लिये लौट गया था ।
मुण्डित केश , शरीर में यज्ञोपवीत …….पैरों में खड़ाऊँ ………..एक धोती बाँधे प्रसन्न चित्त से चले जा रहे थे ….कि तभी –
कोई रो रहा है………कौन है ?
अरण्य तो नही पर वृक्ष घनें बहुत थे उस तरफ जिधर से रोनें कि आवाज आरही थी ……….कोई बालक रो रहा था ।
श्रीकृष्ण उसी ओर गए……..देखा – सामनें एक बालक बैठा है …….पैरों को पकड़ कर बैठा है ….श्रीकृष्ण और बलराम भी तो बालक ही हैं……पर – श्रीकृष्ण कुछ समझ नही पाये ……..उसके पास गए ……संध्या कि वेला हो गयी थी ……….
कौन हो ? क्यों रोते हो ? बड़े प्रेम से श्रीकृष्ण नें उस बालक से पूछा……आँसुओं को पोंछते हुये वो बालक बोला….”काँटा गढ़ गया है”
अब मेरे गुरुदेव अग्निहोत्र कैसे करेंगे ……..मैं तो समिधा लेनें आया था सूखी समिधा ….उस बालक नें कहा ।
देखो ऊपर देखो ….कितनी सूखी समिधा तो हैं वहाँ पर ………..श्रीकृष्ण नें सहज बनाते हुये उस बालक से कहा …….कहाँ है ? बालक नें जैसे ही ऊपर देखा ………श्रीकृष्ण नें उसके पैर में गढ़ा काँटा पकड़ा और सीधे खींच दिया ……..वो बालक चीखा ।………”पर काँटा तो निकल गया”… श्रीकृष्ण नें मुस्कुराते हुये कहा ।
हाँ निकल गया ……..वो बालक बड़ा प्रसन्न हो गया था ।
अपना हाथ दिया श्रीकृष्ण नें और उस बालक को उठा लिया ।
क्या नाम है तुम्हारा ? श्रीकृष्ण नें सहज पूछा ………
“सुदामा”……..उसनें उत्तर दिया ।
सुदामा ? मेरा नाम कृष्ण ……अपना परिचय दिया ।
तुम किस गुरुकुल में पढ़ते हो ? समिधा बीननें लगे थे अब सुदामा और श्रीकृष्ण बलभद्र भी सहायता कर रहे थे ।
यहाँ तो एक ही गुरुकुल है……….ऋषि सान्दीपनि का ……मैं वहीं का छात्र हूँ …..सुदामा अपना परिचय देते हुये समिधा भी बीन रहे थे ।
“ये सूखी समिधा है”…….श्रीकृष्ण एक सूखी लकड़ी अपनें हाथ में लेते हुये सुदामा को बोले ।
पर तुम कहाँ ? किस गुरुकुल के हो ? सुदामा नें श्रीकृष्ण से पूछा ।
हम आज ही आये हैं……आरहे हैं …..ऋषि सान्दीपनि के गुरुकुल में ।
अरे वाह ! फिर तो हम दोनों मित्र बन सकते हैं ?
सुदामा नें अपना हाथ आगे बढ़ाया ……….श्रीकृष्ण सुदामा की सरलता देखकर आनन्दित हो उठे ……..और सुदामा का हाथ पकड़ते हुए उसे हृदय से ही लगा लिया था ।
तो हम दोनों आज से मित्र हुये , ठीक है ? सुदामा अब चलनें लगा था गुरुकुल की ओर….क्यों की अग्निहोत्र का समय हो रहा था गुरुदेव का ।
सूखी समिधाएँ सुदामा नें तो उठाई ही थीं ……..पर श्रीकृष्ण नें भी चार पाँच उठा लीं…… बलभद्र नें भी ।
हमारे गुरु जी यही सेवा स्वीकार करते हैं ………उन्हें मतलब नही है सोना चाँदी से…………कोई क्षत्रिय उन्हें सोनें चाँदी की भेंट देता है ना तो उसे गुरु जी गुरुकुल से ही निकाल देते हैं……..अब ठीक ही तो करते हैं है ना ? हम तो ब्राह्मण हैं ………..हमारे पास में कहाँ हैं सोना चाँदी ………..हमनें तो देखा भी नही है ……..फिर गुरु जी अगर सोना चाँदी भेंट में लेनें लगे ……तो हम जैसे कहाँ जायेगे …….जिनके घर परिवार का पेट ही मुश्किल से भरता हो ……..सुदामा बोलता जा रहा था श्रीकृष्ण उसे देखते जा रहे थे ………..हृदय का निश्छल ! सरल ! भोला ! सुदामा को देखकर श्रीकृष्ण आनन्दित हो उठे थे ।
तात ! यहीं से मित्रता की शुरुआत हुयी थी श्रीकृष्ण सुदामा की ।
उद्धव नें ये बात विदुर जी को बताई ।
शेष चरित्र कल
