“श्रीराधाचरितामृतम्” 73 !!
जब उद्धव का विद्या-गर्व गलित होनें लगा…..
भाग 2
बृजपति मुझे अपने साथ यमुना स्नान को ले जाना चाह रहे थे ……..पर मुझे आज एकाकी जाना था……..क्यों की गोपों से , गोपियों से विशेष मिलनें के लिये कहा था श्रीकृष्ण नें मुझ से ….और हाँ…….”मेरी प्रिया से भी मिलना”…….अपनी प्रिया श्री राधा का नाम लेते ही कैसे भाव विभोर हो गए थे मेरे कृष्ण ।
मुझे उनसे भी मिलना है……विशेष मिलना है………
ऐसा विचार करते हुये……हे पितृचरण ! आप जाएँ ……मैं आनन्द से वृन्दावन की शोभा देखते हुये जाऊँगा……और मुझे कृष्ण सखाओं से भी तो भेंट करनी है ……..
उद्धव नें जब ये कहा , तब “हाँ तुम्हे जैसा रुचे”…….
वत्स ! मैं जाता हूँ……तुम आराम से उठो और स्नान करनें जाना ।
आप भी ना ! वो मैया यशोदा फिर बाहर आगयी थीं ।
आप जाइए ना ! स्नान करके आइये ……….इन बालकों को क्यों जल्दी उठा देते हैं आप !
उद्धव ! कन्हाई को भी ये यमुना ले जाते थे……जल्दी उठा देते थे ।
तू सो जा ! उद्धव ! तू सो जा……….
इतना कहकर मैया यशोदा फिर गईं , अब मुझे आवाज आरही थी दधिमन्थन करनें की ।
वत्स ! तुम छोटे हो ….यशोदा ठीक कहती है …..तुम सो जाओ अभी ।
इतना कहकर बृजपति चले गए थे ।
उठे उद्धव ! सोये कहाँ थे बस लेटे थे……….
मन में विचार आया सूर्योदय से पूर्व का वृन्दावन दर्शन किया जाए ।
वो दिव्य होगा……..ऐसा विचार करके चल दिए थे उद्धव ।
बृजवासियों के घरों में, घी के दीये अभी भी जल रहे थे……रात्रि के जलाये दीये अभी तक बुझे नही थे…..दधि मन्थन शुरू हो रहा था प्रत्येक घरों में…….दधि मन्थन के समय गोपियों के चूड़ियों की मधुर आवाज आरही थी…….उद्धव को रोमांच हो उठता है ……..जब वो चलते हुए सुनते हैं…….”हे कृष्ण ! हे गोविन्द ! हे सखे !” मधुर कण्ठ से गा रही थीं गोपियाँ ……..उनके मुख से निसृत ये शब्द दिशाओं को पवित्र कर रहे थे……उद्धव आनन्दित हैं ।
यमुना में स्नान किया उद्धव नें …….बाहर आये …….सन्ध्या और गायत्री का जाप करनें लगे थे……..पर तभी उद्धव नें देखा –
गोप ग्वालों का समुदाय दिखाई दिया … …..उन सबनें पहले तो शान्त भाव से स्नान किया ……फिर उद्धव के पास आये ………..बड़े ध्यान से उद्धव को देखा ……..आपस में कुछ बातें कर रहे थे ………..तभी उद्धव नें अपनी आँखें खोलीं ………………
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –
