Niru Ashra: 🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 145 !!
सखी ! अब चलो वृन्दावन
भाग 2
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प्यारे ! क्यों रो रहे हो ……………मुझे अब जानें दो वृन्दावन ……..मेरे लिये वही स्थान उचित है ………..और आप जब मुझे वहाँ दिखाई देते हो ……….कदम्ब में , मोर के नृत्य में , यमुना की तरंगों में , बरसानें के कुञ्ज – निकुञ्ज में ……….बहुत आनन्द है वहाँ ………पिया ! मत रोको अब ……….आप प्रसन्न हो मेरे लिए यही जानना आवश्यक था ………मैने देख लिया । ………आपको प्रसन्न देखकर ….आपकी समस्त रानियों से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा ………आपकी देख रेख अच्छी हो रही है ………प्यारे ! खुश रहो ……….मेरे प्राण ! ऐसे ही प्रसन्नता आपके मुखारविन्द में छाई रहे………इतना कहते हुए आगे बढ़कर श्रीराधारानी नें आँसू पोंछ दिए थे कृष्ण चन्द्र के ।
पर कृष्ण की हिलकियाँ रुक कहाँ रही थीं ………….
ऐसा मत करो………बैठ गयीं श्रीराधारानी………गोद में श्याम सुन्दर का शीश रख लिया …….सहलाती रहीं उन घुँघराले केशों को ।
क्या चाहते हो ? जब कृष्ण का रुदन नही रुका तब पूछा श्रीराधारानी नें…….बोलो प्यारे……..राधा से तुम्हे क्या अपेक्षा है ?
एक बार मेरी द्वारिका में अपनें चरण रख दो ………….
कृष्ण चन्द्र नें विनती की ।
अब रहनें दो …………अब शीघ्र इस अवतार लीला को विराम दो और चलो निकुञ्ज में……….श्रीराधारानी नें कहा ।
नही ………..जिद्द मत करो पिय ! द्वारिका में मेरा क्या काम ?
वैकुण्ठ को ही पृथ्वी पर उतारा है आपनें……..मुझे पता है …….भू वैकुण्ठ है आपकी द्वारिका ……….पर वैकुण्ठ में मेरा क्या काम ……आपकी महालक्ष्मी रुक्मणी हैं ………….उनके साथ आप सानन्द विराजे हैं ……….वहाँ मेरी क्या आवश्यकता ! येश्वर्य में माधुर्य का क्या काम ? इसलिये ज्यादा आग्रह मत करो ।
राधे राधे
शेष चरित्र कल –
🙌 राधे राधे🙌
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 40 )
गतांक से आगे –
- तुंगभद्रा जू की *
सुनि नीकि सोहनि सोभना सुंदरी मोहनि मेंनिका।
रागरंगनि सहचरी पुनि रँगीली रंगायिका ॥
- रसातुंगा जू की *
रसीली रसरंजनी पुनि चारुमतिका चंदनी ।
रसावलिका सुरतसजनी बिलासनि उल्लासनी ॥
- रंगवाटी जू की *
भाँवती त्रयभवनसुंदरि विपुलनी पुलकावली।
कलासंपन्ना विमदनी मतंगनि मदनावली ॥
- चित्रलेखा जू की *
पीयूषदा ललितांगिनी लचलंकनी लीलावती ।
लोलचक्षा छाजनी साजनी राजनि महामती ।।
- सुसंगता जू की *
अवदातिनी अवरेखिनी आत्यंतरसदा अनुगती ।
अतिप्रवीना जानसुंदरि मानमंदिर मालती ॥
- चित्रांगी जू की *
मधुमहमहा अनुवर्तिनी आनन्यका करुनाकरा ।
दरसनीया प्राप्तकामा अलंकारा जितुपमा ॥
- मोदनी जू की *
आसक्तिनी आतंकिनी अतिभ्राजमाना मनमुदा ।
सुरसरसिका रावती आभावती सोभाहदा ।।
- मदनालसा जू की *
महामृदुला महामधुरा महारहस्या रसरता ।
सुधाधारा धरासुखदा सुफला हरिप्रिया अनुगता ॥
* हे रसिकों ! प्रातः उठिये ….और उठते ही बोलिए …”श्रीवृन्दावन”…आँखें बन्द कर लीजिए ….श्रीवृन्दावन को निहारिये अपने हृदय के नेत्रों से । फिर अपने परिकर की सखी जू का साथ पकड़िये ….और उनके पीछे पीछे चल दीजिए । वो युगल सरकार के महल में जा रहीं हैं ….मैंने जो आपको ये विस्तार से सखियों के नाम बताये …सखियों की सखियों के नाम बताये …उनकी सेवाएँ बतायीं ….इसका कारण यही है कि जब आप भावना से निकुँज का दर्शन करें ….तो ये सखियाँ आपको मिलेंगीं उस समय आप इनका नाम तो जानें ….नाम जान लेने से ….आप नाम लेकर उनको प्रणाम कीजिए ….उन्हें पहचानिये ….और हाँ ….हरिप्रिया जी को मत भूलना …वो निकुँज में ही भ्रमण करती रहती हैं …..मैं उनके साथ ही आपको मिलूँगी ।
-हरिशरण
कितनी शान्त हैं हमारे युगलसरकार की ये अष्टम सखी श्रीइन्दुलेखा जी । मुखमण्डल इनका कितना दमक रहा है …और सेवा में तन मन प्राण से लगीं हैं …..अब सरकार उठने वाले हैं ….इसलिए इनको शीघ्रता भी है …अपनी सखियों को सेवा कार्य समझा रहीं हैं …फल आदि सजाने को कह रहीं हैं ….तो दूसरी सखी उसी समय आजाती हैं ..और वो पूछती हैं ….क्या चन्दन इतना गाढ़ घिसा जाये …या थोड़ा पतला । इन्दुलेखा जी उनको समझाती हैं ….इससे थोड़ा पतला ….क्यों कि प्रिया जू के श्रीअंग में चित्रावली भी तो काढ़नी है । वो सखी चली गयी है ।
पुष्पों का गुच्छ लेकर एक सखी आयीं ……श्रीइन्दुलेखा जी उन पुष्प गुच्छ को देखकर बहुत प्रसन्न होती हैं …….और उन सखी से बातें कर रहीं हैं ……
ये श्रीइन्दुलेखा जी की अष्ट सखियों में से प्रथम सखी हैं …इनका नाम है …”तुंगभद्रा”जी । ये गयीं ….और अपनी सखियों को बताने लगीं …..कि इस पुष्प गुच्छ को लाल जी के मुकुट में लगाना है …..तुंगभद्रा जी की अष्ट सखियाँ हैं ये …..इनके नाम भी सुन लीजिए …..सोहनी जी , सोभना जी , सुन्दरी जी , मोहनी जी , मेनिका जी , रंगरागा जी , रंगीली जी और रंगायिका जी ।
ये सब उस पुष्प गुच्छ को मुकुट में कैसे सजाया जाए …उस पर विचार कर रहीं हैं ।
अब आइये …ये सखी हैं …श्रीइन्दुलेखा जी की दूसरी सखी, इनका नाम भी अद्भुत है , “रसातुंगा” जी । इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं …जो पोशाक तैयार कर रही हैं …..ये भारी लहंगा है ….प्रिया जी के लिए भार होगा …..फिर दूसरी सखी एक लहंगा लायी जो भार में फूल की तरह था …उसमें कढ़ाई भी फूलों की ही थी । अब थोड़ा नाम भी सुन लीजिए ….रसातुंगा जी की अष्ट सखियों के नाम ……रसीली जी , रसरंजिनी जी , चारुमति जी , चंदनी जी , रसालिका जी , सुरत सजनी जी , विलासिनी जी और उल्लासिनी जी । “ये लहंगा ठीक है”…..रसातुंगा जी ने अपनी सखी को कहा …और प्रसन्न वहाँ से चली गयी ।
मेरा ध्यान जाता है ….दूसरी ओर …..वहाँ एक सखी हैं …..ये तीसरी सखी हैं ..श्रीइन्दुलेखा जी की ….इनका नाम है …”रंगवाटी” जी । हमारी प्यारी श्रीहरिप्रिया जी ने मुझे बताया ….कितने प्रेम से मेरे स्कन्ध में हाथ रखकर खड़ी हो गयीं थीं …और मुझे बताने लगीं । इनकी अष्ट सखियाँ …..देखो …ये हैं – भाँवती जी , त्रिभुवन सुन्दरी जी , विपुलनी जी , पुलकावलि जी , कलासंपन्ना जी , विमदिनी जी , मातंगिनी जी और मदनावलि जी ।
ये पीताम्बर लेकर आयीं हैं …..ये कौन हैं ? मैंने पूछा …तो हरिप्रिया जी मुस्कुराते हुए बोलीं …ये श्रीइन्दु लेखा जी की चौथी सखी ….”चित्रलेखा” जी हैं । ये लाल जी के लिए पीताम्बर लेकर आयीं हैं ….मैंने देखा उस पीताम्बर में स्वर्ण तारों से “राधा” लिखा हुआ था । इनकी सखियाँ हैं …..पीयूषदा जी , ललितांगिनी जी , लच लंकनी जी , लीलावति जी , लोल चक्षा जी , साजनी जी , राजनी जी और महामती जी ।
भोग की सामग्रियों को सजाने की ज़िम्मेवारी है …इन पाँचवी सखी की….यानि श्रीइन्दुलेखा जी की पाँचवीं सखी ….”सुसंगता” जी । इनकी अष्ट सखियाँ देखो ….हरिप्रिया जी ने मुझे दिखाया ….इनके नाम भी बताये …..अवदातिनी जी , अवरेखनी जी , अतिरसदा जी , अनुगता जी , अतिप्रबीना जी , सुजान सुन्दरी जी , मान मंदिरा जी और मालती जी ।
हरिप्रिया जी बोलीं ….उन सखी को देख रहे हो ….हाँ , आहा ! कितनी सुन्दर हैं वो …मैंने कहा तो बोलीं ….ये श्रीइन्दुलेखा जी की छठवीं सखी हैं …इनका नाम है ….”चित्रांगी” जी ।
और इनके साथ हैं इनकी अष्ट सखियाँ …..मधुमहमहा जी , अनु वर्तीनी जी , अनन्यका जी , करुणाकरा जी , दरसनिया जी , प्राप्त कामा जी , अलंकारा जी और जितूपमा जी ।
आनंदित हैं सब यहाँ , सब छबीली रंगीली सखियाँ सेवा में जोर सोर में लगी हैं ।
ये हैं …सातवीं सखी , श्रीइन्दुलेखा जी की सातवीं सखी …”मोदनी” जी । इनकी अष्ट सखियाँ ……आसक्तिनी जी , अनुरंजिनी जी , भ्राज माना जी , मन मुदा जी , सरस रसिका जी , रावती जी , आभावति जी और शोभाहृदा जी ।
इनके साथ ही थीं ….श्रीइन्दु लेखा जी की अष्टम सखी ….”मदनालसा” जी । इनकी अष्ट सखियाँ ….पेय तैयार कर रहीं हैं …खस आदि का पेय बना रहीं हैं …..इनके नाम हैं ….हरिप्रिया जी ने मुझे बड़े ही आनन्द के साथ बताया …..महामृदुला जी , महामधुरा जी , महारहस्या जी , रस रता जी , सुधा धारा जी , धरा सुखदा जी , सफला जी और अनुगता जी ।
तभी श्रीइन्दुलेखा जी वहाँ आगयीं ……..वो सबसे बोलीं ….अब समय हो रहा है …तुम सबकी तैयारी है ! सब कुछ तैयार है ? अब युगल सरकार जागेंगे । सभी सखियों ने अति उत्साह में कहा …जी , सखी जू । श्रीइन्दु लेखा जी अब निश्चिन्त होकर प्रतीक्षा करने लगीं थीं ….अब युगल सरकार जागेंगे । अन्य प्रमुख सखियाँ भी वहाँ आगयीं ….श्रीरंगदेवि जी , श्रीसुदेवी जी , श्रीललिता जी , श्रीविशाखा जी , श्रीचम्पकलता जी , श्रीचित्रा जी , श्रीतुंगविद्या जी और श्रीइन्दुलेखा जी तो हैं हीं । हरिप्रिया जी मुझे लेकर गयीं …..मुझे ऐसे स्थान पर खड़ा किया उन्होंने …जहाँ से युगल सरकार के अच्छे दर्शन हों …मैं वहीं खड़ा हो गया …..कितना सुन्दर लग रहा था ये सब …..सखियाँ दिव्य लग रहीं थीं , अनन्त सखियाँ थीं अब तो …..क्या झाँकी थी । तभी श्रीरंगदेवि जी महल में प्रवेश करतीं हैं ………..
शेष अब कल –
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (122)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का हेतु-2
हसितावलोकम् – हसितावलोक का सायुज्य है भगवान के साथ। संसार में बड़े-बड़े सुख हैं पर मुक्ति से बढ़कर और कोई सुख नहीं है, भला; लेकिन प्रेम में इससे उलटा है। वेदान्ती लोग कहते हैं कि मुक्ति सुख है, और प्रेमी कहता है कि अपने प्रियतम के साथ बन्धनसुख है। कोई प्रेम भी चाहे और मुक्ति भी चाहे तो बोलेगा कि हम प्रेम तो तुमसे करते हैं पर तुम्हारे परतंत्र रहना नहीं चाहते; तो वह प्रेमी है कि बेवकूफ है? प्रेमी को तो बद्ध होकर रहना पड़ता है, बँधकर रहना पड़ता है, प्रेमी मुक्त होकर कैसे रहेगा? प्रेम तो संबंध होता है, प्रेम में तो बंधन होता है, प्रेम में मुक्ति कैसी? प्रेम में मुक्ति यदि है भी तो सबसे मुक्ति है, परंतु अपने प्रियतम से मुक्ति नहीं है।
सितावलोकम्- इसमें भी एक बन्धन का वर्णन है; हसित है ओठों में और अवलोकन है नेत्रों में; आँख में है चितवन और होंठों में है मुस्कान और दोनों आपस में बँध गयी हैं। यह उलझन है दोनों की। दोनों भगवान् की सेवा करती हैं। चितवन प्रेम को फैलाती है और हँसी मोह में डालती है, स्नेह में; बन्धन में डालती है। हासो जनोन्मादकरी च माया। भगवान् की मुस्कान लोगों को पागल बना देती है। यह देखो- ज्ञान और अज्ञान दोनों का मेल है, भगवान् के मुखारविन्द पर। यह जो अधरसुधा है, हसित है, मुस्कान है, यह मुस्कान तो लोगों को पागल बनाने के लिए है और चितवन जो है वह रास्ता बताने के लिए है।
हँसकर पागल बनाया और आँख के इशारे से अपने पास बुला लिया-
सम्मोहित करने के लिए है हँसी और आकृष्ट करने के लिए चितवन। भगवान् की जो मुस्कान है वह बेहोश करने की जड़ी है, भला! बेहोश करने का जादू कहाँ है? मुस्कान में। और खींचने की रस्सी कहाँ है? चितवन में। नेत्र की रश्मियों से अपनी ओर खींच लेते हैं और मुसकराकर पागल बना देते हैं- हासितावलोकम्। बोले- भाई! यह सब तो ठीक है। ये चारों प्रकार की मुक्ति तो मुक्त हो गयीं- सारूप्य हुआ तो शिर पर आ गये न सामीप्य हुआ तो कान में आ गये, सालोक्य हुआ तो अधरसुधा और सायुज्य हुआ तो हसितावलोक।+
नारायण। हसितावलोक में सायुज्य है। क्योंकि यह तो भगवान् के स्वरूपभूत ही है। बोले- नहीं, यह तो उपासकों की मुक्ति है, हमको तो नितान्त आत्यान्तिक मुक्ति चाहिए। लेकिन भक्त लोक मुक्ति नहीं चाहते; सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य, सार्ष्टि, एकत्व- कोई मुक्ति नहीं चाहते।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ।
भगवान् तो कहते हैं कि लो मुक्ति, लो मुक्ति, हम तुमको छोड़ते हैं- पेन्शन देंगे तुमको, अपने घर में रहो, अपने आत्मा में, स्वरूप में, स्थित हो जाओ; ब्रह्मनिष्ठ हो जाओ, आत्मनिष्ठ हो जाओ। प्रेमी ने कहा कि पहले हमें कृष्णनिष्ठ होने दो, बाद में हम स्वनिष्ठ होंगे। स्वनिष्ठा में और प्रेमनिष्ठा में विरोध है। प्रेमी कहता है कि कैवल्य हमको भी चाहिए, परंतु हमारा कैवल्य यही है कि तुम्हारी दोनों बाँहों के भीतर हम अकेले रहें। कैवल्य माने अकेला; केवल में जो बीच में ‘व’ है उसे यदि पहले रख दिया और ‘वके’ को ‘अके’ बोलने लगे तो ‘अकेल’ हो गया। ‘अकेल’ ही हिंदी में अकेला हो गया है। तो कैवल्य माने अकेलापन। प्रेम कहता है कि हमको अकेलापन तो अच्छा लगता है, परंतु तुम्हारी बाहों के भीतर अकेलापन अच्छा लगता है, उसके बाहर नहीं। इसके लिए ही शब्द प्रयुक्त किया है-
दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य ।
यह वीर-रस के द्वारा श्रृंगार-रस को पुष्ट करने के लिए है; जहाँ वीर-रस होता है, वहाँ श्रृंगार का भाव परिपुष्ट होता है। श्रृंगार-रस का मित्र है, वीर-रस। रसों में भी आपस में मैत्री होती है। जैसे आप समझो कि श्रृंगार-रस का हो प्रसंग और आँख गुस्से से लाल-लाल हो जायँ तो रौद्र रस आ गया। श्रृंगार में रौद्र रस श्रृंगार रस का शत्रु है। और श्रृंगार-रस का प्रसंग होने, और छाती पीट-पीटकर ‘हाय, हमारी नानी मर गयी,’ रोने लग गये, तो यह करुण-रस जो है वह भी श्रृंगार-रस का शत्रु है। श्रृंगार में रौद्र, भयानक, बीभत्स, करुण, शान्त, सभी शत्रु हैं। शांत-रस भी श्रृंगार-रस में बाधक है। श्रृंगार-रस का प्रसंग होय और समाधि लगाकर बैठ गये, तो वह तो शत्रु हो गया।++
शांत-रस श्रृंगार-रस में बाधक है। श्रृंगार-रस का प्रसंग होय और समाधि लगाकर बैठ गये, तो वह तो शत्रु हो गया! वीर-रस श्रृंगार रस का मित्र है। तो, कैवल्य कैसा चाहिए, देखो- ‘दत्ताभयं च’ पहले तो भगवान् ने डराया था, भय दिखाया था कि- अरे, तुम्हारे पति, पुत्र, पिता, माता, सबके सब भयभीत हो रहे हैं; तुमको डर नहीं लगता हमसे? तुमको धर्म का डर भी नहीं लगता?
गोपी ने कहा-
दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य- ब्रह्म आये थे व्रजवासियों को डराने, वे तो धर्म-विधा के मर्तरूप थे, ब्रह्म सबको शरीर देते हैं, तो वे कर्म के अनुसार देते हैं और स्वयं आये व्रज में और चोर बन गये। स्वयं विधि के विरुद्ध कर्म किया उन्होंने और ब्रह्मा किसी का बाल बाँका न कर सके। इंद्र, जो लोगों को हाथ में बैठकर कर्म की प्रेरणा देता है, व्रज में आया था और उसने व्रज का नाश करने की पूरी कोशिश की थी पर वह भी व्रजवासियों का बाल बाँका न कर सका। जो इन्द्र से बचाता है, वह पाप से भी बचावेगा, अधर्म से भी बचावेगा, सास-ससुर, पति-पुत्र से भी बचावेगा, वह कंस से भी बचावेगा, नारायण!- दत्ताभयं च। हम मानती हैं कि कैवल्य अभय- पद हैः अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। और इसलिए हम उसे चाहती भी हैं। परंतु उसके लिए घनश्याम, जो साधन हमने स्वीकार किया है वह अलीक है।
श्रीकृष्ण ने कहा- नहीं गोपी, लीक से ही चलो। जाओ भाई, थोड़ा शम, दम, उपरति, श्रद्धा, तितिक्षा, समाधान ग्रहण करो, बहिरंग-अंतरंग साधन करो, अंतःकरण शुद्ध करो, मल-विक्षेप-आवरण भंग करो, तुम्हें कैवल्य मोक्ष प्राप्त हो जायेगा। गोपियों ने कहा- हम कैवल्य चाहती तो जरूर हैं लेकिन यह बात है कि कहाँ रहकर साधन करें? हिमालय में हम नहीं जायेंगी, और अपने बन्द कमरे में भी अकेली नहीं रहेंगी। तो फिर-
‘दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य’ ये जो हृष्ट-पुष्ट-बलिष्ठ, तुम्हारे युगल भुजदण्ड हैं, इनको देख करके हमको न तो घर का डर है, न परिवार का डर है, न समाज का डर है और न धर्म का डर है, न ब्रह्मा-इंद्र का डर है, क्योंकि जब इतने बड़े-बड़े दैत्य और दानव आकर व्रज का कुछ नहीं बिगाड़ सके और ब्रह्मा इन्द्र कुछ नहीं बिगाड़ सके, तो जब ये भुजदण्ड हमारे रक्षक हैं तो हम तो अभय-पद को प्राप्त ही हैं।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 47
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योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना |
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः || ४७ ||
योगिनाम् – योगियों में से; अपि – भी; सर्वेषाम् – समस्त प्रकार के; मत्-गतेन – मेरे परायण, सदैव मेरे विषय में सोचते हुए; अन्तः-आत्मना – अपने भीतर; श्रद्धावान् – पूर्ण श्रद्धा सहित; भजते – दिव्य प्रेमाभक्ति करता है; यः – जो; माम् – मेरी (परमेश्र्वर की); सः – वह; मे – मेरे द्वारा; युक्त-तमः – परम योगी; मतः – माना जाता है |
भावार्थ
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और समस्त योगियों में से जो योगी अत्यन्त श्रद्धापूर्वक मेरे परायण है, अपने अन्तःकरण में मेरे विषय में सोचता है और मेरी दिव्य प्रेमाभक्ति करता है वह योग में मुझसे परम अन्तरंग रूप में युक्त रहता है और सबों में सर्वोच्च है | यही मेरा मत है |
तात्पर्य
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यहाँ पर भजते शब्द महत्त्वपूर्ण है | भजते भज् धातु से बना है जिसका अर्थ है-सेवा करना | अंग्रेजी शब्द वर्शिप (पूजन) से यह भाव व्यक्त नहीं होता, क्योंकि इससे पूजा करना, सम्मान दिखाना तथा योग्य का सम्मान करना सूचित होता है | किन्तु प्रेम तथा श्रद्धापूर्वक सेवा तो श्रीभगवान् के निमित्त है | किसी सम्माननीय व्यक्ति या देवता की पूजा न करने वाले को अशिष्ट कहा जा सकता है, किन्तु भगवान् की सेवा न करने वाले की तो पूरी तरह भर्त्सना की जाती है | प्रत्येक जीव भगवान् का अंशस्वरूप है और इस तरह प्रत्येक जीव क अपने स्वभाव के अनुसार भगवान् की सेवा करनी चाहिए | ऐसा न करने से वह नीचे गिर जाता है | भागवत पुराण में (११.५.३) इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है –
य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्र्वरम् |
न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यधः ||
“जो मनुष्य अपने जीवनदाता आद्य भगवान् की सेवा नहीं करता और अपने कर्तव्य में शिथिलता बरतता है, वह निश्चित रूप से अपनी स्वाभाविक स्थिति से नीचे गिरता है |”
भागवत पुराण के इस श्लोक में भजन्ति शब्द व्यवहृत हुआ है | भजन्ति शब्द का प्रयोग परमेश्र्वर के लिए ही प्रयुक्त किया जा सकता है, जबकि वर्शिप (पूजन) का प्रयोग देवताओं या अन्य किसी सामान्य जीव के लिए किया जाता है-अवजानन्ति मां मूढाः – केवल मुर्ख तथा धूर्त भगवान् कृष्ण का उपहास करते हैं | ऐसे मुर्ख भगवद्भक्ति की प्रवृत्ति न होने पर भी भगवद्गीता का भाष्य कर बैठते हैं | फलतः वे भजन्ति तथा वर्शिप (पूजन) शब्दों के अन्तर को नहीं समझ पाते |
भक्तियोग समस्त योगों की परिणति है | अन्य योग तो भक्तियोग में भक्ति तक पहुँचने के साधन मात्र हैं | योग का वास्तविक अर्थ भक्तियोग है – अन्य सारे योग भक्तियोग रूपी गन्तव्य की दिशा में अग्रसर होते हैं | कर्मयोग से लेकर भक्तियोग तक का लम्बा रास्ता आत्म-साक्षात्कार तक जाता है | निष्काम कर्मयोग इस रास्ते (मार्ग) का आरम्भ है | जब कर्मयोग में ज्ञान तथा वैराग्य की वृद्धि होती है तो यह अवस्था ज्ञानयोग कहलाती है | जब ज्ञानयोग में अनेक भौतिक विधियों से परमात्मा के ध्यान में वृद्धि होने लगती है और मन उन पर लगा रहता है तो इसे अष्टांगयोग कहते हैं | इस अष्टांगयोग को पार करने पर जब मनुष्य श्रीभगवान् कृष्ण के निकट पहुँचता है तो वह भक्तियोग कहलाता है | यथार्थ में भक्तियोग ही चरम लक्ष्य है, किन्तु भक्तियोग का सूक्ष्म विश्लेषण करने के लिए अन्य योगों को समझना होता है | अतः जो योगी प्रगतिशील होता है वह शाश्र्वत कल्याण के सही मार्ग पर रहता है | जो किसी एक बिन्दु पर दृढ़ रहता है और आगे प्रगति नहीं करता वह कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, राजयोगी, हठयोगी आदि नामों से पुकारा जाता है | यदि कोई इतना भाग्यशाली होता है कि भक्तियोग को प्राप्त हो सके तो यह समझना चाहिए कि उसने समस्त योगों को पार कर लिया है | अतः कृष्णभावनाभावित होना योग की सर्वोच्च अवस्था है, ठीक उसी तरह जैसे कि हम यह कहते हैं कि विश्र्व भर के पर्वतों में हिमालय सबसे ऊँचा है, जिसकी सर्वोच्च छोटी एवरेस्ट है |
कोई विरला भाग्यशाली ही वैदिक विधान के अनुसार भक्तियोग के पथ को स्वीकार करके कृष्णभावनाभावित हो पाता है | आदर्श योगी श्यामसुन्दर कृष्ण पर अपना ध्यान एकाग्र करता है, जो बदल के समान सुन्दर रंग वाले हैं, जिनका कमल सदृश मुख सूर्य के समान तेजवान है, जिनका वस्त्र रत्नों से प्रभापूर्ण है और जिनका शरीर फूलों की माला से सुशोभित है | उनके अंगों को प्रदीप्त करने वाली उनकी ज्योति ब्रह्मज्योति कहलाती है | वे राम, नृसिंह, वराह तथा श्रीभगवान् कृष्ण जैसे विभिन्न रूपों में अवतरित होते हैं | वे सामान्य व्यक्ति की भाँति, माता यशोदा में पुत्र रूप में जन्म ग्रहण करते हैं और कृष्ण, गोविन्द तथा वासुदेव के नाम से जाने जाते हैं | वे पूर्ण बालक, पूर्ण पति, पूर्ण सखा तथा पूर्ण स्वामी हैं, और वे समस्त ऐश्र्वर्यों तथा दिव्य गुणों से ओतप्रोत हैं | जो श्रीभगवान् के इन गुणों से पूर्णतया अभिज्ञ रहता है वह सर्वोच्च योगी कहलाता है |
योगी की यह सर्वोच्च दशा केवल भक्तियोग से ही प्राप्त की जा सकती है जिसकी पुष्टि वैदिक साहित्य से होती है (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ६.२३) –
यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ |
तस्यते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ||
“जिन महात्माओं के हृदय में श्रीभगवान् तथा गुरु में परम श्रद्धा होती है उनमें वैदिक ज्ञान का सम्पूर्ण तात्पर्य स्वतः प्रकाशित हो जाता है |”
भक्तिरस्य भजनं तदिहामुत्रोपाधिनैरास्येनामुष्मिन् मनःकल्पनमेतदेव नैष्कर्म्यम् – भक्ति का अर्थ है, भगवान् की सेवा जो इस जीवन में या अगले जीवन में भौतिक लाभ की इच्छा से रहित होती है | ऐसी प्रवृत्तियों से मुक्त होकर मनुष्य को अपना मन परमेश्र्वर में लीन करना चाहिये | नैष्कर्म्य का यही प्रयोजन है (गोपाल-तापनी उपनिषद् १.५) |
ये सभी कुछ ऐसे साधन हैं जिनसे योग की परं संसिद्धिमयी अवस्था भक्ति या कृष्णभावनामृत को सम्पन्न किया जा सकता है |
इस प्रकार श्रीमदभगवद्गीता के छठे अध्याय “ध्यानयोग” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ… 🌹


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