महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (039) : Niru Ashra

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महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (039)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

रास में चंद्रमा का योगदान

चंद्रमा पर दृष्टि पड़ी; क्योंकि चंद्रमा ने दो काम किया, एक तो प्रजा का शोक दूर किया- सचर्षणीनामुदगाच्छुचो मृजन्। भगवान को जीवों को सुख पहुँचाने वाला बहुत प्यारा है और दूसरे प्राची दिशा जो है इन्दुपत्नी है। उसके मुख को अनुराग की लालिमा से लाल-लाल कर दिया। देखो- अनुराग रहता है हृदय में और पश्चिम को अंतरंग बोलते हैं और पूर्व को बहिरंग बोलते हैं। ये थोड़ी सी वेदान्त की बात है- पराक् औ प्रत्यक् दो चीज होती है। वृन्दावन व्रज में जो है वह पराक् है- और द्वारिका जो है वह प्रत्यक् है। द्वारिका का प्रत्यक् है पश्चिम और प्रागज्योतिषपुर जहाँ से कृष्ण सोलह हजार कन्याएँ ले आये थे वह पराक् है। पराक् से सोलह हजार ले आये और प्रत्यक् मे सोलह हजार छोड़ दिया। नारायण, यह पराक् और प्रत्यक् की लीला का स्वभाव और स्वरूप हो होता है वह आध्यात्मिक अर्थ हो जाएगा। उसे हम सबको नहीं सुनाते।

तो, अब प्राची के मुख को चंद्रमा ने लाल-लाल अनुराग-रञ्जित कर दिया। भगवान को यही इष्ट है। कहते हैं कि सारी दुनिया प्रेम के रंग में रंग जाय। चंद्रमा हमारी मदद कर रहा है इसलिए उस पर दृष्टि पड़ी। चंद्रमा कैसा है? तो कहा- कुमुद्वन्तम्। माने रात में चंद्रमा को देखकर के खिलाने वाली कुमुदिनी है- हमारे गाँव में उसको कोइन बोलते हैं। संस्कृत भाषा में उसके लिए कुमुद और कुमुदिनी दोनों शब्द चलते हैं। यह हलन्त कुमद् शब्द भी है और अदन्त कुमुद शब्द भी है। कुमुद्, कुमुद और कुमुदिनी तो चंद्रमा ‘कुमुद्वान्’ है- माने पृथ्वी में जिससे मोद हो आमोद हो उसका नाम कुमुद। चंद्र को देखकर कुमुद् खिल गयी। बच्चे इनको देखकर खूब खुश होते हैं। हम लोग तो पोखर में से निकालकर माला बनाते थे- जन्माष्टमी के दिन। जैसे फूल से झूला बना लेते हैं, फूल डोले बनाते हैं वैसे कुमुद से सारा घर सजा लेते हैं जन्माष्टमी के दिन। दिन में ले आते बन्द-बन्द और रात को अपने आप खिल जाती है। रात भर खिली रहती, रात को सूखती नहीं। तो उससे पृथ्वी में बड़ा आनन्द होता है, इसलिए उसको बोलते हैं कुमुद। तो चंद्रमा कैसा है? कहा कुमुद्वन्त है।*

कल आपको बताया था कि चंद्रमा एक है आकाश में और कोइन लाखों हैं धरती में मिलने का काम नहीं- यह नहीं कि चंद्रमा की छाती से जाकर लगती हों, अरे, चंद्रमा से कुछ किरणे निकलती हैं और उनसे ही सब की सब खिल जाती हैं। भगवान बहुत प्रसन्न हुए कि देखो- ये आपस में सौवतिया डाह नहीं करती हैं। एक प्रेम करती हैं। चंद्रमान ने हमारे लिए आदर्श कर दिया। हजार-हजार गोपी कृष्ण से प्रेम करेंगी और सब कृष्ण को देख करके प्रसन्न होंगी। एक दूसरी गोपी से रागद्वेष नहीं करेगी। सापल्य नहीं करेगी, सौतिया डाह नहीं करेगी। भगवान उससे प्रसन्न होते हैं जिससे पृथ्वी में आनन्द आवे। यदि चार आदमी हँस रह हों और एक रोता हुआ आ जाए तो क्या होगा? सबको चुप होना पड़ेगा, कि भाई इसको क्या तकलीफ है, जरा सहानुभूति दिखलाओ। तो चार आदमी को हँसते से रुला देना, यह मनहूस आदमी का काम है। और चार आदमी मनहूस बैठे हों और एक आदमी हँसोड़ आ जाय, हँसता हुआ तो चारों की बत्तीसी दीख जायेगी। तो कुमुद्वन्तं का अर्थ है कि चंद्रमा इतना प्यारा है कि उसको देखकर सब कुमुद खिल रहे हैं। इसलिए भगवान भी चंद्रमा को देखकर खिल गये। यदि चंद्रमा से सृष्टि में कोई प्रेम न करता तो चंद्रमा को देखकर भगवान खुश नहीं होते- ‘दृष्ट्वा कुमुद्वन्तम्’।

दूसरी बात क्या है चंद्रमा में? ‘अखण्डमण्डलम्’। चंद्रमा आज खण्डमण्डलम नहीं है, अखण्ड मण्डल है। अखण्ड मण्डल का अर्थ है कि कोई न्यूनता नहीं है। जैसे, देखो- किसी भलेमानुष के सामने जाना होता है तो गाल पर काजल लगावें, बाल बिखरे हुए हों, यह तो जाने का ढंग नहीं है। भाई! जब भले मानुष के पास जाते हैं तो सजधजकर जाते हैं, बनठनकर जाते हैं, श्रृंगार करके जाते हैं। तो चंद्रमा आज प्रतिपदा का नहीं है, द्वितीया- तृतीया का नहीं है, अष्टमी एकादशी का नहीं है, पूर्णिमा का चंद्रमा है। सबसे बड़े सौभाग्य की बात तो यह है कि भगवान के सामने जाना हो रहा है और उसमें भी अपने अन्दर कोई कमी लेकर जाय? सारी कमी तो उसी दिन छूट गयी, जिस दिन भगवान सामने हुए। ‘अखण्डमण्डलं’ का अर्थ है कि आज निष्कलंक चंद्रमा का उदय हुआ।**

निष्कलंक चंद्रमा। विष नहीं लगा है। उसने कहा- आज तो भगवान भरी आँखों से देखेंगे; आज भी यदि अन्दर विष का कलंक लगा रहा तो भगवान के नेत्रों पर उसका असर पड़ेगा। इसलिए अपने में जो कालिख लगी है, जो कलंक लगा है, उसको छोड़कर चंद्रमा आज उदय हुआ। और फिर भगवान के सामने भी जाय और न्यूनता रहे, इसमें भगवान की बदनामी भी तो है कि भगवान का भक्त हो गया परंतु कलंक का दोष नहीं छूटा- अखण्डमण्डलम्। इसका अर्थ हुआ कि न तो काल का प्रभाव है चंद्रमा पर काल के प्रभाव से चंद्रमा द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी को कम होता है, उस प्रभाव से चंद्रमा मुक्त हो गया; और न कर्म का प्रभाव है चंद्रमा पर। यह वह कर्मवाला चंद्रमा नहीं है जिसको मुनि ने सहस्र भग हो जाने का शाप दे दिया था और जिसमें मुनि की मृगछाला की मार से छेद हो गया था। अहिल्या के संबंध से चंद्रमा में कलंक है और दक्ष के शाप के संबंध से क्षीणता है, क्षय है। तो आज जो चंद्रमा उदय हुआ है वह तो भगवान के मन में उदय हुआ है अतः कलंक और क्षयदोष से मुक्त अखण्डमण्डल चंद्रमा है।

अखण्डमण्डलं रमाननाभं नवकुंकुमारुणम् ।

रमाननाभं- आज चंद्रमा एक खास बात लेकर आया कि वैसे चंद्रमा के साथ भगवान के कई संबंध हैं- एक तो यदुवंश का आदि पुरुष है चंद्रमा। दूसरे, चंद्रमा अत्रिका पुत्र है, अतः ब्राह्मण है; तीसरे, चंद्रमा साला है भगवान का, बड़ा मधुर संबंध है। आजकल इस संबंध की बहुत महिमा है। कलियुग की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा गया है-

श्याल को बुद्धिदायकः- साला ही बुद्धि देता है। लेकिन द्वापर में भी ऐसा ही था। श्रीकृष्ण थे साले और अर्जुन थे बहनोई। यह आपको मालूम ही होगा। कृष्ण की बहिन सुभद्रा का विवाह अर्जुन से हुआ था। और अर्जुन को बुद्धि देते ही थे। जब समुद्र-मन्थन में-से लक्ष्मीजी और चंद्रमा दोनों निकले थे। अतः लक्ष्मी और चंद्रमा भाई-बहन हो गये। और भगवान के साथ चंद्रमा का रिश्ता जुड़ गया। सारे रिश्ते कट गये और साले का नया रिश्ता हो गया। आज चंद्रमा जब आया तो रमाननाभम्- देख लो, हम लक्ष्मी के भाई हैं। देखते ही लक्ष्मी की याद आयी।

क्रमशः …….

प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹

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