Explore

Search

August 30, 2025 6:31 am

लेटेस्ट न्यूज़

કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

Advertisements

!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!-( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )-!! दुलहा सरकार की झाँकी !! : Niru Ashra

!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!-( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )-!! दुलहा सरकार की झाँकी !! : Niru Ashra

!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!

( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )

!! दुलहा सरकार की झाँकी !!

           ॥ दोहा ॥

बिलसावो श्रीहरिप्रिया, देखूं सहचरि होय ।
सरबस तन मन सखिन के, प्यारी प्यारौ सोय ॥
प्यारौ हरिप्रिया प्रान कौ, सुखदा सबहीं कौ जु।
लाड़लड़ीली बनीको, बना बन्यौ नीकौ जु॥

            !! पद !! 

लाड़िलौ बना बन्यौ अति नीको लाड़लड़ी बनरी कौ । •
सुही पाग सिर पेच सुनहरी और मौर मोती कौ ॥
उज्जल अछित सहित सोहैं बर दियें तिलक रोरी कौ ।
● कंजन खंजन गंजन अँखियाँ अंजन रंजन जी कौ ॥
चितवनि चारु महा मनमोहें को है कांत रती कौ ।
सुंदर वदन रदन रस राचे छियें छोर उतरी कौ ॥
बागौ अँग लागौ रंगभीनौ पटुका हरी जरी कौ ।
रंग रंगीलौ छैलछबीलौ ओपति ऐंन अमी कौ ॥
श्रीहरिप्रिया प्रानधन सरबस सुखदायक सबहीं कौ ॥ १५४॥

हे रसिकों ! निकुँज की लीला अबूझ है …इसे बड़े बड़े ब्रह्मा आदि नही समझ पाते तो साधारण प्राणियों की बात ही कहाँ है । क्यों अबूझ है ? इसलिए कि यहाँ का “रस ब्रह्म” “अनावृत” है ….सामान्य प्राणी ईश्वर भगवान या परमात्मा में ऐश्वर्य ही देखता है …उसे दीखता भी वही है ….उस ऐश्वर्य रूप परमात्मा में माधुर्य है …किन्तु अर्जुन कहता है …मुझे आपके विराट ऐश्वर्य का दर्शन करना है तो उसी समय विराट ऐश्वर्य प्रकट हो जाता है ….और माधुर्य छुप जाता है । किन्तु यशोदा मैया के आगे तो ये सम्भव नही होता …विराट रूप अपने मुख में कन्हैया मैया को दिखाते तो हैं पर कुछ ही क्षण में ऐश्वर्य दब जाता है …माधुर्य प्रकट हो जाता है …मैया यशोदा मानने को तैयार ही नही होती कि मेरे लाला में ऐश्वर्य है । रास लीला के प्रसंग में भी जब श्रीकृष्ण चतुर्भुज रूप लेकर गोपियों को दिखाई देते हैं तब चतुर्भुजी को देखकर गोपियाँ हाथ जोड़ने लग जाती हैं …उस समय ऐश्वर्य दब जाता है और माधुर्य उभर आता है । अब इधर आइये अपने निकुँज में ….निकुँज में ऐश्वर्य है ही नही …पूर्ण माधुर्य भरा हुआ है । यहाँ रसवंती सखियों ने ऐश्वर्य को समाप्त ही कर दिया …और रह गया मात्र शुद्ध माधुर्य । तभी तो निकुँज के ये अधिपति अपनी प्रिया को हाथ जोड़ते हैं….पाँव पड़ते हैं । नही नही , अपनी प्रिया को ही हाथ जोड़ते होते है ….तो भी कोई बात नही थी ….ये तो अपनी सखियों के भी पाँव पड़ते दिखाई देते हैं ….अजी ! इनका भेद तो निकुँज की इन सखियों ने ही खोल के रख दिया है …दिखावा है ऐश्वर्य तो …इनके भीतर भरा हुआ है पूर्ण माधुर्य ….उसी को उघाड़ कर रख दिया…इन निकुँज की अलियों ने । इसी निकुँज रस का उन्मुक्त हो पान करो रसिकों ! ।

*दिव्य निकुँज में वो दिव्य विवाह मण्डप …जिसमें प्रिया लाल जू विराजे हैं ….लाल जू अति आसक्त हैं अपनी प्रिया के प्रति । इसलिए वो हरिप्रिया को कहते हैं …मेरी दुलहन को सजाओ ….और मुझे मिलाओ …..ये कहते हुए लाल जू भाव में डूब गये थे ….तब सखियाँ हरिप्रिया से पूछती हैं कि – सखी जू ! आपको क्यों कह रहे हैं , स्वयं भी तो प्रिया जू का शृंगार कर सकते हैं ना ? तब हरिप्रिया सखी कहती हैं ….नही , नही सखियों ! हम सखियाँ ही इस निकुँज में मुख्य है ….ये कहते हुए गर्व से फूल गयीं थीं हरिप्रिया । हम मुख्य है यहाँ ….क्यों कि हमारे सर्वस यही युगल किशोर हैं ….जिनके सर्वस युगल किशोर होते हैं ….वही सम्पूर्ण में श्रेष्ठ और ज्येष्ठ कहलाता है ….हम तो इन्हीं के लिए हैं , हरिप्रिया फूली फूली कहती हैं ….हमारी आज्ञा के बिना यहाँ किसी का प्रवेश नही है ….और “सखी भाव” बिना तो उस विहार का दर्शन ही सम्भव नही है ….इसके बाद फिर हंसती हैं हरिप्रिया और कहती हैं ……श्याम सुन्दर के प्राण हैं श्यामा जू …और श्यामा जू के प्राण हैं श्याम सुन्दर ….और सखियों ! हम सबके प्राण हैं ये दोनों ।

हरिप्रिया कुछ देर यहाँ मौन हो जाती हैं ..फिर कहती हैं …अब निहारों इन युगल को …कैसे करोड़ों काम को भी लज्जित करके बैठे हैं ये । अद्भुत रूप माधुर्य से भरे हैं …आज तो कुछ ज़्यादा ही सुन्दर लग रहे हैं । हरिप्रिया निहारती हैं …उनकी सखियाँ भी अपलक निहारती हैं …फिर कहती हैं …सखी जू ! आज दुलहा जो बने हैं …ये कहते हुए समस्त सखी समाज खिलखिला जाता है ।

प्रिया प्रियतम के विवाह उत्सव के अवसर पर धूम मची है निकुँज में …सखियाँ उत्साह-उमंग में सोहिलो गाती हैं ..उनका गायन मधु वर्षा की तरह निकुँज में बरस रहा है ..चारों ओर आनन्द ही आनन्द छाया है ।

हमारी लाड़ली आज दुलहन बनी हैं …और लाड़लौ अपनी प्यारी के लिए दुलहा बन कर बैठे हैं …..दोनों की छवि देखते ही बन रही है ….दुलहा रूप में लाल जू ने सिर पर सुनहरी शाही पाग धारण की हुई है ….उस पाग पर सिर पेंच और मोतियों का मौर धारण किया है ….ये तो कोटि कामदेव को भी मोहित कर देने वाला भेष था । तभी हरिप्रिया सखी ने आकर लाल जू के आँखों में काजल लगा दिए ….वैसे ही इनके नयन सुन्दर , उस पर काजल और लग जाने से तो सुन्दरता और और बढ़ गयी थी । खंजन पक्षी के अहंकार को गलित कर दिया था इन दुलहा सरकार के नयनों ने …..आह ! क्या तिरछे नयन , बड़े बड़े नयन , कजरारे नयन । सखियाँ देख देखकर मुग्ध हैं ….वो कुछ बोल ही नही पा रहीं । तभी प्रिया जू ने लाल जू के कान में कुछ कहा …तो लाल जू हंसे …सखियाँ तो बाबरी हो उठीं ….देखो ! इनकी दंतपंक्ति कितने सुन्दर है ..इसकी छवि तो सीधे हमारे हृदय में जा रही है । अद्भुत रूप बना है आज । और देखो तो ! कितना सुन्दर बागा , रंग विरंगा बागा धारण कर रखा है आज तो इन दुलहा सरकार ने …और इसके ऊपर हरे रंग की जरी का पटका ….और बस सखियों ! आज तो देखते ही बन रही है इनकी शोभा …..सखियाँ चंचल हो उठी हैं । हे सखियों ! हमारे छैल छबीले रंग रसीले दुलहा तो वो रस बरसा रहें हैं जो अमृत से भी ऊँचा रस है …अमृत भी इसके आगे तुच्छ है । तभी हरिप्रिया सखी उठकर खड़ी हो जाती हैं और उनके साथ सब सखियाँ , सब नाच उठती हैं ….कोई कोई मधुर स्वर में गा भी रही हैं …और देखते ही देखते लताओं ने देवताओं की तरह पुष्प बरसाने शुरू कर दिए थे । चारों ओर बस जय जयकार हो रही थी ।

क्रमशः ….
!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!

( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )

!! भाँवरि में मन भरमावौ री !!

गतांक से आगे –

ये पद आज सब गायें …….

            !! दोहा !! 

सबहीं के सुखदा दोउ , बना बनी बिबि रूप ।
चित लगाय चित चौंप सौं , चौंरी रचो अनूप ।।

                   !! पद !! 

दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री , छबि निरखत नैंन सिरावौ री ।
चौरी रचि रंग रमावौ री , बिहँसन की बेदी बनावौ री ।।
सुख आसन पर पधरावौ री , हित को गठजोर जुरावौ री ।
भाँवरि में मन भरमावौ री , सु बिधोकत बेद पढ़ावौरी ।।
जूवा जुग जोरि खिलावौरी , हठडोरन छोर छुरावौ री ।
गुन भरी जू गारी गावौ री , छबि देखि देखि बलि जावौ री ।। 155 !

*चलिए निकुँज में …..क्या रस है , क्या रंग है …उत्सव-उत्साह से भरा हुआ है ये निकुँज । सरोवरों में कमल खिल गए हैं ….उनमें भँवरे गुनगुना रहे हैं …लताएँ मत्त होकर अपने में पुष्प खिला रही हैं और वही पाँवड़े भी बिछा रही हैं …..सखियों की अलग अलग टोली है …..पर सब युगल पर प्राण न्योछावर कर रही हैं ……कोई इन नवल किशोर को निहार रही हैं तो कोई निहारते हुए मत्त होकर नाचने लग जाती हैं ….किसी को इन नव दम्पति के दर्शन करके इतना आनन्द आरहा है कि वो उच्च स्वर में गाने लगती हैं …तो कोई सेवा में लगी हैं ….ब्याह में अब जो जो सामग्री आवश्यक है …वो उन सबको जुटाने में लगी हैं । एक सखियों की मण्डली है …जो वाद्ययंत्रों को बड़े भाव से बजा रही हैं ….उनके पास वीणा है , मृदंग है , शहनाई है ….बाँसुरी लेकर भी एक सखी मधुर स्वर दे रही है । एक सखी तो बस तन्मय होकर बीरी ( पान ) बना रही है …जिसे चरबित करके इन युगल के अधर और खिल जाएँ । एक सखी मेवा आदि सजा रही है ।

आहा ! चारों ओर पवन मन्द गति से बह रहे हैं ….पवन सुगन्ध लेकर बह रहे हैं ….अद्भुत सुगन्ध है …जिसका वर्णन सम्भव नही है ….बस – अनुभव कीजिए ।

इस तरह पूरा निकुँज उन्मत्त है ……

हरिप्रिया सखी जू के आनन्द का कोई ठिकाना नही हैं ….वो कभी नृत्य करती हैं …कभी गायन करती हैं …कभी ऐसे ही प्रेम में उन्मत्त होकर युगल के ऊपर पुष्प छोड़ने लगती हैं ।

यहाँ अब श्रीरंगदेवि जू की आज्ञा पाकर हरिप्रिया अपनी सखियों से कह रही हैं ….

हे सखियों ! अपना चित्त इन युगल सरकार में लगाओ …ये “सुखदा” हैं ….हम सबको सुख देने वाले हैं ..इसलिए सुखदा हैं ..आहा ! दुलहा दुलहन रूप में कैसे बने ठने बैठे हैं ..इनमें ही अपने चित्त को लगाकर रस उमंग से भर जाओ । और सुनो ! सुन्दर प्यारी सी एक चौंरी की रचना करो ।

( ये चौंरी , चँवर की तरह होता है …जिसे ब्याह आदि में दुलहा दुलहन पर ढुराया जाता है )

अपनी प्रमुख सखी हरिप्रिया की बातें सुनकर सखियाँ प्रमुदित हो उठीं ……

किन्तु हरिप्रिया तो बोलते बोलते भाव में डूब रहीं हैं …अब वो कहती हैं ….अरी सखियों ! ये विवाह है …और किसी और का नही …अपने लाड़ली लाल का विवाह है …इसलिए इन “विवाह रूप” को बड़े प्रेम से लाड़ लड़ाऔ ….इस विवाह रूप को अपने इन नयनों से निहार कर शीतल करो । सुन्दर चौंरी बनाकर उस सुन्दर चौंरी में अपने को रमा लो । हँसन की वेदी बना दो …हरिप्रिया कहती हैं …ब्याहुला में हास्य , यही तो मुख्य होता है …इसलिए सखियों ! मेरी बात सुनो ….उस हँसी-ठिठोली की बेदी में इनको बैठाओ । ऐसे नही ..हरिप्रिया कहती हैं …सुख रूपी आसन उस बेदी में बिछाओ …और हित यानि प्रेम का गठबन्धन करके इन्हें सुख प्रदान करो । हरिप्रिया ये कहते हुए मौन हो जाती हैं …कुछ देर तक समस्त सखियों की भी यही दशा रहती है ।

हरिप्रिया अब कुछ होश में हैं ….वो कह रही हैं …हे सखी ! भाँवरि में अपने मन को खिलने दो …इन दोनोंकी जब भाँवरि होगी …ओह ! क्या सुन्दर झाँकी होगी वो …और हाँ , हरिप्रिया इधर उधर देखती हैं …तो उन्हें एक गोरी छोटी सी सखी दीखती हैं …हरिप्रिया की ही सखी है ये …उसको बुलाती हैं …और कहती हैं …तुम्हारे साथ और भी सखी थीं ना ! वो सखी अपने साथ की अन्य सखियों को भी संकेत से बुलाती है ..”तुम्हें वेद मन्त्र पढ़ना है” हरिप्रिया कहती हैं । ये सुनकर वो सखी मुस्कुराती है । सरकार भाँवरि लेंगे …तुम सब मिलकर विधि अनुसार वेद मन्त्र का पाठ करना । हरिप्रिया जू की बात सुनकर वो सब सखियाँ प्रमुदित हो उठीं हैं ।

“इसके बाद तो युगल सरकार को हम जुवा खिलाएँगी”। हरिप्रिया कितनी आनंदित थी ये कहते हुए ….”और हरायेंगी अपने लाल जू को , फिर देखना इनका मुकुट लाड़ली जू के चरणों में रखवाएँगी” …एक सखी तुरन्त बोली ….”ये तो अभी भी रखने के लिए तैयार हैं” सब हंसने लगीं । आहा ! सुख की मानौं बाढ़ ही आगयी है ।

फिर लाल जू से कहकर हठ पूर्वक प्रिया जू के हाथ का बन्धन खुलवायेंगी …..अरी सखियों ! गारी तैयार रखना …उस समय इनको खूब गारियाँ देंगी । हरिप्रिया की बातें सुनकर सखियाँ बोलीं …लाल जू को गारी देंगीं ? हरिप्रिया हंसते हुए बोलीं …ऐसी वैसी गारी नही ….गुन भरी गारी ….इनमें जो जो गुन हैं ना , उसी को गाते हुए गारी देंगीं । इसमें गुन हैं भी क्या ? एक सखी के ये कहने पर पूरा सखी समाज ही खिलखिला पड़ा था …..”गुन तो हमारी प्रिया जू के कारण हैं ..इनमें काहे का गुन”…..ये सुनकर हरिप्रिया खूब हंसने लगीं ….फिर हंसते हंसते नव दुलहा को देखकर तृण तोड़ बलैयाँ लेते हुए सखियाँ सुख सरिता में अवगाहन करने लगी थीं ।

हे रसिकों ! सखियों ने अब तैयारी कर ली है …..ब्याहुला के विधि की ।

क्रमशः….

admin
Author: admin

Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877

Leave a Comment

Advertisement
Advertisements
लाइव क्रिकेट स्कोर
कोरोना अपडेट
पंचांग
Advertisements