महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (062)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
जो जैसेहि तैसेहि उठि धायीं-3
सर्वं पदं हस्तिपदे निमग्नम्
जितना दुःख उसके जीवन में होने वाला था, वह सब दुख भगवान के विरह में एक साथ ही हो गया- दुःसह प्रेष्ठविरह, अपने परम प्रियतम का जो दुःसह विरह हुआ उस विरह के तीव्र ताप से सारे अशुभ प्रारब्ध भस्म हो गये। यह जब प्रियतम का विरह-ताप उठता है- उत्तापि पुटपाकतोऽपि गरल-ग्रामादपि क्षोभणः तो खौलते हुए सोने से भी ज्यादा दाहक होता है और सब जहर एक में मिला दिया जाय तो उनसे भी ज्यादा तेज होता है; वज्र से भी ज्यादा दुःसह होता है, हृदय में शल्य चुभ जाय उससे भी ज्यादा कठिन होता है; कालरा होने पर, हैजा होने पर, जितनी पीड़ा होती है, उससे भी ज्यादा पीड़ा उसमें होती है।श्रीकृष्ण का विरह गोपी के हृदय में उदित हुआ और उदय होने से उसके जो अशुभ प्रारब्ध, जो ज्ञान होने पर भी क्षीण नहीं होते वे विरह ताप की प्रबलता से सारे के सारे क्षीण हो गये। जब अशुभ क्षीण हो गये तब चित्त निर्मल हुआ, सारे पाप-ताप आँसू में बह गये, तब ध्यान में आये श्रीकृष्ण! ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेष निर्वृत्या क्षीणमंगलाः। ध्यान में प्राप्त अच्युताश्लेष, श्रीकृष्ण का आलिंगन प्राप्त हुआ। हृदय में आये श्रीकृष्ण। गोपी का शरीर तो घर में बैठा हुआ, आँखें बंद, किवाड़ी बन्द और ये महाराज, महाचोर न जाने कैसे बीच में घुस आते हैं, छत में से टपक पड़ते हैं। किवाड़ी बन्द का इनके ऊपर कोई असर नहीं पड़े, तालाबन्दी का प्रभाव नहीं, आँख बन्द की बन्द और दिल में घुस गये। और आँख बन्द करके उन्होंने कहा- अरी गोपी! मेरे बिना तुमको इतना कष्ट हुआ। गोपी तो, शरीर से जो बाहर बैठी हुई थी, भीतर से उठकर खड़ी हो गयी, और अच्युत ने अपना आश्लेष- आलिंगन दिया उसको। अच्युताश्लेष- अच्युतस्य आश्लेष, अच्युतः यो आश्लेष। ऐसा आलिंगन दिया, ऐसा गाढ़ा आलिंगन दिया जिसमें गोपी को ऐसा लगा कि हड्डी गयी, पसली गयी, मांस गया, चाम गया अब कुछ नहीं बचा; इतने जोर से दबाया श्रीकृष्ण ने। वह आलिंगन दिया उसको कि घुल-मिलकर एक हो गयी श्रीकृष्ण के साथ और ऐसा आनन्द आया कि- निर्वृत्य क्षीणमंगला-निर्वृत्ति हो गयी; निर्वृत्ति हो गयी माने आवरण- भंग हो गया। वृत्ति की जहाँ निःशेष निर्वृत्ति हो, उसको निर्वृत्ति बोलते हैं और जहाँ वृत्ति माने आवरण का निःशेष अभाव हो गय उसको निर्वृत्ति बोलते हैं। कृष्ण और गोपी के बीच में जो आवरण था, जो परदा था- प्रारब्ध का पर्दा, वासना का पर्दा, संसार के संबंध का पर्दा- सब का सब उतर गया। इन्हीं पर्दों का लिहाफ ओढ़कर जब जीव बैठ जाता है, तो भगवान का दर्शन नहीं होता। अब गोपी के सब पर्दे उतर गये; गोपी नग्न होकर कृष्ण से मिल गयी।+
‘निवृत्याक्षीणमंगलाः’ ऐसा सुख, ऐसा सुख मिला गोपी को कि उसको यदि अपने प्रारब्ध के पुण्य कर्म कोटि जन्मतक फल (सुख) देते रहते तो इतना सुख नहीं मिलता, जितना मन ही मन श्रीकृष्ण का आलिंगन प्राप्त करने से हुआ। इसलिए पाप के फल दुःख और पुण्य के फल सुख जितने उसके जीवन में मिलने वाले थे, वे सब अपना फल देकर नष्ट हो गये। उसका आवरण भंग हो गया। सारे संस्कार निःशेष हो गये। अब तो बाबा, तेरा कोई न रोकनहार, मगन होय मीरा चली। देह की जरूरत प्रारब्ध- भोग करने के लिए हैं, इन्द्रियों की जरूरत प्रारब्ध भोग करने के लिए है, अंतःकरण की जरूरत प्रारब्ध-भोग करने के लिए है, सो कुछ रहा ही नहीं। तब अंतःकरण से, इंद्रियों से और शरीर से संबंध क्यों रहे? सबको छोड़ चली वह। अब एक दूसरा प्रश्न उठाकर और इसका समाधान कर फिर आगे बढ़ता हूँ। प्रश्न यह है कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए मर्यादा में ज्ञान की आवश्यकता होती है। यही वेद का कहना है- तमेव विदित्वातिमृत्युमेति बिना ज्ञान के तो मुक्ति नहीं होती। परंतु व्रज की इस गोपी की तो घर-गृहस्थी से, शरीर से, इन्द्रिय से, अंतःकरण से मुक्ति हो गयी। उधर पुष्टि में भक्ति से मुक्ति होती है।
पुष्टि और मर्यादा का यही भेद है। पुष्टि में भगवत्-शक्ति से मुक्ति होती है और मर्यादा में जीव का थोड़ा प्रयत्न भी काम करता है। देखो, मर्यादा में कितना आपरस मानते हैं और पुष्टि में तो सबसे परे हो जाते हैं। बल्लभाचार्य जी महाराज के सम्प्रदाय की भाषा है यह पुष्टि और मर्यादा। लेकिन ज्ञान से भक्ति होवे कि भक्ति से मुक्ति होवे यह बात उस समय है जब भगवान प्रकट नहीं रहते हैं, भला। जब भगवान प्रकट नहीं होते हैं, अपने ब्रह्मस्वरूप में अन्तर्यामी हैं, निराकार हैं; निर्विकार हैं, एकरस हैं, निर्धर्मक हैं, तब चाहे जीव ज्ञान प्राप्त करें या भक्ति प्राप्त करें तब मुक्ति होती है। लेकिन जब भगवान स्वयं प्रकट हो जाते है, तब जीव को मुक्ति के लिए ज्ञानभक्ति की जरूरत नहीं होती।
भगवान प्रकट ही इसलिए हुए हैं कि जिनको ज्ञान नहीं है, उनको भी अपने हृदय से लगा लें और जिनको भक्ति नहीं है उनको भी अपने हृदय से लगा लें; नहीं तो प्रकट होने की जरूरत नहीं है। कंस, शिशुपाल तो यों ही (संकल्प से ही) मर जाते, रावण हिरण्यकशिपु पैदा ही न होते अगर भगवान चाहते। तो अवतार लेने की जरूरत क्या? अवतार लेते हैं भगवान-
नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तेर्भगवतो नृप ।
लोगों का कल्याण करने के लिए भगवान प्रकट हुए। श्रीमद्भागवत में लिखा है कि महाभारत में युद्ध में श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन के रथ में बैठे थे। अर्जुन के बाण में उतना सामर्थ्य नहीं था जितना श्रीकृष्ण की आँखों में और उनके सौन्दर्य में। सबकी आँख खींच लेते थे बिना तीर के, बिना तुक्का के। अर्जुन के रथ पर आगे बैठ गये; बड़े-बड़े वीर जब निशाना मारने लगते, तो उनकी नजर तो चली जाय कृष्ण की ओर। बाण फेंके कहीं और किसी को लगे ही नहीं, और तब तक पाण्डव पक्ष से बाण आवें और उनको मार दें।++
यमिह निरीक्ष्य हता गताः स्वरूपम् ।
श्रीमद्भागवत में यह बात है कि कृष्ण को देख – देखकर मरे और स्वरूप को प्राप्त हो गये। यह तो महाराज। बड़ा विलक्षण है, युद्ध भूमि में तेइस अक्षौहिणी सेना को यों ही मुक्ति देने वाला, आकर व्रजभूमि में प्रकट हुआ और गोपी को अभी पाप लगा है, अभी पुण्य लगा है, अभी उसको पाप-पुण्य से छुटकारा पाना बाकी है? गौडेश्वर सम्प्रदाय के लोग मानते ही नहीं इस बात को। पहले जो मैं बात कर रहा था, वह सुबोधिनी के अनुसार कर रहा था, अब विश्वनाथ चक्रवर्ती की टीका के अनुसारर बात कर रहा हूँ-
दुःसहप्रेष्ठ विरह तीव्रतापधुताशुभाः ।
ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमंगलाः ।।
तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि संगताः ।
जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ।।
वे कहते हैं कि गोपियों में अशुभ तो था ही नहीं। कहते हैं- व्रज के वृक्ष- लता में भी ताप नहीं है। जब उद्धव चाहते हैं कि हम व्रज में बन जाँय, और जब ब्रह्माजी चाहते हैं कि हम व्रज का कोई पौधा बन जाएँ, तो जो वृक्ष जो लता, जो पौधा बनाने के लिए उद्धव और ब्रह्मा व्याकुल हैं, वह वृक्ष कोई पाप से पैदा हुआ है, वह लता कोई पाप से पैदा हुई है, यह कल्पना ही व्यर्थ है। तब वे क्यों उगे हैं? बोले- वे बड़े-बड़े भक्त हैं, प्रेमी हैं। बोले- हम यहाँ लता बनकर रहेंगे और हमारे फूल खिलेंगे तो कृष्ण उनकी गंध लेंगे। हम वृक्ष बनकर यहाँ रहेंगे तो श्रीकृष्ण हमारा फल चखेंगे, हमारी छाया का आनन्द लेंगे; वे तो कृष्ण की सेवा करने के लिए प्रेम के वैवश्य से वृक्ष बने और प्रेम के वैवश्य से लता बने। तो गोपी में यह कहाँ से आया कि पाप-कर्म शेष रहा हो और पुण्य-कर्म शेष रहा हो। तब उसका दूसरा अर्थ करते हैं- दुःसहप्रेष्ठविरह तीव्रतापधुताशुभाः। जिस समय गोपी के हृदय में श्रीकृष्ण के विरह का तीव्र ताप आया, ऐसी आग आयी, ऐसी जलन आयी, कि सारी दुनिया में जितने पाप हैं- त्रैकालिक, भूत में जितने पापी हुए और उनको जो पाप थे, फिर वर्तमान में जितने पाप हैं और उनका जो पाप है और भविष्य में होने वाले जितने पापी और उनका जो पापी होगा- वे सब पाप जो चिदाकाश में, समस्त चित्ताकाशों में संस्काररूप मौजूद थे, थर-थर काँपने लगे। बोले- यदि हम सब पाप इकट्ठे हो जाएँ और किसी एक को इतनी तकलीफ देना चाहें; तो इतनी तकलीफ हम लोग नहीं दे सकते जितना दुःख और जितना ताप यो गोपी श्रीकृष्ण के विरह में भोग रही हैं। फिर महाराज इकट्ठे हुए जगत के पुण्य-
ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेष निर्वृत्या क्षीणमंगलाः ।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹


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