] Niru Ashra: 🌺🙏🌺🙏🌺🙏🌺
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 135 !!
“प्रियतम मिलेंगे” – कुरुक्षेत्र जानें की तैयारी
भाग 1
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ललिता ! रंगदेवी ! सुदेवी ! सुनो ! सुनो !
गहवर वन में आज दौड़ती हुयी आई थी वो चन्द्रावली …….
श्रीजी तो भावावस्था में ही थीं ……..भाव में ही डूबी थीं ……..
पर चन्द्रावली पुकार भी रही थी तो सखियों को ही ।
धीरे बोलो चन्द्रावली जीजी !
ललिता सखी वैसे "जीजी" कहती नहीं चन्द्रावली को .....पर इनकी स्वयं की स्वामिनी जब "जीजी" कहे ....तो सेविका क्यों न कहे ............अच्छा नही मानती सखियाँ चन्द्रावली को ......वैसे "श्रीजी" की सखियों में कोई राग द्वेष नही है .........पर चन्द्रावली स्वयं द्वेष भावना से भरी रहती है .......और विशेष सौतिहा डाह श्रीराधारानी से ही रखती है.........पर स्वामिनी श्रीराधा के मन में कोई द्वेष नही है .....किसी के भी प्रति......इसलिये तो ये सदैव चन्द्रावली को "जीजी" ही कहकर पुकारती हैं ।
धीरे बोलो चन्द्रावली जीजी ! श्रीजी भावावस्था में हैं ।
ललिता सखी नें दूर से आती हुयी चन्द्रावली को समझाया ।
अच्छा ! अच्छा ! सुनो मैं एक बहुत अच्छी सूचना लाइ हूँ ……….अपनी राधा को भी बता देना …….और सुनो ! अब चलना है ………….तैयारी करो ।
पर कहाँ ? वृन्दावन को छोड़कर हम जाएँगी कहाँ ?
और क्यों जाएँ ? रंगदेवी नें आगे आकर कहा ।
कुरुक्षेत्र …………..हम सब जा रहे हैं कुरुक्षेत्र ………….क्यों की सूर्यग्रहण पड़ रहा है …….और सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र स्नान की बड़ी महिमा है …………..वाह ! मैं तो बड़ी प्रसन्न हूँ ……चन्द्रावली अति आनन्दित है ………।
अष्ट सखियों को आश्चर्य हुआ …………..
जीजी ! तुम ठीक तो हो ना ? स्वास्थ ठीक है ना !
कहीं श्याम सुन्दर का विरह मष्तिष्क में तो नही चढ़ गया ?
ये क्या बहकी बहकी बातें कर रही हो जीजी !
ललिता सखी बोलती गयीं ।
बहुत पुण्य मिलता है …….कहते हैं अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है …….भगवान श्रीराजाराम नें जो यज्ञ किया था …….मात्र सूर्यग्रहण में स्नान करनें से उसका फल मिल जाता है ……….ऐसा महर्षि शाण्डिल्य भी कह रहे थे ………..चन्द्रावली बोली ।
जीजी ! तुम पगला गयी हो……क्या ये पुण्य पुण्य कहे जा रही हो ।
क्या तुम्हे पता नही है ……….सारे तीर्थ तो यहीं वृन्दावन में ही लोटते रहते हैं ………..हमारी श्रीजी और श्याम सुन्दर नें ….दोनों युगलवर नें तीर्थों का आव्हान किया वृन्दावन में ……तब सारे तीर्थ यहीं आगये ।
बद्रीनाथ, केदार नाथ, रामेश्वरम्, गया, और तो और तीर्थराज प्रयाग भी यहीं हैं …….हाँ …और ये सब ब्रह्माचल की इस पहाड़ी से सब दिखता भी है…….सारे तीर्थ इस गहवर वन की रज लेनें नित्य आते हैं ……..फिर ये तुम क्या कह रही हो …….कि पुण्य मिलेगा ….तीर्थ में स्नान ……..वो भी सूर्य ग्रहण में …….ये क्या हो गया तुम्हे जीजी ? सखियों को समझ नही आरहा कि चन्द्रावली ऐसा कैसे बोल रही हैं ……..पुण्य का लोभ कब से बृजवासियों को होंने लगा …….अरे ! मुक्ति तक को ठुकरानें वाले बृजवासी ……..आज पुण्य के लिए कुरुक्षेत्र जायेंगें ?
अष्टसखियों को बड़ा दुःख हुआ ………………..
ये कैसी निष्ठा है ? चन्द्रावली ! ये कैसा प्रेम है ?
मुस्कुराते हुए नेत्र बन्द कर लिए चन्द्रावली नें ……….और बड़े प्रेम से बोली ………….वे मिलेंगें !
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –
🌺 राधे राधे🌺
] Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 9 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
जा जु महल के चौक बिचि, मनि मंडल रसपुंज ।
ता चहुँघां सोहनि बनी, अष्ट मोहनी कुंज ॥
मंगल सैंन प्रजंत लगि, सेवा-सुख इन माहिं ।
सिरमनि मोहन महल महा कल्पवृक्ष की छाहिं ॥
॥ पद ॥
सरस मनि मृदुल मनि कनक खचिता । सूर ससि हेममनि कांति रचिता ॥
पद्म अरु पुष्प रागादि राजैं। बिबिध बर चित्रता सों बिराजै ॥
ता जु मधि मृदुल सज्या सहेली । स्याम स्यामा कि जहाँ सुरत केली ॥
और काहू कौ जहाँ नहीं प्रवेसा । बिना श्रीहरिप्रिया लहें न लेसा ॥
”ठीक कहा तुमने यहाँ “प्रणाम”की अपेक्षा “प्रेम” मुख्य है”…..सरोवर से उठते हुए हरिप्रिया सखी ने मेरी बात का ही अनुमोदन किया था और आगे आगे चल दीं थीं ….निकुँज में प्रणाम करना , वन्दन करना इसकी अपेक्षा हम सखियाँ भी युगल को आशीष देने में ज़्यादा रुचि दिखाती हैं ….क्यों कि स्नेह अतिशय है युगलवर के प्रति हम सबमें । चलते हुए मैंने हरिप्रिया जी से पूछा …आप लोग आशीर्वाद देती हैं ? हाँ , देखो ! जहाँ प्रेम ही प्रेम होता है वहाँ प्रणाम नही वहाँ तो हृदय से आशीर्वाद ही प्रकट होता है । क्या क्या आशीष देती हैं आप सब सखी वृन्द ? मैं तेज चाल से सखी जू के पीछे चलते हुए पूछ रहा था ….क्यों की मुझ से तेज वो चल रहीं थीं । ये क्या बात हुई ? आशीष कोई वेद के मन्त्र हैं क्या ? जो वही पढ़ने हैं या उससे इधर उधर न हो ? हरिप्रिया अब रुक गयीं थीं और वहीं खड़ी होकर मुझे बताने लगीं थीं । उस समय हृदय से जो निकले …जीते रहो , या प्रसन्न रहो , या दोनों इसी तरह सुख विलास में विलसो …..ये कहते हुए हरिप्रिया हंसीं ….मुझे देखती रहीं ….फिर मेरे सिर में हल्की चपत मारते हुए बोलीं …..अब मैं जो तुम्हें दिखाने जा रही हूँ उसे ध्यान से देखो । सखी जी के ये कहते ही मैं उस स्थान को देखने लगा था चारों ओर । अद्भुत ! क्या सुन्दर स्थान था वो …..मैं उछल पड़ा ….मैं मुग्ध हो गया ….वहाँ की सुगन्ध भी अत्यधिक मादक थी …कोई भी मत्त हो जाए….
कोई भी यहाँ तक आ नही सकता ! हरिप्रिया जी ने मुझे कहा ।
वो देख रहे हो ? हरिप्रिया तत्क्षण मुझ से बोलीं थीं ।
ओह ! वो तो चमकता हुआ कोई महल है ! उस महल से प्रकाश की किरणें निकल रहीं थीं ….चारों ओर सरोवर थे ….मैंने एक बार वहीं घूम कर देखा , चारों ओर देखा …..जी , चारों ओर सरोवर थे ….और मध्य में ये महल था …..मैं लिख नही सकता कि वो महल कैसा था ….फिर भी प्रयास करता हूँ ……वो महल गोलाकार था ….बिल्कुल गोल …..उस महल के आठ दरवाज़े थे …मैं हरिप्रिया जी को जिद्द करने लगा मुझे उस महल के निकट जाना है ……हाँ हाँ , मुझे स्नेह से भर कर हरिप्रिया कह रहीं थीं ….और धीरे धीरे उस महल की ओर वो चल भी दी थीं ।
ये किनका महल है ? मैंने पूछा ।
तो हंसते हुए सखी जी बोलीं …..सोचो ? सोचो किनका होगा ?
मैं कुछ बोलता उससे पहले ही वो बोल दीं । युगल सरकार का ये महल है । बस ये सुनते ही मुझे रोमांच होने लगा ….ओह ! “मोहन महल” …इस महल का नाम है …सखी जी ने मुझे बताया । वो महल इतना सुन्दर था कि सुन्दरता भी मोहित हो जाए ….मैंने महल का नाम मन ही मन दोहराया …”मोहन महल” …”मोहन महल” । अब हम उस महल के निकट आगये थे …..महल के प्रत्येक द्वार पर शिखर थे ….और प्रत्येक शिखर पर पताका फरहरा रही थी ….और हाँ .पताका पीले रंग की थी उसमें लाल अक्षरों से लिखा था …..!! श्रीराधा !! ….प्रत्येक पताका में यही अंकित था ।
लाल जी का नाम नही हैं ? मैंने पूछा तो हरिप्रिया बोलीं ….लाल जी इसी श्रीराधा नाम से राजी हैं ….उन्हें यही नाम सुख देता है …फिर प्रिय को सुख दे …प्रिया जी और हम सब वही करती हैं ।
हुँ …..मैं आनन्द सिंधु में डूब रहा था , ये सब देखकर, रसार्नव है निकुँज तो , मैंने लम्बी साँस ली ।
प्रत्येक द्वार पर वन्दन वार टांगे गए थे ….और वो वन्दन वार गज मुक्ता के बने थे ….उसकी शोभा अलग ही थी । द्वार सुवर्ण के थे …और सुवर्ण की ही बारीक पच्चीकारी थी । प्रत्येक द्वार के ऊपर “श्रीराधाकृष्णाभ्यां नम :” , ये लिखा था । ये हम सखियों ने लिखा है । हरिप्रिया जी ने हमें बताया । द्वार में कुन्डी आदि सब हीरे के थे ….रत्नों का जड़ाव भी बेजोड़ था ।
ये सब देखते हुए मेरा ध्यान महल के बाहरी दीवार पर गया …ओह ! स्फटिक मणि की दीवार थी ….दर्पण सदृश । और एक अद्भुत बात ये थी यहाँ की…कि चारों सरोवर , अष्ट सखियों के कुँज , मणिमण्डप , वृक्ष , लताएँ , हंस आदि का किलोल …ये सब मोहन महल की दीवारों में प्रतिबिम्बित हो रहा था ….मैं चकित इस बात से था कि ..देखते देखते कभी कभी भ्रम हो जाता कि बिम्ब क्या है और प्रतिबिम्ब क्या है ? मुझे चमत्कृत देखकर हरिप्रिया हंसीं और बोलीं …तुम क्या युगल सरकार को भी ये दीवारें चमत्कृत कर देती हैं….मेरे मस्तक में प्रश्नवाचक चिन्ह उभरे तो हरिप्रिया ने तुरन्त उत्तर दिया ….”मैंने पूर्व में ही कहा है ,यहाँ कुछ भी जड़ नही है”। अब मेरा समाधान हो गया था ….मैं सुख पूर्वक हरिप्रिया जी के पीछे पीछे चलने लगा ।
एक कदम्ब वृक्ष था उसी के नीचे हरिप्रिया जी बैठीं ….इस बार मैं उनके चरणों में बैठा ….उन्होंने अपने संग बैठाना चाहा …किन्तु अब मेरी बैठने की हिम्मत नही थी ….ये तो सिद्धों की भी सिद्ध थीं सखियाँ ।
“यहाँ से निहारो” …….हरिप्रिया जी ने मुझे उस वृक्ष के नीचे आराम से बैठाकर “मोहन महल” को दिखाया था ….हाँ , यहाँ से सुन्दर दिखाई देता है …..मैं भी आनन्द से निहारने लगा ।
मुझे महल के भीतर भी महल दिखाई दे रहा है ? मैंने सखी जी से कहा ।
हाँ , तुम्हें क्या लगता है ये महल छोटा है …..नही …ये “मोहन महल”है ….युगल सरकार का निज महल है ….देखो ! हरिप्रिया जी के कहने से मैं देखने लगा ….मोहन महल में तुम प्रवेश करोगे ना ….तो तुम्हें बाग , सुन्दर सा बाग दिखाई देगा ….फिर उसके चारों ओर महल हैं …तुमने ठीक कहा ….भीतर महल हैं ….आठ महल । ये किसके लिए ? मेरे प्रश्न को सुनकर सखी बोलीं ….युगल सरकार के लिए ! इन आठ कुंजों में अष्टयाम सेवा चलती रहती है ।
मैंने कहा ….फिर मुख्य महल कहाँ है ? मध्य में …..वो देखो ……हरिप्रिया जी ने कहा और मुझे मध्य का महल दिखाई देने लगा । एक विचित्र बात हो रही थी यहाँ ….कि जब मैं देखता तब कुछ नही दिखाई देता जब हरिप्रिया जी कहतीं ….”देखो ,भीतर अष्ट महल हैं”….तब मुझे वो महल दिखाई देने लगते थे ।
चारों महल के मध्य में एक वृक्ष था …..विशाल और घना …..अत्यंत सुंदर वृक्ष था वो ….ये वृक्ष ? मैंने पूछा तो सखी जी ने बताया …कल्पवृक्ष । मैंने नाक भौं सिकोड़ी ….ये तो स्वर्ग का वृक्ष है ! नही , ये निकुँज का कल्प वृक्ष है …..ये प्रेम का कल्प वृक्ष है ….ये सुख बरसाता है युगल के ऊपर ….फिर हंसीं हरिप्रिया जी ….तुम भी क्या तुलना करते हो …अरे कल्पवृक्ष यही है …वो तो इन्द्र को ये नाम प्रिय लगा इसलिए उसने अपने वृक्ष का नाम भी कल्प वृक्ष रख दिया था ….वो कहाँ भोगादि देने वाला स्वर्ग का वृक्ष ! और ये तो परम प्रेम , पराभक्ति प्रदान करने वाला निकुँज रस से सिंचित , प्रिया लाल के प्रेम विहार का साक्षी कल्पवृक्ष …क्या तुलना करती हो ? मैं चुप हो गया था ….क्या बोलता । तुलना गलत कर दी थी मैंने ।
कल्प वृक्ष के नीचे महल था ।
“प्रिया लाल जी का निज महल”…..हरिप्रिया सखी ने कहा …और प्रेमपूरित नयनों से उस महल को देखा ।
“मैं भीतर जाऊँगा”…..मेरी जिद्द व्यर्थ थी …हरिप्रिया सखी ने इतना ही संकेत में कहा ….”और काहू को नाही प्रवेशा” ……मैं चुप हो गया ….कुछ ज़्यादा ही सोच लिया था अपने को । मेरी मनोभावना जानकर हरिप्रिया जी ने कहा ….ज़्यादा मत सोच ….कृपा होगी तो सब होगा …और तेरे ऊपर कृपा है । इतना कहकर सखी जू ने मुझे अपने हृदय से लगा लिया था । आहा ! उनका वो स्नेह से भरा आलिंगन ।
शेष अब कल –
] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 11-12
🍇🍇🍇🍇🍇
श्रुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः |
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् || ११ ||
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः |
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविश्रुद्धये || १२ ||
शुचौ – पवित्र; देशे – भूमि में; प्रतिष्ठाप्य – स्थापित करके; स्थिरम् – दृढ़; आसनम् – आसन; आत्मनः – स्वयं का; न – नहीं; अति – अत्यधिक; उच्छ्रितम् – ऊँचा; न – न तो; अति – अधिक; नीचम् – निम्न, नीचा; चिल-अजिन – मुलायम वस्त्र तथा मृगछाला; कुश – तथा कुशा का; उत्तरम् – आवरण; तत्र – उस पर; एक-अग्रम् – एकाग्र; मनः – मन; कृत्वा – करके; यत-चित्त – मन को वश में करते हुए; इन्द्रिय – इन्द्रियाँ; क्रियः – तथा क्रियाएँ; उपविश्य – बैठकर; आसने – आसन पर; युञ्ज्यात् – अभ्यास करे; योगम् – योग; आत्म – हृदय की; विशुद्धये – शुद्धि के लिए |
भावार्थ
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योगाभ्यास के लिए योगी एकान्त स्थान में जाकर भूमि पर कुशा बिछा दे और फिर उसे मृगछाला से ढके तथा ऊपर से मुलायम वस्त्र बिछा दे | आसन न तो बहुत ऊँचा हो, ण बहुत नीचा | यह पवित्र स्थान में स्थित हो | योगी को चाहिए कि इस पर दृढ़तापूर्वक बैठ जाय और मन, इन्द्रियों तथा कर्मों को वश में करते हुए तथा मन को एक बिन्दु पर स्थित करके हृदय को शुद्ध करने के लिए योगाभ्यास करे |
तात्पर्य
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‘पवित्र स्थान’ तीर्थस्थान का सूचक है | भारत में योगी तथा भक्त अपना घर त्याग कर प्रयाग, मथुरा, वृन्दावन , हृषिकेश तथा हरिद्वार जैसे पवित्र स्थानों में वास करते हैं और एकान्तस्थान में योगाभ्यास करते हैं, जहाँ यमुना तथा गंगा जैसी नदियाँ प्रवाहित होती हैं | किन्तु प्रायः ऐसा करना सबों के लिए, विशेषतया पाश्चात्यों के लिए, सम्भव नहीं है | बड़े-बड़े शहरों की तथाकथित योग-समितियाँ भले ही धन कमा लें, किन्तु वे योग के वास्तविक अभ्यास के लिए सर्वथा अनुपयुक्त होती हैं | जिसका मन विचलित है और जो आत्मसंयमी नहीं है, वह ध्यान का अभ्यास नहीं कर सकता | अतः बृहन्नारदीय पुराण में कहा गया है कि कलियुग (वर्तमान युग) में, जबकि लोग अल्पजीवी, आत्म-साक्षात्कार में मन्द तथा चिन्ताओं से व्यग्र रहते हैं, भगवत्प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन है –
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् |
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ||
“कलह और दम्भ के इस युग में मोक्ष का एकमात्र साधन भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करना है | कोई दूसरा मार्ग नहीं है | कोई दूसरा मार्ग नहीं है | कोई दूसरा मार्ग नहीं है |”
] Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (095)

(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
श्रीकृष्ण में रति ही बुद्धिमानी है
लेकिन- ‘अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे’ हमारे रोम-रोम के स्वामी हो तुम हमारे प्राणनाथ हो तुम, इसलिए तुम हमारी बुद्धि के संचालक हो, हमारे प्रेष्ठ आत्मा हो। अब हमारे पास धर्म की क्या चर्चा? मेढ़-मर्यादा तो वहाँ बनती है जहाँ खेत के या घर के मालिक दो होते हैं। हम तो बाबा, सब दीवार तोड़कर, सारी मर्यादा छोड़कर तुम्हारे साथ मिल गयीं, अब हमारे लिए धर्म का प्रश्न कहाँ है? प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा- संपूर्ण जगत् के प्राणियों के परम प्रियतम, बन्धुरात्मा-बन्धु और आत्मा तुम ही हो। बन्धुरात्मा में दो जने हुए- बन्धु और आत्मा। परंतु यदि एक करना हो तो- ‘बन्धुरात्मा = बन्धुः आत्मा शरीरं मनोगात् च यस्य-बन्धु माने सुन्दर है आत्मा अर्थात् शरीर जिसका, माने श्रीकृष्ण।
गोपी कहती हैं कि तुम्हारा तो तन भी सुन्दर है, मन भी सुन्दर है। हम जानती हैं। तुम्हारा हृदय हमारे प्रति प्रेम से भरा है और हम तुम्हारे प्रेम में अपने-आपको दे चुकी हैं, अब ये बीच में कोई मेढ़-मर्यादा क्यों, चहारदीवारी क्यों? देखो, संसारर में सबसे बड़ा बुद्धिमान कौन है? सब अपने आपको बुद्धिमान् ही समझते हैं। अपनी अकल और दूसरे का धन सब लोग ज्यादा समझते हैं। परंतु असल में वही पुरुष बुद्धिमान है जिसकी रति संसार में न होकर श्रीकृष्ण में, परमेश्वर में रति हो जावे। यह गोपियों का मत है।
हम एक पुरुष से प्रेम करके पैसा पा सकते हैं, इज्जत पा सकते हैं, अपनी तारीफ सुन सकते हैं; मीठी आवाज सुन सकते हैं, उसका स्पर्श पा सकते हैं, उसका रूप देख सकते हैं, उसका ग्रहण त्याग सब कर सकते हैं। उसको अपने भोग का साधन बना सकते हैं। पूरा हो गया तुम्हारा अधिकार। परंतु संसार में इंद्रियों के भोग्य विषय ही समाप्त हो जाते हैं और ईश्वर से जो प्रेम होता है वह इंद्रियों को भोग-वासना से छुड़ाने के लिए होता है। जो राग है, द्वेष है, मोह है, बन्धन है, दुःख है, जो संसार के विषय- भोग में लगा ही रहता है, इस दुःख को सर्वात्मा मिटाने के लिए ईश्वर से प्रेम है। ईश्वर कभी मरेगा नहीं। अगर तुम ईश्वर के साथ ब्याह कर लो तो तुमको विधवापन का दुःख कभी नहीं होगा। अगर तुम ईश्वर के साथ ब्याह कर लो तो तुमको विधवापन का दुःख कभी नहीं ह गा। कहो कि यह स्त्रियों के लिए तो ठीक है, परंतु पुरुषों के लिए?+
अरे, तुम दाढ़ी-मूँछ होने से नहीं समझना कि तुम मर्द हो; जिसको विषय-वासना के कारण नीचे आना पड़ता है, उसमें क्या पुरुषत्व है? तो जब तुम्हें भोग्य ही बनना है तो ईश्वर के भोग्य बनो न। इससे क्या होगा कि संसार में जितने दुःख हैं उनसे बच जाओगे, जन्म से बच जाओगे, संयोग, वियोग, मृत्यु, सबसे बच जाओगे।
अरे, क्या इंद्रियों का भोग ही सब कुछ है? सीताराम कहो। देख लिया हजारों भोग भोगकर संसार में। भोग का अंतिम रूप ग्लानि है, ग्लानि के सिवाय और कुछ नहीं है। देखो, ईश्वर का प्रेम कैसा है? जैसे राष्ट्र से प्रेम करते हैं तो भाई-भतीजे का पक्षपात छूट जाता है, और विश्व से प्रेम करते हैं तो राष्ट्रीयता का मोह छूट जाता है, जब ब्रह्माण्ड से प्रेम करते तो धरती का मोह छूट जाता है, और जब अनन्तों ब्रह्माण्ड के अधिष्ठान ईश्वर से प्रेम करते हैं तो ब्रह्माण्ड का व्यामोह छूट जाता है। होने दो सृष्टि, होने दो प्रलय! तो बुद्धिमानी इसमें है कि आप खोटे सिक्के में ना फँसे। हमने सुना, झूठ कि सच यह नहीं मालूम। सुना कि बम्बई में एक सौदा हुआ, नम्बर दो का सौदा था, रकम बीस लाख थी। जब बीस लाख रूपया आया तो आते ही उसे रख दिया गया, बण्डल-बण्डल देख लिए गये। सौदा हो गया, माल बिक गया, उस पर दूसरे का कब्जा हो गया
जब बण्डल निकाले गये तो उसमें चौदह लाख नकली नोट थे। तो बुद्धिमानी की बात यह है कि नकली में न फँसे। बुद्धिमानी की दूसरी बात यह है कि दुःख अपने घर में ना आने दें। मान लो कि एक मेहमान अपने घर में ऐसा आ गया जिसको हम नहीं चाहते; तो अब तुमको ऐसी अक्ल चाहिए कि उस मेहमान को खिलाकर-पिलाकर कैसे भी चलता कर दें। मेहमान आ गया तो आ गया लेकिन अपने दिल में मेहमान न बनावें; उसमें हम स्वतंत्र हैं। कोई बुद्धिमान् कितना भी होवे लेकिन यदि दिन भर रोवे, दुःखी हो, तो वह बुद्धिमान नहीं है। तुम्हारी बुद्धि किस काम आयी, अगर तुम धोखे से नहीं बचे, नकली से नहीं बचे, मरने वाले से नहीं बचे।++
बुद्धि असल में वही है जो हमें ईश्वर के साथ जोड़ती है। ईश्वर के साथ जुड़ने पर अज्ञान मिट जाता है मोह मिट जाता है, राग-द्वेष संसार का मिट जाता है, सांसारिक दुःख जो मन में आता है वह मिट जाता है।
अनदेखे अनमिले साजन से जो प्रीति है,
वह दुख मिटाने की बड़ी भारी बुद्धि है।
चुनौती देते हैं हमारे महात्मा लोग-
पातालं व्रज याहि? वासवती आर्द्र्हेदां मनसां।
पण्डितराज जगन्नाथ बोलते हैं कि चाहे पाताल में जाओ, चाहे इन्द्रपुरी में जाओ, चाहे सुमेरु शिखर पर चढ़ो, चाहे सात समुद्र पार जाओ, लेकिन तुम्हारी वासना तुम्हें सुखी नहीं होने देगी। तुम्हारे साथ लगी है मन में चिन्ता, शरीर में लगा है रोग बुढ़ापा, शिर पर खड़ी है मौत। यदि तुम अपना भला चाहते हो, अपना कल्याण चाहते हो, तो आओ-आओ! हमारी पाँत में शामिल हो जाओ। श्रीकृष्णेति रसायनं रसय- ये श्रीकृष्ण रसायन हैं, दूसरे जो संसार के परिश्रम हैं वे तो व्यर्थ हैं। संसार में वियोग लगा है, रोग लगा है, मृत्यु लगी है, इसमें प्रेम करने की यदि कोई वस्तु है तो एक परमेश्वर है।
गोपी बोलती है कृष्ण से- ‘कुर्वन्ति त्वयि रतिं कुशलाः’ जो कुशल हैं वे तुमसे प्रेम करते हैं; रति करते हैं। शास्त्री भाषा में रति शब्द बड़ा उत्कृष्ट होता है। रस के पर्व जो चित्त की अवस्था होती उसको रति बोलते हैं। रति भाव है। हमारा मनोविज्ञान दूसरा तरह का है; हम उसमें चेतन मन और अचेतन मन का हिसाब नहीं करते। हमारे मनोविज्ञान में तो संकल्पात्मक मन, विकल्पात्मक मन, निश्चयात्मक मन, अहंक्रियात्मक मन, सर्वातीत मन, आदि मन की अनेक अवस्थाएं होती हैं। भाव-विभाव, अनुभाव, संचारी भाव, व्यभिचारी भाव, स्थायी भाव, ये सब मन में होते हैं रसोदय के लिए। जैसे किसी को वैराग्य में मजा आवे, तो उसे शांत रस अनुभव में आवेगा, ‘वैराग्यरागरसिको भव’- विलक्षण है। निर्वेद जहाँ रति है, स्थायी भाव जहाँ निर्वेद है, वहाँ शांतरस का उदय होता है। स्त्रीविषयक जहाँ रति है, और पुरुषविषयक जहाँ रति है, वहाँ श्रृंगाररस का उदय होता है।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹

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Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877