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August 30, 2025 6:39 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 135 !! (2),!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!&श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 135 !! (2),!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!&श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

Niru Ashra: 🌺🙏🌺🙏🌺🙏🌺

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 135 !!

“प्रियतम मिलेंगे” – कुरुक्षेत्र जानें की तैयारी
भाग 2

👏👏👏👏

बद्रीनाथ, केदार नाथ, रामेश्वरम्, गया, और तो और तीर्थराज प्रयाग भी यहीं हैं …….हाँ …और ये सब ब्रह्माचल की इस पहाड़ी से सब दिखता भी है…….सारे तीर्थ इस गहवर वन की रज लेनें नित्य आते हैं ……..फिर ये तुम क्या कह रही हो …….कि पुण्य मिलेगा ….तीर्थ में स्नान ……..वो भी सूर्य ग्रहण में …….ये क्या हो गया तुम्हे जीजी ? सखियों को समझ नही आरहा कि चन्द्रावली ऐसा कैसे बोल रही हैं ……..पुण्य का लोभ कब से बृजवासियों को होंने लगा …….अरे ! मुक्ति तक को ठुकरानें वाले बृजवासी ……..आज पुण्य के लिए कुरुक्षेत्र जायेंगें ?

अष्टसखियों को बड़ा दुःख हुआ ………………..

ये कैसी निष्ठा है ? चन्द्रावली ! ये कैसा प्रेम है ?

मुस्कुराते हुए नेत्र बन्द कर लिए चन्द्रावली नें ……….और बड़े प्रेम से बोली ………….वे मिलेंगें !

ललिता सखी नें सुना………..चौंक गयी ……..

क्या कहा ……फिर कहना जीजी !

हाँ हाँ हाँ ……….कुरुक्षेत्र में – श्याम सुन्दर आरहे हैं ।

चन्द्रावली के मुख से ये सुनते ही ……..गहवर वन खिल उठा ……मोर कुटी के मोर नाच उठे ………पक्षी एकाएक चहक नें लगे थे ।

सखियाँ मुड़ीं……..श्रीजी को देखा……..आहा ! क्या समय आगया ? अब ये दोनों युगल प्रेमी मिलेंगें ?

चन्द्रावली जीजी ! कब जाना है ?

परसों………वैसे अमावस्या के आने में अभी सात दिन पूरे हैं……पर चन्द्रावली हँसते हुए बोली ………….हम कोई स्नान के लिए थोड़े ही जा रहे हैं ………हम तो अपनें श्याम सुन्दर से मिलनें जा रहे हैं ।

पर चन्द्रावली का ध्यान एकाएक श्रीजी के ऊपर गया ……..कुञ्ज में लेटी हुयी हैं ……..रोम रोम से – “श्याम …श्याम….श्याम….श्याम”

यही प्रकट हो रहा है ।

पर चन्द्रावली एकाएक धम्म् से बैठ गयी …………….

स्वर दुःख से भर गया चन्द्रावली का ।

मेरे खुश होनें से क्या होगा ! मेरे आनन्दित होनें से क्या होगा ……..श्याम सुन्दर कुरुक्षेत्र में मिलेंगें भी तो अपनी राधा से ही ……..मुझ से थोड़े ही मिलेंगें ? मैं हूँ क्या ? उसकी तो राधा ही अब कुछ है ………..मुझे याद है ……….मैं उसके लिए मुकुट बनाती थी …..बाँसुरी बना देती थी ………..वो आता था ………कहता …..चन्द्रावली ! मुझे मुकुट दे ना …………..मोल नही दोगे ? मैं उससे पूछती थी ।

हाँ …हाँ ……माँगो ……….क्या चाहिए मोल ?

मैं कहती …………..बस एक बार मुझे अपनें हृदय से लगा लो ना !

तब वो श्याम मुझ से कहता ……..चन्द्रावली ! अभी मुकुट दे दे ……शाम को आऊँगा …….तब मैं ही तुझे अपनें हृदय से लगाउँगा …….मैं भोली भाली …..मान जाती ……….मुकुट बाँसुरी दे देती …..पर वो नही आता था ………..हाँ ………मैने कई बार देखा …………वो राधा को ही अपनें हृदय से लगाये रखता था …………..और मुझे पता है …….कुरुक्षेत्र में भी वो राधा को ही देखेगा ……….तुम्हे और हमें नही देखनें वाला ………..चन्द्रावली रोते हुए बोली थी ।

तुम तो श्याम सुन्दर से प्रेम करती हो ना जीजी !
ललिता नें सम्भाला चन्द्रावली को ।

बहुत प्रेम करती हूँ ललिता ! चन्द्रावली नें आँसू पोंछते हुए कहा ।

क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –

🌺 राधे राधे🌺
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख” – 10 )

गतांक से आगे –

॥ दोहा ॥

आँगन मोहन महल के, मोहन मंडल मंजु । ता ऊपर अठकौंन कौ, सुख सिंघासन रंजु ॥
कोंन कोंन प्रत्येक इक, प्रिय प्रमदा-गन संग। रुचि अनुसारें सेवहीं, उर अनुराग अभंग ॥
उत्तर श्रीरंगदेवि जू, दिस ईसान सुदेवि । पूरब श्रीललिता सखी, अग्नि बिसाखा सेवि ॥
दक्षिन चंपक लत्तिका, चित्रा नैरितु पेखि । पश्चिम तुंगविद्या सखी, वायुकोंन इंदुलेखि ॥
रंग सुदेवी दुहुँनि कौ, कमल केसरी रंग। जपा सुही के रंग की, सारी सोहै अंग ॥
सेवा भूषन सजत तन, सरस सुगंध सँवारि । भरी रूप रस रंग में, लड़वें जुगल निहारि ॥
ललित बिसाखा दुहुँनि कौ, रोचन दामिनि बर्न । मोर पिच्छ उडुभाँति के, पहिरै पट मन हर्न ॥
बीरी बागे सेव में, सावधान ए दोइ। जुगल रूप में पगि रही, तन मन प्रान समोइ ॥
चंपलता चंपक बरन, चित्रा कुमकुम कांति। नीलरु पीत निचोल निजु, पहिरें बसन सुहांति ॥
सेवा है इनि दुहुँनि कैं, भोजन अरु जलपान । अतिहित सों अरुगावहीं, पावहिं रस बहुबान ॥ तुंगविद्या इंदुलेखिका, गौर बरन हरितार। पहिर सारी फबि रही, पंडुर पुहुप अनार ॥
नृत्यादिक अरु कोक की, कला भेद बहुभाइ । रिझवत सिखवत दुहुँनि कौं, अद्भुतदाय उपाइ ॥ बिबिधि भूमि के भेद हैं, बिबिधि कुंज मनरंजु । नित्य-नित्य नई-नई जहाँ, श्रवत सुखमई संजु ॥ इनिमें श्रीहरिप्रिया कौ, नित्य बिहार अखंड । अंसा-अंसी रूप में, राचि रह्यौ ब्रह्ममंड ॥३॥

*”सखियों की अच्छी ठसक है यहाँ”……मैंने अब श्रीहरिप्रिया जी से कहा था ।

क्यों न हो ठसक ! रास विलास हमारे बिना युगलवर का सम्भव ही नही है । ये कहते हुए थोड़ी फूल गयीं थीं सखी जी । हम सब रास रस की प्रेरिका हैं ….इसलिए हमारी यहाँ मुख्य भूमिका है ….मैंने हंसते हुए कहा ….भूमिका क्या ….आप सखियों के बिना तो निकुँज की कोई कल्पना ही नही कर सकता । मेरी ये बात सुनकर हरिप्रिया जी ने कहा ….नही , हम क्या हैं ….सब कुछ युगलवर हैं ….आनन्द और आल्हाद का विलास ….हम तो उनकी इच्छा शक्ति हैं बस । ये कहते हुए सखी जी ने मेरे सिर में हाथ रख दिया था …तुम भोली हो …मुझे तुम अच्छी लगीं ।
मैं गदगद हो रहा था ….ठसक अब मेरे मन में भी आरही थी ।

“तुम इधर उधर की बातों में उलझ जाती हो …क्या तुम्हें निकुँज का दर्शन आगे नही करना है ?”

थोड़ी नाराज़गी सी दिखाती हुई सखी जी बोलीं ….तो मैं हाथ जोड़कर बोला …नहीं , आपका ही आधार है ….ये कहते हुए मैं उनके आगे झुक गया था ….अच्छा , अब नाटक मत कर । बड़ी आत्मीयता से बोलती हुई सखी जी मुझे “मोहन महल”…के आस पास क्या है …ये सब बताने लगीं थीं । हे रसिकों ! आप भी मेरे साथ हो लो – इस निकुँज यात्रा में ।


वो देखो – “मोहन महल”….जो प्रिया लाल जी का निज महल है । मैं उसी को तो देख रहा था ।

उस “मोहन महल” के सामने आँगन में …..एक सुन्दर “मोहन मण्डल” है । हाँ , हाँ ….वो तो बहुत सुन्दर है …..और गोलाकार में है …..उसमें सिंहासन भी है ….वो सिंहासन कितना सुन्दर है ना ! मैंने हरिप्रिया जी से कहा ….उन्होंने मेरी बात सुनी फिर आगे बताने लगीं ।

शृंगार आरती के बाद युगल सरकार इसी सिंहासन में विराजते हैं ….सखी जी की बात सुनकर अब मैं उस सिंहासन को और ध्यान से देखने लगा था ….वो दिव्य से भी दिव्य था ….सुन्दर से भी सुन्दर ….अद्भुत कारीगरी थी उस सिंहासन की ।

किन्तु इस सिंहासन के आस पास ये छोटे छोटे सिंहासन क्या हैं ? और इन छोटे सिंहासनों की संख्या ….मैंने गिनी …..फिर मैंने कहा – आठ हैं …ये किनके लिए हैं ? वैसे मैं समझ गया था कि अष्ट सिंहासन अष्टसखियों के ही होंगे …..किन्तु मन में ये आया कि युगल सरकार के सामने युगल किंकरी ये सखियाँ नीचे ही बैठेंगी ….सिंहासन में क्यों ? पर मुझे हरिप्रिया सखी जी ने बताया कि …युगल चाहते हैं कि उनकी सखियाँ सिंहासन में ही विराजें …..”युगल सरकार की इच्छा शक्ति हैं हम सखियाँ” ……ये अभी कही गयी बात मुझे स्मरण में आयी थी …..हमें क्या ! हम तो किंकरी हैं …सरकार चाहें सिंहासन में बिठायें या अवनी में बिठायें ….हमें क्या ? हम तो युगल चन्द्र की चकोरी हैं ….हमें तो उन्हें निहारना है बस । इसके बाद मैं कुछ नही बोला ….हरिप्रिया सखी मुझे आगे बताने लगीं-दिखाने लगीं ।

“प्रिय प्रमदागन संग” …..हम सब इनकी प्रिय हैं ….इसलिए हमें ये छोड़ते नहीं हैं …..फिर श्याम सुन्दर भले छोड़ दें ….हमारी स्वामिनी जी तो बिल्कुल नही छोड़तीं , हरिप्रिया ने कहा । और आगे …..इन अष्ट छोटे सिंहासनों में हमारी अष्ट सखियाँ विराजती हैं ….सखी जी ने बताना फिर आरम्भ किया ….. “इनके पीछे खड़ी होती हैं इन युथेश्वरी अष्ट सखियों की सखियाँ” । उन सबके हाथों में सेवा की सामग्रियाँ रहती हैं ….सखी जी के ये कहते ही मुझे वो झाँकी दिखाई देने लगी थी ।

अद्भुत ! मोहन महल के आगे एक मण्डप है ….मोहन मण्डप ….उसमें सिंहासन है जो दिव्यातिदिव्य है …उसमें युगल सरकार गलवैंया दिये विराजे हैं । उनके चारों ओर थोड़ा नीचे ….छोटे छोटे सिंहासन हैं …उसमें सखियाँ हैं ….अष्ट प्रमुख सखियाँ ….उनकी शोभा अलग ही है …और उनके पीछे उनकी अष्ट सखियाँ खड़ी हैं ….सेवा की सौंज लिए । उन सब सखियों का मुख मण्डल दमक रहा था …अनुराग से हृदय पूरित था ।

कैसे विराजती हैं हमारी सखी जू ….सुनो-देखो ….मैं बताती हूँ । हरिप्रिया ने कहा …मैं उनकी बातों को तन्मय होकर सुनने लगा था ।

उत्तर दिशा में जो सिंहासन है उसमें श्रीरंगदेवि जी विराजती हैं ….वो सिंहासन ? मैंने संकेत से पूछा ….हाँ , वही सिंहासन ….उसी में हमारी सखी श्रीरंगदेवि जी …हरिप्रिया ने कहा ।

ईशान कोण में श्रीसुदेवी जी । अब हरिप्रिया बताती गयीं …..पूर्व दिशा में श्रीललिता जी , अग्निकोण में श्रीविशाखा जी , दक्षिण दिशा में श्रीचम्पकलता जी , नैंऋृत कोण में श्रीचित्रा जी , पश्चिम दिशा में श्रीतुंगविद्या जी । हरिप्रिया कहती हैं इन सबके पीछे इनकी सखियाँ खड़ी रहती हैं …जो इनकी आज्ञा पालन के लिए सदा तत्पर हैं । अरी ! यह झाँकी हृदय में उतारो और आनन्द में डूब जाओ । हरिप्रिया इतना बोलकर मन ही मन समस्त सखीजन को प्रणाम करती हैं ।


मैंने अब दर्शन किए ….श्रीरंगदेवि जी के ….इनके अंग से कमल पुष्प की आभा प्रकट हो रही थी …..कमल पुष्प का वर्ण तो कुछ भी हो सकता है ! यहाँ मैंने दर्शन किए सखी जनों के …तो श्रीरंगदेवि जी गौर कमल की आभा से युक्त थीं …कहना होगा अत्यन्त गोरी हैं ये सखी जी ।

श्रीसुदेवी सखी जी के श्रीअंग की आभा केसर के समान थी …..अब इस आभा की उपमा मेरे पास नही है ….इसे जिसने अनुभव किया है वही समझ सकता हैं ।

श्रीरंगदेवि जी की साड़ी लाल रंग की थी …लाल भी नही ….गुड़हल फूल ( जपा कुसुम ) का रंग होता है ना ….वैसे रंग की साड़ी , भावना कीजिए …अत्यन्त गौर वर्ण में लाल भी गाढ़ लाल रंग की साड़ी । बहुत सुंदर लग रहीं थीं श्रीरंगदेवि जू ।

अब उनके पास ही बैठी श्रीसुदेवी जू ने भी लाल रंग की साड़ी ही पहनी थी,
किन्तु ये थोड़ा भिन्न था ।

“श्रीरंगदेवि जू की सेवा युगल सरकार को आभूषण धारण कराने की है”, श्रीहरिप्रिया जी बोलीं ।

और श्रीसुदेवी जू की सेवा ? मैंने पूछा तो उत्तर दिया ….

सरकार को इत्र , फुलेल , चन्दन आदि लगाने की सेवा ।

ये दोनों सखियाँ युगल की लाड़ली हैं ….अनुराग रंग में डूबकर ये सेवा करती हैं ।

हरिप्रिया जी ने ये सब बताया मुझे ।

अब ये हैं श्रीललिता जू ….इनके श्रीअंग की आभा गोरोचन के समान है ….और इनके सम में बैठीं सखी श्री विशाखा जू , इनके श्रीअंग की आभा विद्युत के समान है । अब मैंने भी दर्शन किए श्रीललिता जू के और श्रीविशाखा जू के । श्रीललिता जी ने जो साड़ी पहनी थी उस साड़ी का रंग का मोर के पंख समान । और श्रीविशाखा जू ने जो साड़ी पहनी …उसका रंग था आसमानी ।

श्रीललिता जू की सेवा है ……युगल सरकार को पान देने की । और श्रीविशाखा जू की सेवा है ….युगल सरकार को पोशाक धारण कराने की । हरिप्रिया जी ने ये बताया था ।

अब इनके दर्शन करो …ये हैं श्रीचम्पक लता जी ….इनके श्रीअंग की आभा चम्पा पुष्प के समान है …..और श्रीचित्रा जी के श्रीअंग की आभा पीत पुष्प के समान है । साड़ी धारण करी है श्रीचम्पक लता जू ने नीले रंग की ….और चित्रा जी ने हल्के चन्दन रंग की । हरिप्रिया सखी बोलीं …श्रीचम्पक लता जी की सेवा – “भोजन रुचिकर भोग लगाना” है और श्रीचित्रा जी की जल सेवा है ।

अब आगे देखो …..हरिप्रिया जी बताने लगीं …..श्रीतुंगविद्या जी , इनके श्रीअंग की आभा गौर कान्ति लिए हुए है और इनकी सम में बैठी सखी श्रीइन्दुलेखा जी , इनकी अंग कान्ति गौर और पीत मिला जुला है । साड़ी श्रीतुंगविद्या जू ने पीत और गौर ,दोनों रंग की मिली जुली पहनी है …और श्रीचित्रा जी ने अनार पुष्प के चटक लाल रंग की साड़ी धारण की है ।

इनकी सेवा क्या है ? मैंने प्रसन्न होकर पूछा ।

तो हरिप्रिया जी ने उत्तर दिया …गायन और नृत्य, श्रीतुंगविद्या जी की यही सेवा है । और श्रीचित्रा जू की ? श्रीइन्दुलेखा जी प्रेम परिपाटी युगल को बताती हैं …तो अनोखे उपाय रति रंग को बढ़ाने वाले भी युगल सरकार को यही श्रीइन्दुलेखा जी ही सिखाती हैं ।

इतना कहकर हरिप्रिया बोलीं ….इन सबको प्रणाम करो …ये सखी जू हैं इनकी कृपा बिना इस निकुँज रस को पा नही सकते …इतना कहकर सखी जी ने प्रणाम किया तो मैंने भी उन प्रेममयी माधुर्यमयी सखियों को साष्टांग दण्डवत किया था ।

शेष अब कल –
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 15
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः |
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति || १५ |

युञ्जन् – अभ्यास करते हुए; एवम् – इस प्रकार से; सदा – निरन्तर; आत्मानम् – शरीर, मन तथा आत्मा ; योगी – योग का साधक; नियत-मानसः – संयमित मन से युक्त; शान्तिम् – शान्ति को; निर्वाण-परमाम् – भौतिक अस्तित्व का अन्त; मत्-संस्थाम् – चिन्मयव्योम (भवद्धाम) को; अधिगच्छति – प्राप्त करता है |

भावार्थ
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इस प्रकार शरीर, मन तथा कर्म में निरन्तर संयम का अब्यास करते हुए संयमित मन वाले योगी को इस भौतिक अस्तित्व की समाप्ति पर भगवद्धाम की प्राप्ति होती है |

तात्पर्य
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अब योगाभ्यास के चरम लक्ष्य का स्पष्टीकरण किया जा रहा है | योगाभ्यास किसी भौतिक सुविधा की प्राप्ति के लिए नहीं किया जाता, इसका उद्देश्य तो भौतिक संसार से विरक्ति प्राप्त करना है | जो कोई इसके द्वारा स्वास्थ्य-लाभ चाहता है या भौतिक सिद्धि प्राप्त करने का इच्छुक होता है वह भगवद्गीता के अनुसार योगी नहीं है | न ही भौतिक अस्तित्व की समाप्ति का अर्थ शून्य में प्रवेश है क्योंकि यह कपोलकल्पना है | भगवान् की सृष्टि में कहीं भी शून्य नहीं है | उलटे भौतिक अस्तित्व की समाप्ति से मनुष्य भगवद्धाम में प्रवेश करता है | भगवद्गीता में भगवद्धाम को भी स्पष्टीकरण किया गया है कि यह वह स्थान है जहाँ न सूर्य की आवश्यकता है, न चाँद या बिजली की | आध्यात्मिक राज्य के सारे लोक उसी प्रकार से स्वतः प्रकाशित हैं, जिस प्रकार सूर्य द्वारा यह भौतिक आकाश | वैसे तो भगवद्धाम सर्वत्र है, किन्तु चिन्मयव्योम तथा उसके लोकों को ही परमधाम कहा जाता है |

एक पूर्णयोगी जिसे भगवान् कृष्ण का पूर्णज्ञान है जैसा कि यहाँ भगवान् ने स्वयं कहा है (मच्चितः, मत्परः, मत्स्थान्म्) वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकता है और अन्ततोगत्वा कृष्णलोक या गोलोक वृन्दावन को प्राप्त होता है | ब्रह्मसंहिता में (५.३७) स्पष्ट उल्लेख है – गोलोक एव निव सत्यखिलात्मभूतः – यद्यपि भगवान् सदैव अपने धाम में निवास करते हैं, जिसे गोलोक कहते हैं, तो भी वे अपनी परा-आध्यात्मिक शक्तियों के कारण सर्वव्यापी ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा हैं | कोई भी कृष्ण तथा विष्णु रूप में उनके पूर्ण विस्तार को सही-सही जाने बिना वैकुण्ठ में या भगवान् के नित्यधाम (गोलोक वृन्दावन) में प्रवेश नहीं कर सकता | अतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ही पूर्णयोगी है क्योंकि उसका मन सदैव कृष्ण के कार्यकलापों में तल्लीन रहता है (स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोः) | वेदों में (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ३.८) भी हम पाते हैं – तमेव विदित्वाति मृत्युमेति – केवल भगवान् कृष्ण को जानने पर जन्म तथा मृत्यु के पथ को जीता जा सकता है | दूसरे शब्दों में, योग की पूर्णता संसार से मुक्ति प्राप्त करने में है, इन्द्रजाल अथवा व्यायाम के करतबों द्वारा जनता को मुर्ख बनाने में नहीं |

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