!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!( “सिद्धान्त सुख” – 12 & 13): Niru Ashra

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Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख” – 12 )

गतांक से आगे –

( हे रसिकों ! “रस साधना” एक अद्भुत साधना है ….पता नही क्यों विद्वानों का ध्यान इस ओर गया नही , इसलिए जितना विश्लेषण इसका होना चाहिए था उतना नही हुआ । श्रीवृन्दावन के रसिकों ने ही अध्यात्म जगत का ध्यान इस ओर खींचा , किन्तु रसिकों की भी अपनी मर्यादा थी जैसे – अनधिकारी को न दिया जाए …और रस क्षेत्र से ये साधना बाहर न जाए आदि आदि ।
“महावाणी जी” जो रस साधना का उपनिषद है …..श्रीवृन्दावन से बाहर इसको ले जाने की मनाही थी …और आज भी महावाणी जी के पदों को माईक में नही गाया जाता । किन्तु मेरा अपना मानना है कि इस रस साधना की खूब चर्चा होनी चाहिए ….समालोचना खूब हो विद्वानों द्वारा ….क्यों की इस काल में , ये रस उपासना उपयुक्त है ।

अद्भुत सिद्धान्त है इसका ….नाम , रूप , लीला और धाम । ये चार स्तम्भ हैं इस साधना के …और मूल में ये चारों एक ही हैं ….नाम ब्रह्म है , रूप ब्रह्म है , ब्रह्म की लीला ब्रह्म है और धाम धामी ( ब्रह्म )से भिन्न कहाँ है ?

इनमें से किसी एक को भी पकड़ लो …तो आपको रस साधना का मार्ग मिल जाएगा । अपनी कमियों से ही साधना बनानी है ….काम मन में है …तो काम को उन श्याम सुन्दर में लगा देना है ..प्रिया जी के चरणों की कामना करनी है , क्रोध , सेवा न हो पावे तो क्रोध करो अपने ऊपर , आदि आदि । यहाँ बताया गया है …कि श्रीवृन्दावन प्रिया जी का दिव्य देह है । श्रीवन में जो श्याम सुन्दर की केलि है …वो अपनी प्रिया जी के संग है । श्रीधाम को रस साधना में सर्वोपरि माना गया है …..इसलिए तो रस साधना वाले “श्रीधाम वास” को इतना महत्व देते हैं । अब आगे आप पायेंगे कि ….श्रीवृन्दावन में जो श्याम सुन्दर विहार करते हैं ….वो रस का ही विस्तार करते हैं ….क्यों श्रीवृन्दावन प्रिया जी का देह ही है – हरिशरण )


अंब कदंब जंब निंबू श्री-फल ,चलदल कदली कमनीय।
कुर्बक कुब्ज केतकी केवर, पारिजात रोचिक रमनीय ॥
ठौर ठौर निर्मल जल आसय, मध्य कमल फूले बहुरंग ।
बस मकरंद वृंद मधुकर मिलि, मँडरावत मन भावत संग ॥
नव पल्लव रस सरस ससी की, लसी बसी जोवन बन जाचि।
पाडर परनि निवार नवेली, जुही जुही सों अति रति राचि ॥
त्रिबिध पवन गवनें मन रवनें, सीतल मंद सुगंध सुहाय ।
सब रितु सब सुखदायक लायक, सुरत सहायक सहज सुभाय ॥
सिलसिलाति सलिता छबि छलिता, रस रलिता आवृत अनुकूल ।
अरुन पीत सित असित अमित रिधि, जामधि फूले बहुबिधि फूल ॥

*अब सुन री ! ये जो दिव्य श्रीवृन्दावन देख रही है ना ….ये श्रीप्रिया जी का ही श्रीविग्रह है ….देख ! रूप गर्वित प्रिया जी का ये मंगल विग्रह ! हरिप्रिया सखी मुझे श्रीवन दिखा रही हैं …सच में क्या रूप है इस श्रीवन है ! लताएँ प्रमुदित हैं , इतनी मुदित हैं कि उनमें पुष्प खिल गये हैं …खिल कर भी भार रूप हो रहे हैं …लताएँ पतली हैं और उसमें लगे पुष्प गुच्छ भारी हैं …जिसके कारण लताएँ झुक गयी हैं ।

सर्वप्रथम श्याम सुन्दर प्रिया जी के इस रूप गर्वित शुभ विग्रह श्रीवन की सम्पत्ति का परिरंभन करना चाहते हैं ….श्रीवन की मंगल सम्पत्ति क्या है ? अमरूद , कदम्ब , निम्बू , श्रीफल , केले के स्तम्भ , केतकी पुष्प , पारिजात आदि । श्याम सुन्दर पहले निहारते हैं फिर उनके हृदय में जब रसावेश हो उठता है ….तो श्रीवन की अवनी का स्पर्श करते हैं यानि प्रिया जी की चरण वन्दना , वन्दना – उपासना में ही वो इतने डूब जाते हैं कि प्रिया जी प्रसन्न होकर उन्हें श्रीफल प्रदान करती हैं ….हरिप्रिया मुस्कुराती हैं , कुछ देर यहाँ मौन हो जाती हैं …फिर मुझ से कहती हैं ….ये रस उपासना है …इसमें किंचित भी पुंभाव का प्रवेश नही होना चाहिए , पुं भाव यानि पुरुष भाव , पुरुष भाव यानि अहंकार । मैं समझ गया था इसलिए मैंने सिर झुका दिया ।

अब प्रिया जी और श्याम सुन्दर की रति केलि होती है ….प्रिया जी को स्वेद ( पसीने ) निकलते हैं …..हरिप्रिया उन्मत्त होकर कहती हैं …ये जो जगह जगह तुम जलाशय देख रहे हो ना ! यही हैं रति केलि श्रम से उत्पन्न प्रिया जी का पसीना, स्वेद । और तुम को क्या कहूँ ….ये देखो …इन जलाशय में जो रंग बिरंगे कमल खिले हैं , ये प्रिया जी का मुख कमल हैं जो रति केलि के कारण खिल गए हैं …मुख खिल गया है …नेत्र खिल गए हैं , हृदय खिल गया है …यही कमल हैं । हरिप्रिया जी निकुँज के रहस्यों को आज खोल रहीं थीं ….मैं उनकी रस तत्व की बातें सुनकर चकित था । “किन्तु कमल पर तो भ्रमर मँडरा रहे हैं”…..मैंने इतना क्या कहा ….हरिप्रिया जी तुरन्त बोलीं …श्याम सुन्दर के नयन ही भ्रमर हैं …जो प्रिया मुख कमल में मँडरा रहे हैं । अहो ! मैं चकित । “किन्तु नयन तो दो ही हैं लाल जी के, और यहाँ तो भ्रमर अनन्त हैं”। देखो ! श्याम सुन्दर के मन का मनोरथ भी यहाँ भ्रमर है ….और मनोरथ, लोभी के कितने होते हैं ? हरिप्रिया सखी ने लाल जी को यहाँ लोभी कह दिया था ….रसिक में रस का लोभ नही होगा तो वो रसिक ही नही होगा । फिर ये तो रसिक शिरोमणि हैं । हरिप्रिया सखी मुझे निकुँज का रहस्य जो बता रहीं थीं ….वो सुनकर मैं आनंदित हो उठा था ।

सुन री ! अब देख ! ये जो भ्रमर हैं न , वो गुनगुन कर रहे हैं ….

क्यों कर रहे हैं ?

इसलिए कि कमल से प्रार्थना कर रहे हैं ….हमें चन्द्रमा से झरे हुए अमृत का पान करने दो ।

हरिप्रिया आज मंद मंद मुस्कुरा रही हैं …भ्रमर श्याम सुन्दर हैं …उनका मन है …उनका मनोरथ है ….जो प्रिया जी के अधर अमृत का पान करना चाहते हैं …अमृत इन्हीं अधरों में है …वो प्रार्थना कर रहे हैं । किन्तु कमल मना कर रहा है ….वो हिल रहा है …नही , नही , का मानों उच्चारण ।

किन्तु ये भ्रमर भी लोभी है, ऐसे कैसे रस को छोड़ दे , इसी रस के लिए तो ये जीता और मरता है ।

अब दोनों मिल गये हैं ….कमल मान गया भ्रमर से ….रस उन्मत्त होकर पीने लगा है ।

तभी हवा चल पड़ी ….और हवा भी सुखप्रद , सुवासित , सुहावन ….ये क्या है ? तब हरिप्रिया बोलीं …..अधर रस पिलाने के कारण प्रिया जी के साँसों का आरोह अवरोह चल पड़ा है ।

तभी बसन्त ऋतु का आगमन हो गया …यानि नव यौवन खिल गया …ये रति केलि में सहायक है ।

मैंने जब श्रीवन को निहारा तो मुझे अनुभव होने लगा कि नित्य विहार चल ही रहा है …सब कैसे झूम उठे हैं ….जय हो , श्रीवृन्दावन की जय हो । मेरा जयकार सुनकर हरिप्रिया मुसकुराईं ।

युगल सरकार मिल गए हैं …मिल कर बह रहे हैं रस में ….ये यमुना जी क्या हैं ! युगल अब एक हो गये हैं ….दोनों की कांति …क्यों की जब दो एक होते हैं तब मात्र कान्ति के ही दर्शन होते हैं …और यमुना युगलवर के विग्रह की मंगल कांति हैं । हरिप्रिया आगे कहती हैं …..दोनों जब एक दूसरे में मिल गये …तब देखने वालों को कभी पीत कान्ति दिखाई देती है कभी हरित , कभी लाल ….हरिप्रिया मुझे कहती हैं ….देखो ! ये जो पुष्प खिले हैं ये यहीं हैं ….यही युगल की रंग बिरंगी कांति बाग में खिले पुष्प हैं । इसके बाद हरिप्रिया स्वयं रस समाधि में प्रवेश कर जाती हैं …उन्हें कुछ भान नही …बस उनके युगलवर । बस ।

शेष अब कल –
] Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख”- 13 )

गतांक से आगे –

फूल मूल में मूल फूल में, फूल फूल फल फल हिलि हेज।
प्रति प्रति परम प्रेमपय पोषत, तोषत तरनिं किरनि तन तेज ॥
थलज जलज झलमलित परसपर, प्रतिबिंबित अति ओप अपार ।
खग नग मृग लखि दृगन भये अग, पग भरि करि न सकत संचार ॥
कुंजनि कुंजनि पुंजनि पुंजनि, नित्य-नित्य नव निति नवरंग ।
मंडल महल मनोहर मोहन, जहाँ बिलसत बिबि केलि अभंग ॥
सुभग सेज पर सुभग’ सुंदरबर, रसिक पुरंदर कुँवरकिसोर ।
ब्रीडहिं तजि क्रीडहिं मन मानत, नहिं जानत कित रजनी भोर ॥
करत पान रस मत्त मिथुन मन, मुदित उदित आनंद अधीर ।
सेवत सहज सदा सुख सागर, नागरि नागर गहर गंभीर ॥
सखी सहेली सहचरि सुंदरि, मंजरि महल टहल टग लागि।
कोउ आवति कोउ जाति जतन, जगि अतन अँग संगनि अनुरागि ॥
मान बिरह भ्रम कौ न लेस जहँ, रसिकराय कौ रसमय भौंन ।
जद्दपि अति उत्कृष्टि सृष्टि तउ, कृपादृष्टि बिन पावैं कौंन ॥

****”एक हो रहे हैं , एक हो गये हैं”….रस मग्न हरिप्रिया बोल रही हैं ।
रस सिंधु में इतनी डूबी हैं ये …कि स्पष्ट कुछ नही , सब कुछ प्रतीकात्मक ही । नही नही , मैं इन सखी जी की समीक्षा करने वाला कौन होता हूँ ..साधक , सिद्ध , रसिक और सखी ….इस तरह क्रम है , ये सखी हैं , सबसे ऊँचाई है इनकी तो । कमी मुझ में ही है कि मैं अस्पष्ट समझ रहा हूँ वो तो स्पष्ट ही बोल रही हैं । यहाँ प्रतीकात्मक क्या है ? सब कुछ युगलवर के लीला का विस्तार ही तो है । और युगलवर ही तो हैं यहाँ …जड़ चेतन सब कुछ । फिर …अरी ! यहाँ जड़ सत्ता है ही नही …सब कुछ चैतन्य है ….सच्चिदानन्द है ….नही नही , सच्चिदानन्द घन है ।

कुछ रहस्यमयी बातें सुनेंगे हरिप्रिया जी के ? तो सुनिए ….वो बोल रही हैं ।

“फूल मूल में हैं , और मूल फूल में …फूल फूल से जब मिलते हैं …तो फल ख़ुशी से फूल जाते हैं ….किन्तु फूल जब फूल को हटा देते हैं….तब फूल सूखने लग जाता है …तब सम्पूर्ण श्रीवन की कान्ति प्रकट होती है ….और उस तेज से फूल को ऊष्मा प्रदान किया जाता है …तब जाकर दोनों एक होते हैं ….फिर दो रहते नही हैं”

इस रस को आप समझे ? ये रस ही नही है …गाढ़ रस है ….विशुद्ध रस है ….इसे रसिक ही समझ सकते हैं । हरिप्रिया जी तो यही बोल रही हैं ।

“निज हस्त “कमल”द्वारा लाल जी ने प्रिया जी के चरण “कमल”को छूहा …..फिर चरण “कमल”को अपने हृदय “कमल”में धारण किया ….फिर तो मुख “कमल”से मुख “कमल”का चुम्बन , तब वक्षोज रूपी “फल” प्रसन्न हो उठे …किन्तु प्रिया जी द्वारा नेति नेति ( नही नही ) का उच्चारण लाल जी के मुख “कमल” को सुखा गया …तब प्रिया जी द्वारा सम्पूर्ण श्रीवन रूपी अपने देह की कान्ति का दर्शन कराते ही ..लाल जी का मुख “कमल” खिल गया, और दोनों ,दो से एक हो गये ।

हरिप्रिया सखी जी का आज प्रेम-उन्माद देखते ही बन रहा था …..वो बस बोल रही हैं ..प्रेम का उन्माद जब चढ़ता है …तो वो बोलता ही जाता है …या मौन हो जाता है …यहाँ हरिप्रिया जी बस बोलती जा रही हैं ……ये इनका रसोन्माद है ।

हंसती हैं हरिप्रिया ।

दोनों कमल हैं …थल कमल और जल कमल ।

अर्ध नेत्र मात्र खुले हैं आज हरिप्रिया सखी जू के ..मनौं कोई सिद्ध योगिनी हों ….अरे ! योगिनी इनके आगे क्या है ? अच्छा छोडिये इन बातों को । हरिप्रिया जी कह रही हैं ….दो प्रकार के कमल हैं यहाँ ….और दोनों में होड़ है …एक कमल हैं थल कमल , जो प्रिया जी के अंग हैं ….और दूसरा कमल है ..जल कमल …जो यमुना में खिले हैं । अरी ! ऐसा लग रहा है …कि कमल एक ही हैं …दो नही हैं …किन्तु प्रतिबिम्ब पड़ रहा है थल कमल का यमुना में तो जल कमल दिखाई दे रहे हैं …मूल रूप से थल कमल ही हैं …कमल तो प्रिया जी के सुन्दर अंग ही हैं उन्हीं का प्रतिबिम्ब पड़ रहा है । आज कैसी बहकी बातें कर रहीं हैं ये हरिप्रिया । करेंगीं ही …जब कोई मधु पूरा पी ले …बिना नाप तोल के ….तो उससे क्या आप सावधानी की अपेक्षा करोगे ? यहाँ तो चारों ओर मधु ही मधु है ….इसलिए मत्तता यहाँ सहज है ।

ये है मोहन महल । हरिप्रिया सखी जी ने अब फिर मोहन महल की ओर संकेत किया था ।

मध्य में मोहन महल , यहीं युगलवर नित्य रति रस में डूबे रहते हैं । ये दो , दो नही हैं , एक ही हैं ….इनकी सुन्दर शैया ….जिसमें ये श्रीवन के राजा और रानी विहार में मग्न रहते हैं ।

इन्हें स्वयं पता नही होता कि कब रात्रि हुई और दिवस । ये दोनों ही रस लम्पट हैं । ये कहते हुए हरिप्रिया अब उन्मुक्त हंसीं …निकुँज के पक्षी सब कलरव करने लगे थे ।

कुछ देर बाद हरिप्रिया कहती हैं …..ये युगल रसपान करके उन्मत्त हो उठते हैं ….फिर एक दूसरे को प्रगाढ़ आलिंगन , फिर तो मोद की मदिरा से ये मतवाले हो उठते हैं । ये रसिक वर हैं , रसिक शेखर यही तो हैं । फिर हम सखी जन हैं …जो इनकी ये रति केलि का दर्शन करके अति उत्साहित हो उठती हैं …उमंग से भर जाती हैं ….इनको सुख मिले बस यही कामना बारम्बार आती रहती है मन में …तुम्हें क्या बताऊँ ! जैसे – पपीहा आर्त होकर स्वाति जल का सेवन करता है ..ऐसे ही हम हैं …इनकी रूप माधुरी , रति केलि की उन्मत्तता का दर्शन करके हम सखी जन अपनी प्यास और और बढ़ाती हैं । तृप्ति हमें चाहिए नही , प्यास में ही जीती हैं यही हमारा परम सुख है ।

हरिप्रिया सखी ने अब मेरी ओर देखा था ….तो मुझे भी कुछ हिम्मत आयी ।

सखी जू ! आप के प्रकार कितने हैं ? क्यों कि मैंने देखा सखियाँ तो अनन्त हैं ? फिर इनका विभाग कैसे होता है ? क्या है ?

मेरा ये प्रश्न सुनकर हरिप्रिया जी बोलीं –

पहले “सखी”हैं ……ये सबसे ऊँची हैं …..जैसे – सखियाँ हैं अष्ट , आठ । ये प्रिया जी के समकक्ष ही मानी जाती हैं ….ये सखियाँ नही मानतीं ..किन्तु प्रिया जी अपने समकक्ष इन्हें रखती हैं ….सखी हैं …मैत्री भाव पूर्ण है इनका । ये प्रिया जी को कभी कभी समझाती भी हैं ..जब मान आदि की लीला होती है …तब सखियाँ प्रिया जी को कहती हैं ….आप मान आदि का त्याग कीजिए …..प्रिया जी इनकी बात का आदर करती हैं । ये हैं सखी वर्ग । हरिप्रिया जी ने मुझे अच्छे से समझा दिया था ।

दूसरी “सहेली” हैं ….ये भी आती है सखियों के समकक्ष ही …किन्तु ये सखियों का ज़्यादा आदर करती हैं और अपने को सखियों से कम ही मानती हैं । ( मैंने सोचा – जैसे हितू सहेली और ये स्वयं हरिप्रिया जू आदि ) । अब प्रिया जी की दृष्टि में तो कोई छोटे बड़े का भेद ही नही हैं । “सहेली” से प्रिया जी सलाह भी लेती हैं और कभी कभी अपने हृदय की बात भी बता देती हैं ।

तीसरी “सहचरी” हैं…..ये सेवा में ही अपना ध्यान केन्द्रित रखती हैं ….इन्हें और बातों से विशेष मतलब नही होता ….युगलवर की सेवा और उनके दर्शन यही इनको अभीष्ट है । ये सेवा सामग्री जुटाने में ही अपनी प्रसन्नता देखती हैं ।

चौथी “मंजरी” हैं ……मंजरी में भी प्रकार हैं ….रति मंजरी और रस मंजरी । हरिप्रिया सखी कहती हैं ….इनका रति, रस सेवा के प्रति प्रगाढ़ आवेश है …इनकी सेवा , शैया सजाना …पुष्प बिछाना , और हाँ , इनका जो आवेश है वो अंकुरित अवस्था का रहता है …जैसे कोई बालिका हो उसे अभी अभी प्रेम का रस मिलना आरम्भ हुआ हो …..फिर उसका जो आवेश रहता है …वही आवेश “मंजरी” का है ।

हरिप्रिया कहती हैं ….ये सब निकुँज में सेवा परायण होकर सेवा की घात में ही लगी रहती हैं ।

इन्हें युगल से कुछ चाहिए नही , बस सेवा , युगल की सेवा में ही ये आनंदित रहती हैं ।

ये कहकर हरिप्रिया अब मौन हो गयीं ।

कुछ देर बाद वो मुझे देखती हैं ….मेरे भीतर जिज्ञासा देख वो यही कहती हैं …..देख री ! ये रस भूमि है श्रीवृन्दावन , इस श्रीवन को पाए बिना , इस श्रीवन के रज में लोटे बिना …कोई ऋषि मुनि हो , चाहे कोई योगी या सिद्ध हो , समर्थ से समर्थशाली हो …सिद्धो का सिद्ध हो ….हरिप्रिया कहती हैं ….किन्तु इस श्रीवन की प्राप्ति बिना , श्रीधाम वास बिना ….रस अथवा इस रसोपासना तक कोई पहुँच ही नही सकता । समझी ? मेरे सिर में हाथ रखा मैंने झुक कर उनको प्रणाम किया ….हरिप्रिया जी ने मुझे अपने हृदय से लगा लिया था ।

शेष अब कल –

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