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August 30, 2025 6:39 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 136 !!(Part-3),!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!(“सि – 14),महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (099&100)& श्रीमद्भगवद्गीता:Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 136 !!(Part-3),!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!(“सि – 14),महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (099&100)& श्रीमद्भगवद्गीता:Niru Ashra

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 136 !!

“वे मिलेंगें” – प्रियतम से मिलनें तड़फ़
भाग 3

🌲🌲🌲🌲🌲🌲

वे मिलेंगें !

एकान्त में मिलेंगें………ओह ! मेरी साँसे तेज़ हो रही हैं अभी से ।

मेरी धड़कनें कितनी तेज़ हो गयी हैं…………

उनके मुख से…सौ वर्षों के बाद सुनूंगी……राधे ! ओ मेरी प्यारी राधे !

मैं सुन पाऊँगी ! …….प्यारे के मुख में अपना नाम ?

कहीं मेरी धड़कनें न रुक जाएँ……मेरी साँसे न थम जाएँ ……उफ़ ! ।

कब पहुंचेंगें कुरुक्षेत्र ? अब तो लगता है ……..एक एक क्षण युगों के समान बीत रहे हैं…………

सायंकाल होनें को आया है………जल पान इत्यादि के लिए बैल गाड़ियों को रोक दिया गया है……..ललिता सखी कह रही है ……कि रात्रि तक पहुंचेंगें……..हाँ – द्वारिका के लोग पहुँच चुके हैं ।

मेरा हृदय धक्क करके रह गया है ………….क्या मेरे श्याम सुन्दर भी पहुँच गए हैं ? हाँ …….जब द्वारिका के लोग पहुँच गए …….तो द्वारिकाधीश भी तो पहुँचे ही होंगें…….ललिता मुझे समझाती रहती है ।

अब चल पड़ी हैं सारी बैल गाड़ियाँ ।

हे वज्रनाभ ! इस तरह प्रेम में उन्मत्त श्रीराधारानी अपनें परिकरों के साथ रात्रि में कुरुक्षेत्र पहुँच गयी थीं ।

ग्वालों नें अपनें शिविर स्वयं ही लगा लिए थे…………..

बड़े बड़े राजा लोग भी आये हुए थे ……उनके भी शिविर थे ।

मनसुख कह रहा था की अपनें कन्हैया का शिविर भी इधर ही होना चाहिये ……………मैने इधर उधर दृष्टि दौड़ाई …………।

पागल मनसुख ! “द्वारिका का शिविर” पूछना पड़ेगा ……..वहीँ होगा अपना कन्हैया ………..मेरे भैया श्रीदामा नें ये बात कही थी ।

बहुत भीड़ है………..लाखों लोग हैं यहाँ…………….

पर हम लोग तो अपनें श्याम सुन्दर के लिये ही आये थे ।

हे वज्रनाभ !

श्रीराधा अपनी सखियों के साथ शिविर में चली गयीं ……..सखियों नें शयन की सुन्दर व्यवस्था कर दी थी ……….ग्वालों नें भी अपनी और . … बाबा नन्द यशोदा अन्य सबकी व्यवस्था बना दी थी ।

शेष चरित्र कल –

👏 राधे राधे👏

!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख” – 14 )

गतांक से आगे –

आदि अनादि अक्रीयमान हैं, एक समान सुतंत्र बिलास ।
पारब्रह्म कहियतु हैं इनिकी, पद नख नेंसुक जोति प्रकास ॥
सदा सनातन इक रस जोरी, सच्चिद-आनंदमयी सरूप।
अनंत सक्ति पूरन पुरुषोतम, जुगलकिसोर बिपिनपति भूप ॥
सीस सुहाग छत्र छबि छाजें, रसराजैं रजधानी रीति ।
अग्रवर्ति आगें धरि दंपति, लई सबनि की संपति जीति ॥
बोलें बोल अबोल अबोलें, डोलैं संग लगी सब तीय ।
मन अनुसारनि आज्ञा कारनि, बिबि तन के तन में मन दीय ॥
सेस महेस सुरेस गनेसुर, वंदन हित बंछत पद रेन।
अज अजहु खोजत नहिं पावत, ध्यान मात्र आवत सुहिये न ॥
यह रस दुल्लभ हू ते दुल्लभ, सुल्लभ नित्य रहत हैं ताहि ।
श्रीहरिप्रिया जानि जन जिय में, हिय में अपनावत जब जाहि ॥४॥

*श्रीहरिप्रिया सखी जी आज युगल चरणों में ध्यान लगा बैठीं ….वैसे इनका ध्यान तो सदैव युगल चरणों में ही है …किन्तु आज ये कुछ ज़्यादा ही मग्न हो गयीं और इन्होंने अपने नेत्र बन्द कर लिए…शान्त गम्भीर हो गयीं ।

मैं चारों ओर देखता हूँ ….दिव्य और रस प्रवाहित हो रहा है निकुँज में …..यहाँ युगल सरकार ही हैं जिनका प्रभाव सर्वत्र है । युगल सरकार ? मैं किससे प्रश्न करूँ ….हरिप्रिया जी तो ध्यानस्थ हो गयीं हैं । किन्तु उत्तर तो यहाँ कोई भी दे सकता है …क्यों की सखी जी ने ही कहा था – “यहाँ कोई जड़ नही हैं”।

युगल सरकार ? जी , आदि अनादि हैं युगल सरकार । मुझे श्रीवन ही उत्तर देने लगा था ।

आदि अनादि का अर्थ है ? जो सबके मूल में हैं , और सबसे प्रथम हैं । सबसे प्रधान भी यही हैं ….नित्य और शाश्वत भी । आहा ! ये रस रूप युगलवर ही सबके मूल में हैं ! ये युगलवर ही सब भगवद्रुप के प्रधान हैं ! ये सहज हैं ! इनका ये रतिविलास भी सहज है ! और मैंने ये भी अनुभव किया कि ….इस निकुँज प्रेमराज्य में सेव्य , सेवक , और सेवा की सामग्री सम्बन्धी जो कुछ भी है , या प्राप्त हो रहा है …ये सब सहज है ….युगलवर को इसके लिए तनिक भी चेष्टा नही करनी पड़ती । और ये रस विलास निकुँज का , अपरिवर्तनशील है । युग के युग बीत गये ..कल्प के कल्प बीत गए …अनन्त इन्द्र और अनन्त ब्रह्मा बदल गये …अनन्त बार सृष्टि हो गयी और प्रलय भी हो गया …किन्तु इन रसिक जोरी का रस विलास कभी खतम नही हुआ …ये चल रहा है …ये चलता रहेगा ….क्यों की ये युगल स्वाधीन हैं ।

ये ब्रह्म हैं ? नही जी , अच्छा बताओ- ब्रह्म किसे कहते हो ? जो व्यापक है …मैंने उत्तर दिया ।

तो रसतत्व व्यापक नही है ? श्रीवन के इस प्रतिप्रश्न ने मुझे निरुत्तर कर दिया था । किन्तु “ब्रह्म से भी ये ऊँचे हैं”……श्रीवन का उत्तर था …..मैं इस बात से और चकित हो गया जब मुझे श्रीवन ने कहा ….कि युगलवर के चरणों की नखचन्द्र आभा का नाम ही तो ब्रह्म है ।


चिरस्थाई हैं ये । सच्चिदानन्द हैं , स्वरूप से महामधुर हैं …रसपूर्ण हैं ।

अमित प्रभावशालिनी श्रीप्रिया जी हैं और सर्वश्रेष्ठ अविकारी श्रीलाल जी, ये युगल किशोर ही तो इस प्रेम भूमि श्रीवृन्दावन के राजा और रानी हैं । ये समाधान मुझे श्रीवन ही दे रहा था ।

ये निकुँज प्रेम सागर है …..इन प्रेम सागर में भी ज्वार भाटा चलता रहता है …..सागर का जल जब उठता है ….उसे ज्वार कहते हैं और जब पीछे लौटता है उसे भाटा कहते हैं । ऐसे ही निकुँज रूपी प्रेम सागर में ये उफान और मान दोनों है । अच्छा दूसरी बात समझने जैसी हैं यहाँ …..पूर्णिमा की रात्रि को ज्वार भाटा सागर में आता है । किन्तु इस प्रेम सागर में ? श्रीवन का उत्तर ये था ….रात्रि सखी जन हैं ….पूर्ण चन्द्रमा यानि पूर्णिमा का चन्द्रमा यानि प्रिया मुख मिश्रित श्याम सुन्दर का मुख । दोनों का मुख मिलेगा तभी तो पूर्ण होंगे …नही तो आधे हैं । और समझने की बात यहाँ ये भी है कि ..प्रेम प्रवाह की जो लहरें हैं ….वो प्रिया जी ही हैं …किन्तु इस प्रेम लहर की चाबी सखियों के पास ही है …अगर ये सखियाँ नहीं हों …तो लहरें न प्रेम सागर में उमड़ेंगीं न घटेंगी ….इसलिए प्रेम प्रवाह को उछालने की शक्ति इन्हीं सखियों को ही मिली है ।

इसका अर्थ बड़ा ही गूढ़ है ….जो तुम श्रीवन से सुन रही हो ।

ओह ! हरिप्रिया जी ध्यान से उठ गयीं थीं …”हमारा ध्यान नही होता हम तो किसी लीला चिन्तन में खो जाती हैं “…..”इस समय जानबुझकर असावधान हूँ”….हरिप्रिया जी ने हंसते हुए ये भी कहा ….क्यों की युगलवर शयन में हैं …जब जागे होते हैं ना , तब हमें न रोमांच आना चाहिए , न सुध बुध खोयें….क्यों की हम ही अगर सुध बुध खो देंगीं …तो सेवा कौन करेगा ।

हरिप्रिया जी उठ गयीं थीं , इस बात से मुझे बहुत आनन्द आया था ।

हम सखियाँ ही प्रमुख हैं …..ये ठसक बोल रही थी हरिप्रिया की ….और ठसक क्यों न हो इन सखियों में ……अरे ! युगलचन्द्र की प्यासी चकोरी ही तो हैं ये ।

सखी जू ! तत्व से , रस से, लीला से …सम्यक प्रकार से आनन्द और आल्हाद को आप सखियों ने इस श्रीवन की प्रेमभूमि में लाकर युगल के रूप में विराजमान किया है …और इतना ही नही …आप सखियों ने इनकी कृपा पाकर समस्त भगवदरूपों को अपने प्रेम से वशीभूत कर लिया है ….और उनका सब का तेज, ओज आदि खींच कर युगल को चढ़ा दिया है …तभी तो “प्रणय चेष्टा” का छत्र इनके सिर पर विराजमान है …..महामधु रस सार सर्वस्व की ध्वजा पताका इस निकुँज में जो फहर रही है ….इसका श्रेय आप सखियों को ही जाता है …आप सखियाँ ही इस रस की दाता हैं …..आप से ही रस माँगकर भगवद रूप अवतार रस का वितरण करते रहते हैं ।

हे सखी जी ! मेरी तो इतनी ही बात समझ में आयी है कि …ये निकुँज बिहारी अवतार नहीं हैं अवतारी हैं ..जितने अवतार हैं इन्हीं से होते हैं किन्तु ये अपनी जगह स्थिर हैं …ये न कहीं जाते हैं , न आते हैं …इनका नित्य विहार रस ऐसे ही अखण्ड अविरल बहता रहता है । मेरी बात सुनकर हरिप्रिया जी ने मुझे अपने हृदय से लगा लिया था ।

सेवा में आप लोग तन्मय हैं , सेवा ही आपके प्राण हैं ….हरिप्रिया जी का स्पर्श मुझे प्रेम में डुबो गया था । बिना बोले , संकेत मात्र से ही युगल को प्रसन्न करने की जो आप लोगों में कला है ये कला ही तो सब कुछ है । मैं हरिप्रिया जी के सामने झुक गया था ।

मैंने तो ये समझ लिया कि …शेष , महेश , गणेश आदि जो भी भगवदस्वरूप हैं …उनको भी आपके दर्शन की कौन कहे एक झलक तक नही मिलती । ये सब स्तुति , प्रार्थना ब्रह्मा जी चतुर्मुख से करते ही रहते हैं …किन्तु उनको कहाँ प्रवेश है यहाँ । यहाँ प्रवेश की कौन कहे …हृदय में किंचित ध्यान में भी तो ये रसिकवर उन विधाता के नही आते । मैं भी तो रस सिन्धु में डूब गया था …तभी मैं सखी जनों की प्रार्थना में लगा । मैं बोलता गया …..हे सखी जी ! ये रस अत्यन्त दुर्लभ है ….इतना दुर्लभ रस है कि …..ब्रह्मा शिवादि को प्राप्त नही है ….किन्तु ये रस उनके लिए सुलभ है …..जिनके ऊपर आप सखी जनों की कृपा हो जाए …इतना कहते हुए मैं हरिप्रिया जी के चरणों में गिर गया था ….उन्होंने मुझे उठाने का प्रयास किया किन्तु मैं कैसे उनके चरण छोड़ देता ।
ये सखी ही हैं जो मुझे निकुँज की यात्रा करा सकती हैं …करा ही रही हैं ।

शेष अब कल –

Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (099)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

गोपियों की न लौट पा सकने की बेबसी और मर जाने के परिणाम का उद्घाटन

अब हमारे जीवनसर्वस्व हो तो तुम, हमारे पथ-प्रदर्शक हो तो तुम, हमारे स्वामी हो तो तुम, हमारे सखा हो तो तुम, हमारे प्रियतम हो तो तुम। गड़बड़ दिया मामला तुमने। पहले हमारा मन घर के काम में ठीक-ठीक लगता था, हमारे हाथ घर का सब काम कर लेते थे, ये बेकार नहीं थे। तुमने चित्त खींच लिया। माने ज्ञानशक्ति खींच ली, नहीं तो किसी वेदान्ती गुरु के पास जाते, और तत्पदार्थ त्वंपदार्थ, वाक्यार्थ, लक्ष्यार्थ, उपाधि, उपहित, हेतु-दृष्टान्त का श्रवण करते और अपने को ब्रह्म जानते, मस्त रहते। यह रात के समय घर-द्वार छोड़कर, भागकर, तुम्हारे पास आने की तकलीफ क्यों उठानी पड़ती? तुमने हमारा चित्त ही तो लूट लिया, ज्ञानशक्ति हमारी लूट ली।

बोले- अच्छा बाबा, ज्ञानशक्ति लूट ली गयी, तो हाथ-पाँव तो है, घर में ठीक-ठीक काम करो। तो बोली- ‘किं करवामि’ ये हाथ पहले घर का ठीक काम करते थे, इनसे हम सेवा करती थीं। हमारे घर में हमने बद्रीनाथ महाराज को धर रखा था, घर में नारायण थे, एक ने कहा हमारे घर में शंकर जी महाराज थे, हम शालिग्राम की पूजा करती थीं। नारायण की पूजा करती थीं। हम हाथ से सेवा करती थीं। लेकिन महाराज, तुमने यह क्या किया, हमारी क्रियाशक्ति भी हर ली, हम पूर्वा भक्ति करने योग्य नहीं रहीं, हम तो परिचर्या, पूजा, सेवा करने लायक भी नहीं रहीं। किसी काम का नहीं छोड़ा, माँ की सेवा गयी, बाप की सेवा गयी, भाई की सेवा गयी, पति की सेवा गयी, पुत्र की सेवा गयी, घर में ईश्वर की सेवा थी सो छूटी। धर्म सेवा छूटी, गृह सेवा छूटी; अरे, तुमने तो पागल बना दिया बाबा, अब न बुद्धि काम देती है और न हाथ-पाँव काम देते हैं।

अच्छा गोपियों! देखो, यह तो थोड़ी देर के लिए ऐसा हुआ है, घबड़ाओ नहीं, कभी-कभी बाँसुरी सुनकर ऐसा हो जाता है, आदमी के मन में ऐसा वेग कभी-कभी आ जाता है, इसमें घबड़ाना नहीं चाहिए। घर में जाकर सो जा आनन्द से, सब ठीक-ठीक हो जावेगा। इसमें क्या फिकर है? हमें जरा एकान्त में अभी रहना है। हम आज अपनी बाँसुरी का रियाज करना चाहते हैं एकान्त में रहकर। ज्यादा रात न होने पावे, धीरे से यहाँ से पधार जाओ। बोली-महाराज- ‘पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद्’ ये जो हमारे पाँव हैं चलते नहीं हैं।+

बोले तो हाथी, घोड़ा मँगवा दें? बोलीं- ना महाराज, वे तो तुम्हारे चरणकमल को छोड़ना ही नहीं चाहते। बोले- अच्छा, इतनी बात है तो मैं आगे चलता हूँ, तुम लोग पीछे-पीछे आ जाओ, हम रास्ता बता देते हैं, यदि रास्ता भूल गयी हो। इसमें एक बात निष्ठा की देखो। यज्ञपत्नी भी आयी थीं श्रीकृष्ण के पास, श्रीकृष्ण ने भी उनसे यही कहा था कि घर लौट जाओ; और उन्होंने भी यही कहा था- मैवं विभोऽर्हति भगवान् गदितुं नृशंसं। जो गोपी के मुँह से निकला उनके भी यही शब्द है। क्या? कि आपकी यह वाणी बड़ी कठोर हैं, आप निष्ठुर हैं, निर्दयतापूर्ण हैं। जो अपने पास आये हुए को लौटने को कहते हो। ‘सत्यं कुरुष्व निगमं’ वेद ने कहा है कि जो भगवान् के पास आता है वह लौटकर नहीं जाता, अब आप इस वेद-वाणी को सत्य करो, और हमको मत लौटाओ। श्रीकृष्ण ने कहा कि तुम लौटकर जाओ तो। एक बहुत मजेदार बात हो गयी है दुनिया में परिवर्तन हो गया संसार में तुमको मालूम नहीं है। क्या हुआ महाराज? यह हुआ कि जब तुम लौटकर घर जाओगी, तो जो लोग तुमको आने से रोकते थे तुम्हारे पति, पिता, माता, भाई, सास, श्वशुर, बच्चे तो सब तुम्हारे पाँव की धूल लेकर अपने सिर में लगावेंगे, और कहेंगे कि यह देखो भक्तसाम्राज्ञी आ गयीं। यज्ञपत्नी लौट गयीं। लेकिन गोपी से श्रीकृष्ण ने शास्त्र का, धर्म का विरोध बताया, शिष्टाचार का विरोध बताया, लेकिन निष्ठा गोपी की कितनी प्रबल है कि स्वयं अपना प्रियतम परमप्रिय, स्वयं भगवान्, उनसे कहते हैं कि लौट जाओ, और गोपी कहती हैं- ‘पादौ पदं न व्रजतस्तव पादमूलाद्’ तुम्हारे चरणकमल को खोकर हमारे पाँव बिलकुल चलते नहीं है। गति भी गयी। अब देखो, तीन बातें गयीं- 1.चित्तम्- एक तो श्रीकृष्ण के सिवाय दूसरी चीज का ज्ञान नहीं रहा; 2.श्रीकृष्ण की सेवा को छोड़कर दूसरी कोई क्रिया नहीं रही, इंद्रियों की प्रवृत्ति गयी; और (3) गति गयी- ‘पादौ पदं न चलतस्वतव पादमूलाद्’ स्वर्ग गया, ब्रह्मलोक गया, बैकुण्ठ गया, मोक्ष गया। कुछ नहीं चाहिए केवल तुम चाहिए श्रीकृष्ण। ++

यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा- अच्छा, तुम्हीं बताओ, कि हाथ हमारे रहे नहीं, रास्ते का ज्ञान रहा नहीं, पाँव साथ देते नहीं, फिर जायें तो कैसे? तो कहोगे कि कन्धे पर लेकर पहुँचावेंगे, बैलगाड़ी पर भेज देंगे, हाथी-घोड़े पर भेज देंगे। अच्छा मान लिया, घर यदि पहुँच भी जायँ तो हम वहाँ जाकर करेंगी क्या? करवाम किं वा। जब हम जाकर अपने पतिदेव को, सास-ससुर को, माँ-बाप को, बच्चों को पहचानेंगी ही नहीं र किसी के काम नहीं आवेंगी तो- करवाम किं वा- हम वहाँ जाकर करेंगी क्या? इसलिए हमारा जाना निष्प्रयोजन है। यह प्रेम की बात है, इसका नाम है प्रेमनिष्ठा- मैं बौरी ढूँढ़न चली रही किनारे बैठ।

मैं पगली अपने प्यारे को ढूँढ़ने चली और किनारे ही रह गयी। कहीं अपनी समझदारी आ गया कि हम बड़े समझदार हैं, कहीं ख्याल आ गया कि ये-ये हमारे कर्तव्य है, कहीं बोले- अरे, मरने के बाद हमको स्वर्ग में, वैकुण्ठ में कहाँ-कहाँ जाना है, अरे मुक्त होना है। अरे बाबा, ये प्रेम मरने के बाद स्वर्ग वैकुण्ठ गोलोक में जाने को नहीं है, भला। यह भगवत्-फल है। न तस्य प्राणा-उत्क्रामन्ति इहैव प्रविलीयन्ते- इसमें प्राणों का उत्क्रमण नहीं होता।

इतने में कृष्ण बोले कि अच्छा ग्वालिनी, तुम्हारी पता चल गया कि तुम्हें न कुछ सूझता है, न तुम कुछ कर सकती हो और न तुम चल-फिर सकती हो। तुम्हारी बेबसी तो हमको मालूम पड़ गयी। अब हमारे करने लायक कोई काम हो, जिससे तुम्हारी मदद हो सके, ऐसा कोई काम बता दो। कौन सी सेवा करूँ तो तुम्हें सुख मिलेगा, शान्ति मिलेगी, तुम्हारा ज्ञान लौट आवेगा, तुम्हारे हाथ काम करने लगेंगे, तुम्हारे पाँव काम करने लगेंगे? तुमसे कुछ नहीं होता तो न सही। अगर मरीज बीमार हो जाय, दवा न पी सके, तो सामने वाला उसको दवा तो पिला ही देता है। तो अब तुम बताओ कि हम तुम्हारे लिए क्या करें। गोपी बोलती हैं-

सिञ्चांग नस्त्वदधरामृतपूरकेण हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निम् ।
नो चेद् वयं विरहजागन्युपयुक्तदेहा ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ।।

क्रमशः …….

प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (100)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

गोपियों की न लौट पा सकने की बेबसी और मर जाने के परिणाम का उद्घाटन

गोपी ने कहा कि भला हुआ- सद्बुद्धि का तो उदय हुआ। क्योंकि अगर कोई आदमी जेठ में आ जाय, और किसी के घर में आग लगा दे, बहुत बुरा है। लेकिन आ लगाने के बाद अगर सावधान हो जाये और फिर वह आग बुझाने लग जाय तो उसके आग लगाने का पाप थोड़ा कम तो हो ही जायेगा। तो आग तो तुमने लगायी निश्चित। कृष्ण ने कहा- ग्वालिनी। मैंने तुम्हारी सेवा करने की इच्छा क्या प्रकट कर दी कि तुम्हारा मान इतना बढ़ गया कि हम पर आग लगाने का आरोप लगाती हो? चुप रहो, मुँह से ऐसी बात निकालना नहीं, हम क्या घर में आग लगाते फिर रहे हैं? क्या हम आततायी हैं? हमारे पास आग कहाँ है? अरे, हम शीतल चाँदनी के समान रसवर्षी हैं, चंद्रमा हैं।

गोपी ने कहा- तुम्हारे पास तीन चीजें ऐसी हैं, जिनसे तुम आग लगाते हो- ‘हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निम्’ आग तीन चीज से बढ़ती है- एक तो आग में थोड़ा घी डाल दो, इसमें ईन्धन डालो और उसमें हवा करो तो यह जो तुम्हारी मुस्कान है वह तो घी है- मुस्कान का रंग भी सफेद है, घी का रंग भी सफेद और तुम्हारी चितवन ईन्धन का काम देती है और गलगीत, यह बाँसुरी के बाँस की नली में फूँक मारकर जो स्वर निकालते हो, वह वायु है। इन तीनों से तुमने हमारी प्रेमाग्नि को बढ़ाया है। तुमने हमारे घर में आग नहीं लगायी, हमारे शरीर में आग नहीं लगायी, हमारे दिल में आग लगायी है। जिसने लगायी है, वही बुझावे, तो भला। यह एक बात है- अब दूसरा करने को क्या कहें? अगर तुम हमसे बात नहीं करोगे तो हम यहाँ खड़े-खड़े मर जायेंगी, फिर मरने के बाद जो कर्तव्य है सो करना। एक बात है कि अभी आग थोड़ी और बढ़ा दें, और जल्दी से मामला खत्म करें- सिञ्चांग नस्त्वदधरामृतपूरकेण- अपने अधरामृत की बाढ़ से उसे सींच दो, उसको और प्रज्ज्वलित कर दो।

अब देखो, इसमें क्या भाव है कि अभी हमारी आग में कुछ कमी है, इसीलिए तुम हमसे प्रेम से बात नहीं कर रहे हो और नहीं मिल रहे हो। यदि हमारे शरीर में कोई दोष हो, हमारे कर्म में, मन में कोई दोष हो, तो उस आग को इतना बढ़ा दो कि उसमें सारे दोष भस्म हो जाय। दूसरी बात यह है कि आग लगाई है तुमने तो बुझाना भी तुम्हारा काम है। कृष्ण ने कहा- ठहरो-ठहरो, हम बुझाते हैं। देखो, हम दौड़कर यमुनाजी से पानी ले आते हैं और बाल्टी की बाल्टी पानी तुम लोगों के ऊपर डालेंगे तो तुम्हारी बुझाने वाली आग नहीं है। यह अलौकिक आग है।+

अलौकिक उपाय से ही बुझेगी। वल्लभाचार्य जी महाराज लिखते हैं कि जिस किस्म की आग हो उसी किस्म का उपाय करना पड़ेगा। श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए हृदय में जो आग प्रज्वलित हुई है वह लौकिक आग थोड़े ही है, वह वासना थोड़े ही है, वह काम थोड़े ही है, वह तो संपूर्ण कामनाओं को, वासनाओं को भस्म करने वाली, संपूर्ण इंद्रिय और विषय को, राग को मिटाने वाली बड़ी विलक्षण आग है। गोपी ने कहा- महाराज, तुम हमारी आग में डालो पानी, यह तो ठीक है, परंतु पानी बाहरवाला नहीं चाहिए, आपका अधरामृत चाहिए। सिञ्चांग- प्यारे श्यामसुन्दर। हृदय में जो अग्नि प्रज्वलित हुई है उसको ‘अधरामृतपूरकेण सिञ्च’ अपने अधरामृत से सींचो। सींचो, माने थोड़े अधरामृत से ये आग बुझने वाली नहीं है। इसके लिए अधरामृत की बाढ़ चाहिए, माने गंगा, यमुना चाहिए। यह अधरामृत क्या है? यद् धरामृतं न भवति तत् अधरामृतम् जो धरती का अमृत नहीं है वह है अधरामृत। धरा माने धरती। धरती का जो अमृत है वह है अधरामृत। बात यह है कि भगवान है स्वयं सच्चिदानन्दस्वरूप, उनके भोगलायक सृष्टि में कोई दूसरी वस्तु नहीं है। लेकिन अगर भगवान भोग न करे, तो संसार व्यर्थ गया, संसार का होना व्यर्थ हुआ। यदि भगवान के काम में न आवे, भगवान की सेवा में न लगे, भगवान का भोग न लगे, तो संसार का फायदा क्या?

अमृत तीन तरह का होता है- एक वह जो अन्न में होता है जिसको मनुष्य खाते हैं; एक अमृत वह है जो समुद्र के मन्थन से निकला, वह देवताओं का भोग है; और एक अमृत वह है जो भगवान का स्वरूप है, स्वयं भगवान ही अमृत हैं और भगवान ही उसका भोग करते हैं. आपै ढूँढ़ै, आप ढुँढ़ावै, आपै ढूँढ़नहारी, तो भगवान देखते हैं कि यदि हम संसार का भोग नहीं करेंगे, तो संसार का पैदा होना व्यर्थ, हम इस दुःकरूप, इस जड़, इस असत् संसार का भोग कैसे करें? तो हमारे हृदय में जो अमृत भरा है वह भगवत्स्वरूप है, उसको ले आते हैं अपने अधरों में और उसको बाँसुरी में भरकर सारी सृष्टि में बाँट रहे हैं, और वही अमृत गोपियों के कान में पड़ता है।++

ये मन्त्र-दीक्षा, यह ध्वनि-दीक्षा, इससे गोपियों के हृदय में अमृत भर जाता है। फिर गोपियों के शरीर से वह छलकता है। तो स्व-अधरामृतपूरकेन गोपियाँ कहती हैं कि अपने अधरामृत की बाढ़ से हमें सींच दो, हम इसमें तर हो जायँ। और अगर ऐसा नहीं करोगे तो जानते हो?

वयं किं? उसके बाद क्या होगा कि तुम्हारा ध्यान कर-करके इसी त्रिविध आग में हम जलेंगी। तो क्या होगा कि हम सबकी सब कृष्ण बन जायेंगी, और तुम हमारा ध्यान करते-करते गोपी बन जाओगे। और फिर हम बजावेंगी बांसुरी, और तुम गोपी बनकर व्याकुल होकर रोते हुए हमारी तरह रहना- खुदा करे मेरी तरह किसी पे आये दिल। तुम्हीं जिगर को थाम के कहता फिर हाय दिल ।।

‘ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते’- प्रियतम सखे। जब हम कृष्ण बन जायेंगी और तुम गोपी हो जावोगे तब तुम व्याकुल होकर और हमारी वंशी-ध्वनि सुनकर आओगे हमारे पास; तब हम भी तुम्हें उपदेश करेंगी कि लौट जाओ, घर को जाओ- शुश्रूषणं स्त्रीणां परो धर्मो ह्यमायया- जाओ-जाओ, सास-ससुर की सेवा करो, माँ-बाप की सेवा करो। हम कृष्ण-पदवी को प्राप्त हो जावेंगी और तुम, गोपीपदवी को प्राप्त हो जाओगे। वस्तु त एक ही है, मामला तो केवल नाम-रूप का है। ध्यान से बदलकर हम अपना कृष्णरूप और कृष्ण नाम बना लेंगी और हमारा ध्यान करते-करते तुम्हारा नामरूप गोपी हो जायेगा; और तुम व्याकुल होवेगे, और हम ऐसी ही तुमको सतायेंगी। यही हमारा तुम्हारा भविष्य होने वाला है; सावधान हो जाओ। आओ, रास करो, यह मुँह लटकाकर मत खड़े हो।

क्रमशः …….

प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹

श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 19
🌹🌹🌹
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता |
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः || १९ ||

यथा – जिस तरह; दीप – दीपक; निवात-स्थः – वायुरहित स्थान में; न – नहीं; इङगते – हिलता डुलता; सा – यह; उपमा – तुलना; स्मृता – मानी जाती है; योगिनः – योगी की; यत-चित्तस्य – जिसका मन वश में है; युञ्जतः – निरन्तर संलग्न; योगम् – ध्यान में; आत्मनः – अध्यात्म में |
भावार्थ
🌹🌹
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में दीपक हिलता-डुलता नहीं, उसी तरह जिस योगी का मन वश में होता है, वह आत्मतत्त्व के ध्यान में सदैव स्थिर रहता है |

तात्पर्य
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कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने आराध्य देव के चिन्तन में उसी प्रकार अविचलित रहता है जिस प्रकार वायुरहित स्थान में एक दीपक रहता है |

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Author: admin

Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877

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