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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 137 !!
“कन्हैया ते मिलनों है” – कुरुक्षेत्र में मनसुख
भाग 1
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मैं ही था उस भीड़ में इन वृन्दावन वालों को सम्भालनें वाला …….
हे वज्रनाभ ! मेरे साथ कुछ ऋषि मुनि भी थे…….जिनको मैने अपनें साथ ही रखा था कुरुक्षेत्र में ।
लगभग पूरा वृन्दावन ही आया था…….और इतनें लोगों को सम्भालना ……फिर ये लोग नागरी भाषा भी तो नही जानते थे…….वही अपनी ग्रामीण बृज भाषा ही बोलते थे……..मुझे और नन्द राय को ये डर भी था की कहीं कोई खो न जाए…….और वैसे भी ये ग्वाल गोपी सब बाबरे तो हो ही गए थे …….कन्हैया ! कन्हैया ! बस यही कहते कहते ।
कुरुक्षेत्र आते समय ……..मेरा ही ध्यान कुछ देर के लिये कन्हैया से!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 137 !! हटाथा ….और मैं सन्ध्या गायत्री इत्यादि करनें लगा …….पर हद्द है ……इन गोपों के मुँह से कन्हैया के सिवा और कुछ चर्चा ही नही ….एक क्षण भी ऐसा नही बीता……जिस क्षण कन्हैया की चर्चा न हो ।
तो मुझे ये कहनें में आज कोई आपत्ति नही है कि ……….मुझ से ऊँची स्थिति तो इन गोपों और गोपियों की है ।
मैं सबको देखकर ……नन्दराय और यशोदा से मिलकर ……..सबकी व्यवस्था से सन्तुष्ट हो ……अपनें शिविर में जैसे ही आया ……..
अर्धरात्रि हो गयी थी ……………महर्षि ! सुनिये ना !
नन्दराय मेरे शिविर में आगये थे …………….
क्या हुआ ? आप इतनें घबड़ाये हुए क्यों हैं ? मैने नन्दराय को सम्भाला ………..बात क्या है आप बताएं तो !
देखिये ना ! “मनसुख” अपनें शिविर में नही है…..नन्दराय नें कहा ।
आप भी ना बहुत भोले हैं………..कहीं गया होगा मनसुख …..आजायेगा ……….आप जाइए विश्राम कीजिये ……..
मैने उन्हें जब ये कहा …….तब वो एक ही बात बोल रहे थे …….उसे नागरी भाषा भी नही आती है ………..यहाँ के लोग क्या उसे समझेंगें ……कहीं खो गया तो मनसुख ……………
मैने नन्दराय को देखा ……………कितना प्रेम करते हैं ये सबसे ………मात्र अपनें बालकों से ही नही …………सामान्य गरीब ग्वाले से भी ………..गरीब से तो ज्यादा ही प्रेम करते हैं ………..मै देखता रहा इन महापुरुष को………फिर मैने कहा – आप जाइए …..विश्राम कीजिये मनसुख आजायेगा …….यहीं कहीं होगा …..आजायेगा ।
मेरी बात सुनकर नन्दराय चले तो गए …….पर मुझे पता है जब तक मनसुख नही आजायेगा शिविर में …….तब तक ये सोयेंगें नही ।
भैया ! द्वारिका को शिविर कहाँ पड़े ?
भीड़ है …….अर्धरात्रि में भी बहुत भीड़ है ……..लोग सूर्यग्रहण के लिये आही रहे हैं ……..हजारों हजार की संख्या में लोग आरहे हैं ।
उस भीड़ में मनसुख पूछता हुआ चल रहा है …………ये मनसुख इतना भी नही जानता कि …….यहाँ अधिकतर लोग बाहर के हैं …..उन्हें क्या पता कि ……..किसका शिविर कहाँ है ।
अरे ! तू तो बताय दे ! भैया ! मेरो कन्हैया वहीँ रहे है ।
बताय दे कहाँ है मेरे कन्हैया को शिविर ?
आप क्या बोल रहे हैं ……समझ में नही आरहा हमारे ।
यात्री लोग यही कहते……..कोई कोई इधर उधर देखकर खोजनें की कोशिश करता……..पर……….
अरे ! मैं भूल गयो ………द्वारिका को शिविर कहाँ है ?
पर “द्वारिका” नाम द्वारिकाधीश के कारण विश्व पटल पर छा गया था ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –
🌹 राधे राधे🌹
!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 15 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
मोहन मोहन महल में, स्यामा-स्याम सरूप।
दुलहनि दूलहु मिलि दोउ, करत बिहार अनूप ॥
॥ पद ॥
करत बिहार बिपिन सुखधाम । दुलहनि दूलह स्यामास्याम ॥
रंगद रसद रहसि बसुदा पुनि, अरु सुनि बिसद बिचित्र अनूप ।
अमितकला अमृतादि कुंज मधि, बिलसत भवन अधिपति भूप ॥
ऐश्वर्यादि अखिल ग्रब गंजन, रंजन रूप अमित रति मैंन ।
नख सिख सुषमा रतनागर बर, कल कमनीय कमलदल नैंन ॥
अद्वय इकरस अद्भुत अव्यय, आनंदमयी अचिंत अभंग ।
परमधाम अभिराम पुरंदर, सुंदर स्याम सहचरिनु संग ॥
नित्य नवीनी नवल लाड़िली, नित्यनवीनों नवल सुलाल ।
नित्य नवीनी नवल सहचरी, नित्य नवीनों नवल सुख्याल ॥
नित्य नवीनी नवल-कुंज में, नित्य नवीनों नवल सुनेह।
नित्य नवीनें उमँगि उमँगि दोउ, बरसत नवल नवीनों मेह॥
बिबिधि विनोद बिहारनि जोरी, गोरी स्याम सकल सुख रासि ।
हितूसहचरि श्रीहरिप्रिया हरखत, निरखत चरन कमल कें पासि ॥५ ॥
हे हरिप्रिया सखी जू ! समझ में बात नही आयी ….आपने बताया ….ये तो अनादि हैं …फिर अनादि हैं तो नवल कैसे हुए ? क्यों की जो पुराना होता है वो नया नही होता , और ये भी बताइये कि “दुलहा दुलहन” इस शब्द का प्रयोग तो नव दम्पति के लिए ही होता है ना ! ये तो आदि अनादि हैं फिर इन्हें दुलहा दुलहन कहना क्या उचित होगा ? ये प्रश्न आज मैंने सखी जी से कर लिया था …वो मेरी बात सुनती रहीं मेरे प्रश्न को उन्होंने ऐसे सुना था जैसे कोई माता अपने बालक के प्रश्नों को सुनती है ।
ठीक कहा तुमने ..नित्य और नवीन , अनादि और नवीन …ये सम्भव नही है । किन्तु ये प्रेमदेश है …ये निकुँज है ..प्रेम में जैसे सब कुछ सम्भव होता है …ऐसे ही निकुँज में भी, कुछ भी सम्भव है । हरिप्रिया जी बता रहीं थीं ।
ये दो विरोधी धर्म हैं ….नित्य और नवीन , यानि अनादि कहो और फिर दुलहा दुलहन कहो …ये विरोधी बातें हैं …ठीक बात है ये …किन्तु इस प्रेम देश की यही विशेषता है कि यहाँ सब कुछ विरोधी धर्म ही चलता है ….ये निकुँज देश ही ऐसा है …हरिप्रिया मुसकुराईं । ये अनुराग की प्रगाढ़ अवस्था है …जहाँ सब विरोधी तत्व ही एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं ….ये अनुराग ही आपको ये अनुभव देता है ….कुछ बासी होने ही नही देता …बासी हो गया तो अनुराग ही क्या हुआ ? बासी है ..अनादि है तो बासी हुआ ना, किन्तु अनुराग इसी बासी को ही नवीन , ताज़ा बनाकर रखता है , ये अनुराग का चमत्कार है । हरिप्रिया सखी मुझे स्नेह के साथ समझा रहीं थीं ।
और एक बात और कहे देती हूँ …..यहाँ सब कुछ अनादि है और नवीन है ….हरिप्रिया सखी कहती हैं मात्र युगलवर ही नवीन और अनादि नही हैं ….सब कुछ अनादि है यहाँ ….हरिप्रिया सखी खिलखिलाकर हंस पड़ती हैं ….उनकी हंसी कोई पाँच वर्ष की बालिका की तरह निश्छल है ।
ये चमत्कार अनुराग का है …यानि प्रेम का…आगे हरिप्रिया कहतीं हैं …सखी जन और श्याम सुन्दर को प्रिया जी नवीन लगती हैं …तो प्रिया जी को श्याम सुन्दर का स्वरूप नवीन लगता है, अब युगल (दोनों ) को सखियाँ नवीन लगती हैं, और सखियाँ और युगल को ये “नित्य निकुँज” नवीन लगता है ।
यहाँ प्रत्येक वस्तु का स्वरूप नित्य और नवीन है …..देखो ! ये नही होगा ना , तो रस खिलेगा नही …”रस विहार” हो नही पायेगा …इसलिए निकुँज में सब कुछ नित्य है , अनादि है ..और नवीन भी, ये प्रेम-अनुराग का ही चमत्कार है, हरिप्रिया जी मुझे अच्छे से निकुँज रहस्य समझा रहीं थीं ।
अरी ! तू इस श्रीवन से कुछ भी माँग ये तुझे प्रदान करेगा । तू निकुँज वन से कुछ भी माँग निकुँज तेरी हर माँग पूरी करेगा । किन्तु सकाम का यहाँ प्रवेश नही है …पूर्ण निष्काम । हरिप्रिया सखी जी गदगद हैं वो कह रही हैं ….देख ! मोहन महल …ये सब निकुँज हैं …नित्य निकुँज ।
क्या माँगे ? कुछ देर तक मैं बोल न सका । क्या माँगूँ ?
“रंगद”……हरिप्रिया हंसती हुई बोलीं ….रंग माँग री ! “प्रेम रंग” माँग ले । रंग जाएगी तू । तेरे तन मन प्राण में प्रेम का रंग चढ़ जाएगा ….क्यों की रंगों से भरा है ये निकुँज …और इसका एक नाम रंगद भी तो है ।
ये रंगद क्या होता है ? मैंने भी पूछ लिया ।
जो सबको रंग दे …..ये श्रीवृन्दावन तुम को और हमको ही नही रंगता …ये तो प्रिया लाल को भी रंगता है ….इस मोहन महल को देखा है ? मैंने हाथ जोड़कर कहा …आपकी कृपा नही हुई ….मेरी इस बात का उन्होंने कोई उत्तर नही दिया क्यों की बनावटी दैन्यता को यहाँ कोई स्थान नही है ….ये विशुद्ध प्रेम देश है …ये निकुँज है । हरिप्रिया बोलीं …मोहन महल में रंग ही रंग है …रूप रंग , रति रंग इन्हीं रंगों में भिगो देती है ये मोहन महल प्रिया लाल को ।
मैं प्रसन्नता की चरम पर था ।
“रसद”…..हरिप्रिया बोलीं …ये निकुँज रसद भी है ।
“रसद”…..का अर्थ ?
रस देने वाला …….हरिप्रिया फिर हंसीं …..ये इतनी निश्छल हैं कि कोई आडम्बर इन्हें छू नही सकता ….और हाँ , हरिप्रिया जी जब हंसतीं तब पक्षी जन प्रसन्नतावश कोलाहल करते …वो मुझे बहुत प्रिय लग रहा था ।
ये रस देने वाला है …..ये श्रीवृन्दावन रस देने वाला है ….अजी ! प्रेम का रस । और हम को ही नही प्रिया लाल को भी यही रस देते हैं ……कैसे रस देते हैं ? ये मैंने भी पूछ लिया ।
अनुकूलता । रति विलास में अनुकूलता प्रदान कर निकुँज इन दोनों को रस में डुबो देता है ।
ये निकुँज …”रहसि” भी है । रहसि ? मैं समझा नही ।
तुम्हारे प्रेम को गुप्त रखकर ये निकुँज, तुम्हारे भीतर ही भीतर आल्हाद और आनन्द का मिलन करा देता है । ये बात सब पर लागू है …प्रिया लाल के दिव्य प्रेम को , रति विलास को बड़ा ही गुप्त रखता है ये निकुँज ।
हरिप्रिया जी कहती हैं ….”वसुदा” । ये नाम भी है निकुँज का , अपने प्रेम के रत्नों को खोल देता है ये निकुँज ….ये तो प्रेम का धनी है …बस , देता है देता है देता है …..अपने राजा रानी के लिए ये ख़ज़ाने खोल देता है ….चारों ओर देखो , तुरन्त बसन्त छा जाएगा , और ऋतु में मत्तता छा जाएगी ….फिर काम प्रकट होगा ….काम ? यहाँ कामदेव का क्या काम ? हरिप्रिया जी बोलीं …ये तुम्हारे संसार का प्राकृतिक काम नही है …ये प्रेम का ही रूप है ….प्रेम एक दूसरे को उद्वेलित करने के लिए काम रूप से प्रकट हो जाता है और युगल को “रति केलि” के लिए प्रेरित करता है । हरिप्रिया कहतीं हैं – इसलिए निकुँज को वसुदा भी कहा गया …क्यों की काम रूपी धन का ये दाता है । और इतना ही नही ….इस श्रीवन का एक नाम “अमृत” भी है । ये भोग देने वाले स्वर्ग का अमृत नही …ये प्रेम-अमृत है जिसे पीकर मत्त हो जाओगे , तृप्त हो जाओगे , अरे अमर हो जाओगे । ये कहते कहते हरिप्रिया उन्मत्त हो उठीं थीं । उनके सामने युगलसरकार प्रकट ही हो गये थे ….दिव्य सिंहासन , अखिल ऐश्वर्य वहाँ प्रकट था …इतने सुन्दर थे युगल कि कोटि कोटि काम भी लज्जित हो जाए । श्याम सुन्दर अपनी प्रिया जी को ही निहार रहे थे …अरे ! मुकुट भी प्रिया जी की ओर ही झुका हुआ था । कजरारे नयन उफ़ ! जिसकी ओर ये देखें वो तो मर ही जायें, इनकी कोई उपमा नही दी जा सकती ..क्यों की कोई उपमा ही नही ..इनके जैसे यही हैं …और कोई नही है । हरिप्रिया जी ने देखा ….वो दौड़कर गयीं और युगलवर के चरण पकड़ लिए ….आहा ! अब मैंने हरिप्रिया जी के पकड़ लिए थे …क्यों की इनकी कृपा बिना ये भी कहाँ मिलते । अब हरिप्रिया जी की ओर देखकर युगल विनोद भी कर रहे थे ..हंस रहे थे । अजी ! इन्हीं सखियों को पकड़ो …यही ले जायेंगीं हमें तो ।
शेष अब कल –
] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 6
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बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः |
अनात्मस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् || ६ ||
बन्धुः – मित्र; आत्मा – मन; आत्मनः – जीव का; तस्य – उसका; येन – जिससे; आत्मा- मन; एव – निश्चय ही; आत्मना – जीवात्मा के द्वारा; जितः – विजित; अनात्मनः – जो मन को वश में नहीं कर पाया उसका; तू – लेकिन; शत्रुत्वे – शत्रुता के करण; वर्तेत – बना रहता है; आत्मा एव – वाही मन; शत्रु-वत् – शत्रु की भाँति |
भावार्थ
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जिसने मन को जीत लिया है उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया इसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा |
तात्पर्य
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अष्टांगयोग के अभ्यास का प्रयोजन मन को वश में करना है, जिससे मानवीय लक्ष्य प्राप्त करने में वह मित्र बना रहे | मन को वश में किये बिना योगाभ्यास करना मात्र समय को नष्ट करना है | जो अपने मन को वश में नहीं कर सकता, वह सतत अपने परं शत्रु के साथ निवास करता है और इस तरह उसका जीवन तथा लक्ष्य दोनों ही नष्ट हो जाते हैं | जीव की स्वाभाविक स्थिति यह है कि वह अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करे | अतः जब तक मन अविजित शत्रु बना रहता है, तब तक मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की आज्ञाओं का पालन करना होता है | किन्तु जब मन पर विजय प्राप्त हो जाती है, तो मनुष्य इच्छानुसार उस भगवान् की आज्ञा का पालन करता है जो सबों के हृदय में परमात्मास्वरूप स्थित है | वास्तविक योगाभ्यास हृदय के भीतर परमात्मा से भेंट करना तथा उनकी आज्ञा का पालन करना है | जो व्यक्ति साक्षात् कृष्णभावनामृत स्वीकार करता है वह भगवान् की आज्ञा के प्रति स्वतः समर्पित हो जाता है |


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Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877