] Niru Ashra: 🌹👏🌹👏🌹
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 137 !!
“कन्हैया ते मिलनों है” – कुरुक्षेत्र में मनसुख
भाग 2
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अरे ! तू तो बताय दे ! भैया ! मेरो कन्हैया वहीँ रहे है ।
बताय दे कहाँ है मेरे कन्हैया को शिविर ?
आप क्या बोल रहे हैं ……समझ में नही आरहा हमारे ।
यात्री लोग यही कहते……..कोई कोई इधर उधर देखकर खोजनें की कोशिश करता……..पर……….
अरे ! मैं भूल गयो ………द्वारिका को शिविर कहाँ है ?
पर “द्वारिका” नाम द्वारिकाधीश के कारण विश्व पटल पर छा गया था ।
द्वारिका ? एक यात्री रुका……आपको द्वारिका का शिविर चाहिये ?
मनसुख बहुत खुश हुआ …….हाँ ….हाँ भैया ! द्वारिका को शिविर …..कहाँ है बताय दो ………भैया ! मैं थक गयो हूँ ………अब कहाँ जाऊँ ? कौन ते पूछूँ ?
अच्छा ! उदास मत हो …….मैं जैसे बता रहा हूँ वैसे ही जाना …………
यात्री नें जैसे बताया था मनसुख वैसे ही गया ।
दिव्य भव्य शिविर लगा है द्वारिका का ………
मनसुख पहुँचा ……….मन में आनन्द की लहर छा गयी है ……बैठ गया शिविर के मुख्य द्वार पर जाकर……..माथे की पगड़ी निकाली ……..पसीनें आरहे थे पोंछनें लगा……..चलो ! कन्हैया को शिविर तो मिल गयो ……..अब लेके जाऊँगों मैया के पास …..कितनी खुश है जायेगी ….बेचारी मैया ! और वो राधा रानी ……..कितनो आशीर्वाद देगी मोय……….मनसुख मुस्कुराते हुए सोच रहा है ।
ए जाओ यहाँ से ! क्यों बैठे हो यहाँ ?
चार सैनिक आगये थे ……….मनसुख का हाथ पकड़ कर बोले ……जाओ यहाँ से ……कहाँ कहाँ से आजाते हैं ….पता नही ।
ए हट्ट ! मैं कन्हैया को सखा हूँ ……हाथ मत लगइयो ……..नही तो तेरे राजा ते कह दूँगो………तू जानें नाय मोय !
मनसुख उखड़ गया ।
सैनिक बोले ………तुम धीरे बात नही कर सकते …….द्वारिकाधीश नें अगर सुन लिया ……..तो ……धीरे बोलो ….और जाओ यहाँ से ।
नाय जा रो …….बोल, कहा कर लेगो !
अच्छा ! काम क्या है ये तो बता दो ………..सैनिक को लगा ये देहाती है…. हल्ला करेगा ……और फिर द्वारिकाधीश सो रहे हैं जग गए तो !
अच्छा ! बताओ क्या काम है यहाँ ? सैनिकों नें फिर पूछा ।
“कन्हैया ते मिलनों है”………..दो टूक बोलता है मनसुख ।
क्रमशः …..
शेष चरित्र कल –
🌹 राधे राधे🌹
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 13-14
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समं कायशिरोग्रीवं धार्यन्नचलं स्थिरः |
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्र्चानवलोकयन् || १३ ||
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः |
मनः संयम्य मच्चितो युक्त आसीत मत्परः || १४ ||
समम् – सीधा; काय – शरीर; शिरः – सिर; ग्रीवम् – तथा गर्दन को; धारयन् – रखते हुए; अचलम् – अचल; स्थिरः – शान्त; सम्प्रेक्ष्य – देखकर; नासिका – नाक के; अग्रम् – अग्रभाग को; स्वम् – अपनी; दिशः – सभी दिशाओं में; च – भी; अनवलोकयन् – ण देखते हुए; प्रशांत – अविचलित; आत्मा – मन; विगत-भीः – भय से रहित; ब्रह्मचारी-व्रते – ब्रह्मचर्य व्रत में; स्थितः – स्थित; मनः – मन को; संयम्य – पूर्णतया दमित करके; मत् – मुझ (कृष्ण) में; चित्तः – मन को केन्द्रित करते हुए; युक्तः – वास्तविक योगी; आसीत – बैठे; मत् – मुझमें; परः – चरम लक्ष्य |
भावार्थ
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योगाभ्यास करने वाले को चाहिए कि वह अपने शरीर, गर्दन तथा सर को सीधा रखे और नाक के अगले सिरे पर दृष्टि लगाए | इस प्रकार वह अविचलित तथा दमित मन से, भयरहित, विषयीजीवन से पूर्णतया मुक्त होकर अपने हृदय में मेरा चिन्तन करे और मुझे हि अपना चरमलक्ष्य बनाए |
तात्पर्य
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जीवन का उद्देश्य कृष्ण को जानना है जो प्रत्येक जीव के हृदय में चतुर्भुज परमात्मा रूप में स्थित हैं | योगाभ्यास का प्रयोजन विष्णु के इसी अन्तर्यामी रूप की खोज करने तथा देखने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है | अन्तर्यामी विष्णुमूर्ति प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निवास करने वाले कृष्ण का स्वांश रूप है | जो इस विष्णुमूर्ति की अनुभूति करने के अतिरिक्त किसी अन्य कपटयोग में लगा रहता है, वह निस्सन्देह अपने समय का अपव्यय करता है | कृष्ण ही जीवन के परं लक्ष्य है | हृदय के भीतर इस विष्णुमूर्ति की अनुभूति प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्यव्रत अनिवार्य है, अतः मनुष्य को चाहिए कि घर छोड़ दे और किसी एकान्त स्थान में बताई गई विधि से आसीन होकर रहे | नित्यप्रति घर में या अन्यत्र- मैथुन-भोग करते हुए और तथाकथित योग की कक्षा में जाने मात्र से कोई योगी नहीं हो जाता | उसे मन को संयमित करने का अभ्यास करना होता है और सभी प्रकार की इन्द्रियतृप्ति से, जिसमें मैथुन-जीवन मुख्या है, बचना होता है | महान ऋषि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्मचर्य के नियमों में बताया है –
कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा |
सर्वत्र मैथुनत्यागो ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ||
“सभी कालों में, सभी अवस्थाओं में तथा सभी स्थानों में मनसा वाचा कर्मणा मैथुन-भोग से पूर्णतया दूर रहने में सहायता करना हि ब्रह्मचर्यव्रत का लक्ष्य है |” मैथुन में प्रवृत्त रहकर योगाभ्यास नहीं किया जा सकता | इसीलिए बचपन से जब मैथुन का कोई ज्ञान भी नहीं होता ब्रह्मचर्य की शिक्षा दी जाती है | पाँच वर्ष की आयु में बच्चों को गुरुकुल भेजा जाता है, जहाँ गुरु उन्हें ब्रह्मचारी बनने के दृढ़ नियमों की शिक्षा देता है | ऐसे अभ्यास के बिना किसी भी योग में उन्नति नहीं की जा सकती, चाहे वह ध्यान हो, या कि ज्ञान या भक्ति | किन्तु जो व्यक्ति विवाहित जीवन के विधि-विधानों का पालन करता है और अपनी पतनी से मैथुन-सम्बन्ध रखता है वह भी ब्रह्मचारी कहलाता है | ऐसे संयमशील ब्रह्मचारी को भक्ति सम्प्रदाय में स्वीकार किया जा सकता है, किन्तु ज्ञान तथा ध्यान सम्प्रदाय वाले ऐसे गृहस्थ-ब्रह्मचारी को भी प्रवेश नहीं देते | उनके लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य अनिवार्य है | भक्ति सम्प्रदाय में गृहस्थ-ब्रह्मचारी को संयमित मैथुन की अनुमति रहती है, क्योंकि भक्ति सम्प्रदाय इतना शक्तिशाली है कि भगवान् की सेवा में लगे रहने से वह स्वतः ही मैथुन का आकर्षण त्याग देता है |
भगवद्गीता में (२.५९) कहा गया है –
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः |
रसवर्जं रासोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ||
जहाँ अन्यों को विषयभोग से दूर रहने के लिए बाध्य किया जाता है वहीँ भगवद्भक्त भगवद्रसास्वादन के करण इन्द्रियतृप्ति से स्वतः विरक्त हो जाता है | भक्त को छोड़कर अन्य किसी को इस अनुपम रस का ज्ञान नहीं होता |
विगत-भीः पूर्ण कृष्णभावनाभावित हुए बिना मनुष्य निर्भय नहीं हो सकता | बद्धजीव अपनी विकृत स्मृति अथवा कृष्ण के साथ अपने शाश्र्वत सम्बन्ध की विस्मृति के करण भयभीत रहता है | भगावत में (११.२.३७) कथन है – भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्याद् ईशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ही योग का पूर्ण अभ्यास कर सकता है और चूँकि योगाभ्यास का चरम लक्ष्य अन्तःकरण में भगवान् का दर्शन पाना है, अतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पहले से हि समस्त योगियों से श्रेष्ठ होता है | यहाँ पर वर्णित योगविधि के नियम तथाकथित लोकप्रिय योग-समितियों से भिन्न हैं |
] Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख”- 16 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
जै श्रीराधा रसिक रस, मंजरि पिय सिरमौर ।
रहसि रसिकिनी सखी सब, बृन्दावन रस ठौर ॥
॥ पद ॥
जयति जै राधिका रसिक रस-मंजरी, रसिक सिरमौर मोहन बिराजै ।
रसिकनी रहसि रसधाम बृन्दाबिपिन, रसिक रसरसी सहचरी समाजै ॥
रसिक रस प्रेमसिंगार रंग रँगि रहे, रूप आगार सुखसार साजै।
मधुर माधुर्य सौंदर्यतावर्य पर, कोटि ऐश्वर्य की कला लाजै ॥
नित्य नव नायका नित्य सुखदायका, नित्य नवकुंज में नित्य राजै ।
नित्य नव केलि नव नित्य नायक नवल, नित्य नव निपुनता भव्य भ्राजै ॥
कसिब कौसेय कोमल कमल कनकदुति, चिकुर मेचक मुरित छुरति छाजै ।
दिव्य आभूषना भूषिता भामिनी, अद्भुतानंददा जै सदा जै ॥
चंचला लोचनी चातुरा चितहरा, चारुभा चंद्रिका चंद्रका जै ।
सच्चिदानंद की सिद्धिदा सक्ति, स्यामा सुधामा सुधादा सुभाजै ॥
चातिकी कृष्ण की स्वाति की वारिदा, वारिधा रूपगुन गर्विता जै ।
मान मद मोचनी रोचनी रतिकला, रत्नमनि कुंडला जगमगाजै ॥
प्रान प्रीतम प्रिया प्रीतमा प्रेयसी, पद पद्म पांसु पावन करा जै ।
परम रस बर्षिनी कर्षिनी चित्त पिय, नित्य हिय हर्षिनी श्रीहरिप्रिया जै ॥ ६ ॥
****सदाहीं जय हो , जय हो , जय जय हो ।
हरिप्रिया सखी ऊर्ध्व बाहू करके …जय जय का उद्घोष करने लगीं थीं ।
क्यों न करतीं ….निकुँज के राजा रानी वहीं विराजे थे …उनके चरणों में हरिप्रिया सखी के हाथ थे और मेरे हाथों में सखी जी के चरण । ये गदगद थीं ।
“अन्य समस्त रसिकों के मुकुट मणि ये लाल जी …जैसे – द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण ….रसिक हैं …किन्तु ये निकुँज बिहारी उनके भी सिरमौर हैं ….नही नहीं ….बृज में अवतार लेकर आए रसिक वर श्रीकृष्ण कन्हैया ….अरी ! ये निकुँज बिहारी तो उन श्रीकृष्ण कन्हैया के भी सिरमौर हैं“।
हरिप्रिया जी का हृदय भर आया था ….उनको आनन्द की अधिकता इतनी हो गयी थी कि अश्रु बहने लगे थे …..उनकी साँसें भर के चल रहीं थीं । उनकी दृष्टि बस युगल सरकार पर थी …मानों कोई योगिनी त्राटक कर रही हो ।
“इन रसिक और इनकी रसिकनी …सर्व शोभा सम्पन्न, सर्वाराध्य श्रीराधा और रहस्य रसास्वादक यहाँ का सखी समाज ….और ये श्रीवृन्दावन जो रस धाम है …रस स्थान है और रसकेलि को जो छुपाना भी जानता है, ऐसे दिव्य रसस्थल श्रीवृन्दावन की……जय हो जय हो जय जय हो ।
इन जोरी को भर नयन निहारो तो सही , प्रेम रस की स्वरूपा प्रिया जी , और शृंगार रस स्वरूप प्रियतम , ये दोनों ही रसास्वादी हैं और रस में ही डूबे भी रहते हैं ….इनसे माधुर्य लेकर भगवद् अवतार संसार में माधुर्य का वितरण करते हैं ….हरिप्रिया जी कहती हैं ….ब्रह्माण्ड में जहां जहां भी रस है , माधुर्य है , प्रेम है …उसका मूल यही निकुँज है । प्रेम जो विश्व में दिखाई देता है …उस प्रेम का उद्गम यहीं है ….और यही युगलवर हैं …जो रस दाता हैं ….सबको रस का दान यहीं से मिलता है ….अजी ! इनकी सुकुमारता तो देखो , इनका माधुर्य तो देखो ….इनकी रति लम्पटता तो देखो …..आहा ! इनमें तो हम अपने प्राण न्यौछावर करती हुई जय जयकार करती हैं ।
हरिप्रिया जी को आज कुछ भान नही है …और सामने युगल सरकार हों तो भान भी क्या रहे ।
हमारी अपूर्व सौन्दर्य की राशि श्रीप्रिया जी ….जो प्यारे को सुख देती हैं और प्यारे प्रिया जी को सुख पहुँचाते हैं …बाकी सखियाँ इन युगल को सुख पहुँचाती हैं ….और युगल और सखियों को ये निकुँज सुख पहुँचाता है …इसलिए इन सब सुख दाता की जय हो , जय हो । हरिप्रिया की दशा आज अपूर्व देखी गयी थी …क्यों कि युगलवर के सामने आज सिर्फ यही थीं ।
मेरी प्रिया जी कितनी सुन्दर हैं ….तपते स्वर्ण की तरह …गौर प्रभा हैं….इनके मंगल श्रीअंग पर रेशमी साड़ी फंव रही है ….इनके घुंघराले केश ….काले हैं ….इन केशों से सौंधी सुगन्ध आरही है ….उस सुगन्ध के कारण लाल जी देह सुध भूल रहे हैं ….ये लाल जी को सुख प्रदान करने वालीं …हमारी स्वामिनी प्रिया जी की …जय हो जय हो ।
अब हरिप्रिया जी का ध्यान केवल स्वामिनी जी पर टिक गया है ……
बिजली के समान चंचल नेत्रों वालीं हमारी प्रिया जी , यहाँ पर हंसती हैं हरिप्रिया …कहतीं हैं इन्हीं नयनों से लाल जी पर ये शासन करती हैं ….और लाल जी इनकी हर आज्ञा का पालन करते हैं मानौं वो सेवक हों और ये सेव्य । फिर हरिप्रिया कहती हैं …ये प्रेमदेश है यहाँ नायिका प्रधान है नायक प्रधान नही । ये अतृप्त लाल जी को तृप्त करती हैं ….अहो ! चकित होकर सखी मुझे बता रहीं हैं ….जो सच्चिदानन्द हैं …उनको प्रकाश देने वाली ये हैं ….इनके बिना न तो सच्चिदानन्द में सत् रहेगा , न चिद रहेगा , और ये नही हैं तो आनन्द भी रहेगा नही । इनके द्वारा ये पूर्ण हैं ….अरे ! लाल जी तो चातक बने रहते हैं …स्वाति बूँद प्रिया जी का सौन्दर्य हैं …अधर का रस है ….श्रीअंग की सुषमा है ….उसका सौरभ है ….अंग अंग का माधुर्य है । हरिप्रिया आगे बोलीं …ये प्रिया जी हैं ….जब अपना सुन्दरतम श्रीअंग रूपी वैभव लाल जी को ये दिखाती हैं , तब वे बस मूर्छित हो जाते हैं …उस समय इस चातक को बूँद चाहिए स्वाति बूँद …..अहो ! विपरीत रति द्वारा ये जब लाल जी को रति केलि का सुख प्रदान करती हैं तब तो कामदेव का नशा चूर चूर होकर बिखर जाता है …ऐसी हमारी रसिकनी स्वामिनी जी की …जय हो , जय हो ।
यौवन के मद से मत्त …अपने प्रियतम के हृदय में राज करने वालीं …हम सबकी स्वामिनी श्रीराधिका जू की जय हो , जय हों, जय जय हो ।
इतना कहकर हरिप्रिया फिर प्रिया जी के चरणों में लोटने लग जाती हैं ।
शेष अब कल –


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