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August 30, 2025 12:31 pm

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 137 !!(3),!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!,महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (101&102)and श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 137 !!(3),!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!,महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (101&102)and  श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

🌹👏🌹👏🌹

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 137 !!

“कन्हैया ते मिलनों है” – कुरुक्षेत्र में मनसुख
भाग 3
🌻🌻🌻🌻🌻

सैनिक बोले ………तुम धीरे बात नही कर सकते …….द्वारिकाधीश नें अगर सुन लिया ……..तो ……धीरे बोलो ….और जाओ यहाँ से ।

नाय जा रो …….बोल, कहा कर लेगो !

अच्छा ! काम क्या है ये तो बता दो ………..सैनिक को लगा ये देहाती है…. हल्ला करेगा ……और फिर द्वारिकाधीश सो रहे हैं जग गए तो !

अच्छा ! बताओ क्या काम है यहाँ ? सैनिकों नें फिर पूछा ।

“कन्हैया ते मिलनों है”………..दो टूक बोलता है मनसुख ।

यहाँ कोई कन्हैया नही है ……….आप गलत जगह आगये हैं …….किसी और शिविर में होगा आपका कन्हैया …….जाओ आप !

सैनिकों नें फिर वही राग अलापा …….।

अरे ! जाओ ! हमारो कन्हैया द्वारिका जाकर बस गयो है ……हमें सब पतो है ………अब सुनो मेरी बात ध्यान ते……या तो कन्हैया को यहाँ बुला दो …..नही तो मैं भीतर जाय रह्यो हूँ ……इतना कहकर मनसुख तो शिविर में जानें लगा ।

सैनिकों नें पकड़ लिया ………….और बाहर निकालनें लगे ।

जोर से चिल्लाया मनसुख ………..कन्हैया ! ओ कन्हैया ! देख ! तेरे ये सेवक – चाकर मोय तेरे पास आन ना दे रहे ।

मनसुख को पकड़े है सैनिक……वो भीतर जानें की जिद्द कर रहा है ।

द्वारिकाधीश के कानों में – कन्हैया ! ओ कन्हैया !

एकाएक नींद खुली द्वारिकाधीश की …………क्या हुआ नाथ ! रुक्मणी नें पूछा ………..नही ……पता नही क्यों ऐसा लग रहा था कि ….कोई “अपना” द्वार पर खड़ा है……..तुम सो जाओ रुक्मणी !

रुक्मणी सो गयीं………….कुछ देर में फिर आवाज आयी …

कन्हैया ! ओ कन्हैया ! देख तेरे ये सैनिक !

तेज़ चाल से चलते हुए अटारी में आये श्रीकृष्ण……नीचे की ओर देखा ।

कौन है ये ? क्या हल्ला मचा रहे हो ?

सैनिकों नें जब द्वारिकाधीश को ही देखा ये पूछते हुए …..तो वो सब डर गए …………मनसुख को छोड़ दिया ।

मनसुख अपलक देख रहा है ………..पर रात घनी है ………स्पष्ट कुछ दिखाइ नही दे रहा ……मैं हूँ मैं….हाथ हिलाते हुए मनसुख उछला…….कौन हो तुम ? तेज़ आवाज में पूछा था द्वारिकाधीश नें ।

मनसुख चुप हो गया …………कुछ नही बोला ……..हाँ ….इतना जरूर बोला …….नही पहचाना ना ? मुझे नही पहचाना !

बहुत दुःखी हो उठा मनसुख …………टूट ही गया था ।

अपना झोला उठाया ………….और चलते हुए बोला ………हाँ तू तो बड़ो हे गयो हैं ………हम तो गरीब …….क्यों पहचानेंगो लाला !

चल कोई बात नही …………हम तो सोच रहे कि हमें देखते ही तू दौड़ो आवेगो ……पर तू बड़ो आदमी है …….हम तो बहुत छोटे हैं …..पर लाला ! तोते बहुत प्यार करें हम ………अच्छा ! भैया ! राम राम ! ।

“बेकार आगये या कुरुक्षेत्र में”………आँसुओं को पोंछते हुए मनसुख जैसे ही वापस जानें लगा ।

जोर से चिल्लाये द्वारिकाधीश ……..मनसुख ! ओ मनसुख !

मनसुख नें सुना ………वो रुका …..मुड़ा …..देखा…. उसका कन्हैया दौड़ पड़ा था उससे मिलनें के लिये ।

नीचे आकर द्वारिकाधीश नें अपनें हृदय से लगाया मनसुख को ………..कैसा है तू ?

मनसुख ! तू कैसा है !

देख ! दुबला हो गया हूँ………तेरी याद में …………मनसुख नें फिर पकड़ कर अपनें गले से लगाया अपनें सखा कन्हैया को ।

चल ! अब चल मेरे साथ ! मनसुख नें कसकर हाथ पकड़ा है कन्हैया का ………..चल अब ……….

पर कहाँ ?

अपनी मैया ते नाय मिलेगो ? बाबा ते ? अपनी राधा ते ? सब हैं पुरो वृन्दावन ही आय गयो है ……….मनसुख नें हँसते हुए कहा है ।

क्या ! मेरी मैया आयी है यहाँ ? और बाबा भी ? और मेरी …………

राधा का नाम ले भी नही सके……..उनके नेत्र बह चले थे ।

शेष चरित्र कल –

🌹 राधे राधे🌹

!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख”- 17 )

गतांक से आगे –

॥ दोहा ॥

दर्प करैं दलमल सबै, को कंदर्प करोरि ।
घनस्यामल गोरी सहज, बनी मोहनी जोरि ॥

॥ पद ॥

बनी मोहनी जोरि घनस्याम गोरी, महासोहनी रूप गुन की अगाधा ।
नित्य नवकुंज आनंद के पुंज में, मंजु क्रीड़ा करें कृष्णराधा ॥

सर्व सुख सींव दोउ ग्रीव भुज मेलि कें, करत हैं केलि नवरंग रंगे।
पलजु बिछुरें परें कल न जिय ललनकें, उमँग अँग अंग सदा एक संगे ॥
अष्ट सहचरिन के बिना परिकर यहाँ, और सहचरिन कौ नहिं प्रवेसा।
काल गुन रहित निजधाम वृंदाबिपिन, पर्म अभिरामता कौ सुदेसा ॥
दिव्य अद्भुत नगनिजगमगतिजगति अति, अमित अँसमान के अंस लाजें।
कोटि कंदर्प के दर्पदलमल करें, गर्व गोलोक के सर्व भाजें ॥
रसिक जन उरसि अनुराग की बर्धिनी, मुक्ति सारिष्ट पर सुखकी दाता।
सकल अंसादि अवतार की सेव्य, श्रीस्यामस्यामा सुजोरी विख्याता ॥
चतुर चूड़ामनी चारु चंद्राननी, चित्तहर चिमत्कारें अपारें ।
जिनहिं दिवि दृष्टि ए देत करिकें दया, तेई जथार्थ इनिकौं निहारें ॥
अज्ञ जन होइ आसक्त सुख जक्त, अव्यक्त निजधाम कल्पित बखानैं।
सच्चिदानंद रस अमृत कों त्यक्त करि, अन्य यातें कछु अधिक मानें ॥
कर्मअरु ज्ञान करिकें सदा दुल्लभा, सुल्लभा पराभक्तिहि प्रकासी ।
हितू श्रीहरिप्रिया की कृपा-दृष्टि सों, निकट निरखें तहाँ नित्यदासी ॥ ७ ॥

*युगल सरकार की झाँकी अब वहाँ नही है ….हरिप्रिया सखी के हृदय में ही युगल प्रकाशित हो रहे हैं …किन्तु सखी जी अभी भी उसी स्थान में अपना मस्तक झुकाए और नेत्रों को बन्दकरके वो बस बोल रही हैं । जब हृदय में प्रेम सिन्धु उछलता है तब कोई कहाँ कुछ सोचता है …..फिर ये तो सखी हैं ….सिद्धों की भी परम सिद्ध ….युगलवर की लाड़ली ।

अरी देख ! इस सुन्दर जोरी को निहार तो सही ….मेघ के समान श्याम सुन्दर और तपते स्वर्ण के समान प्रिया जी ….कितने सुन्दर लग रहे हैं ना ! यह छवि तो अपूर्व सौन्दर्य सुषमा को अपने में समेटे हैं । हरिप्रिया मन ही मन मुस्कुरा रहीं हैं …..कामदेव अच्छों अच्छों के रूप छवि के अहंकार को नष्ट करने वाला है …किन्तु ये युगल छवि तो कोटि कामदेव के अहंकार को भी दमित करने का सामर्थ्य रखती है …..ऐसी सुन्दर छवि ! हरिप्रिया बलैयाँ लेती हैं ।

कुछ देर में हरिप्रिया को जब स्व भान हुआ तब उन्होंने नेत्र खोले …युगलवर की झाँकी अब वहाँ नही थी ….उस स्थान को प्रणाम करके सखी जी उठीं ….और मेरी ओर देखते हुए बोलीं ….सुन ! ये भूमि ही चमत्कारिक है ….यहाँ हर पल चमत्कार होते रहते हैं ….युगलसरकार पता नही किस कुँज में प्रकट हो जाएँ , पता नही कब कौन सी ऋतु आजाए और हम सब उसी ऋतु अनुसार सेवा की सामग्रियाँ जुटायें । क्यों कि इच्छा तो युगल की ही चलती हैं यहाँ ।

कुछ देर मौन हो गयीं सखी जी , फिर बोलीं – यहाँ सखीजनों के सिवाय और किसी का प्रवेश नही है …..और “मोहन महल” में तो अष्टसखियों का ही प्रवेश है ….सेवा की सामग्रियों के साथ केवल वही जाती हैं ।

क्या आप मोहन महल में नही गयीं ?

श्रीरंगदेवि जी की कृपा से गयी हूँ …..इन अष्टसखिन की कृपा हो तो अन्य सखियों को भी प्रवेश मिल जाता है …..हरिप्रिया जी बोलीं । कुछ देर मौन रहकर फिर आगे उन्होंने कहा …काल का यहाँ कोई क्रम नही है ….सत्व, रज , तम आदि जो प्रकृति के गुण हैं उनकी यहाँ कोई गति नही हैं …..यहाँ तो कालातीत और गुणातीत रस ब्रह्म का रसोत्सव निरन्तर चलता ही रहता है ….चल ही रहा है । ये कहते हुए सखी जी ने चारों ओर अपने हाथों के संकेत से मुझे बताया था ।

मैंने उस समय देखा ….श्रीवृन्दावन अलौकिक मणि माणिक्य से जगमगा रहा था ….सूर्य और चन्द्र का प्रकाश भी व्यर्थ था इनके आगे ….किन्तु प्रकाश सूर्य से अधिक हो तो ग्रीष्म का भान होता होगा ना , इतना प्रकाश जगमग होने पर भी ….शीतल था , सब कुछ शीतल था ।

मेरी बात सुनकर अब हरिप्रिया जी कहती हैं ……इन युगल की छवि ने रसिक समाज का बड़ा उपकार किया है ….मुक्ति जैसे सुख को छुड़वा कर “सेवा सुख” देकर प्रेम सरोवर में डुबकी ही लगवा दी है । और इतना ही नही …..ऊपर देखो ….हरिप्रिया जी के ये कहने से जब मैंने ऊपर देखा तो – जितने भगवद्अवतार थे, कोई अंशावतार , कोई आवेशावतार , कोई पूर्णावतार ….ये सब इन्हीं युगल सरकार की स्तुति कर रहे थे …ये मुझे चकित करने वाला दृष्य दिखा दिया था ।

ये क्या है ? मैंने हरिप्रिया जी से पूछा तो उन्होंने कहा …..

सबसे उच्च लोक हैं वैकुण्ठ , ये परम धाम हैं ….किन्तु वैकुण्ठ से ऊपर है गोलोक धाम …अब क्या बताऊँ ….हरिप्रिया कहती हैं …..”करैं गर्व गोलोक के सर्व भ्राजैं” । गोलोक धाम को जो गर्व था कि हम सबसे बड़े हैं …किन्तु इस श्रीवन ने , इस निकुँज ने उसका गर्व भी चूर चूर कर दिया ।

( इस बात से कोई ये न समझे , कि किसी धाम को यहाँ छोटा या बड़ा बताया गया है , नही , महावाणी का यही कहना है की ऐश्वर्य से माधुर्य ज़्यादा श्रेष्ठ है , यानि विशुद्ध प्रेम ही श्रेष्ठ है , ये बात बताने के लिए यहाँ इन धामों की चर्चा की गयी है ।)

हरिप्रिया जी कहती हैं …जो अन्य साधन को सत्य मानते हैं किन्तु इस प्रेम मार्ग को काल्पनिक मानकर इसकी उपेक्षा करते हैं , या जो अन्य सकाम तीर्थों में भ्रमण करते रहते हैं किन्तु प्रेम धाम श्रीवृन्दावन की उपेक्षा करते हैं …वो इस रस-प्रेम से वंचित ही रहते हैं …उन्हें कुछ प्राप्त नही होता ।

सुन ! कर्म और ज्ञान से ये पराभक्ति प्राप्त नही होती है …..ये प्रेम तो जब सखी जन की कृपा होती है तभी प्राप्त होता है …और तत्क्षण युगल सरकार दर्शन देने के लिए प्रकट हो जाते हैं ।

मैंने उसी समय हरिप्रिया जी के चरण पकड़ लिए और कहा …इसलिए तो मैंने इन चरणों का आश्रय लिया है …हरिप्रिया जी हंसते हुए बोलीं …मेरे नही , अष्टसखिन के …या उन अष्ट में से एक के …..मैंने सजल नयनों से कहा ….उन तक भी तो आप ही पहुँचायेंगी । हरिप्रिया जी मेरी बात सुनकर बस मुसकुराईं थीं ।

शेष अब कल –

[ Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (101)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

गोपियों का श्रीकृष्ण को पूर्वरमण की याद दिलाना

(सिञ्चांग नस्त्वदधरामृतपूरकेण……स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः)
सिञ्चांग नस्त्वदधरामृपूरकेण हासावलोककलगीत-जहृच्छयाग्निम् ।
नो चेद् वयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहा ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ।।
यर्ह्यम्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य ।
अस्प्राक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्षमंग स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः ।।[1]

श्रीकृष्ण ने कहा कि लौट जाओ! गोपियों ने कहा कि हमारे लौट जाने में देर नहीं है अगर तुम्हें कोई रुकावट नहीं है क्योंकि तुम्हारे मौनमात्र से ही घर तो क्या, परलोक ही चली जायेंगी। जाने से अगर रोकोगे तो तुम्हीं रोकोगे, नहीं तो हम चली जायेंगी। श्रीकृष्ण ने कहा- बाबा, ऐसी क्या तबीयत खराब हो गयी है तुम्हारी, ऐसी क्या तकलीफ है तुमको, क्या रोग हो गया है तुमको कि जिसके कारण तुम मरने पर तकलीफ है तुमको, क्या रोग हो गया है तुमको कि जिसके कारण तुम मरने पर उतारू हो? उसकी कोई दवा बताओ तो हम दवा-दारू करें, तुमको जिन्दा रखें। गोपियों ने कहा कि हमारे शरीर में कोई रोग नहीं है। न कोई रोग है न राग है, बस हमारे दिल में आग लग गयी है, वह जलाती है।

भगवान ने कहा कि अरे गोपियों। इसका आग का कोई उपचार नहीं है, इसको करो उपचार। यह आग शरीर में नहीं लगी है, दिल में लगी है, जो दिल में लगती है आग वह हृत्-शयाग्नि है, कामाग्नि है। गोपी कहती हैं कि तुमसे मिलने के लिए जो हृदय में तीव्र ताप है, तीव्र आकांक्षा है, यही अग्नि है। दुनिया में ऐसा कोई प्राणी नहीं होता, न देवता, न मनुष्य, न पशु, न पक्षी जिसके हृदय में यह रोग न हो जो अग्नि आध्यात्मिक है। अध्यात्म माने होता है शरीर के भीतर रहने वाली चीज। जो मन में होवे सो आध्यात्मिक है, जो इंद्रियों में है वो आध्यात्मिक है, जो शरीर में होवे सो आध्यात्मिक है।+

अपने अन्दर जो चीज है वही आध्यात्मिक है- आराम की होवे तो और तकलीफ होवे तो। दुःख भी आध्यात्मिक है। आप जानते हैं कि तीन तरह के ताप होते- आध्यात्मिक, आधिदैवक, आधिभौतिक और सुख भी आध्यात्मिक होते हैं। तो ये जो भावाग्नि है, कामाग्नि है, वह आध्यात्मिक है। माने मन के भीतर ये होती हैं। तो ये दो तरह की होती है- लौकिक वस्तु-विषयक और अलौकिक वस्तु-विषयकामन हुआ रोटी-वोटी खा ली, भूख की ज्वाला शान्त हो गयी। किसी को पैसे के लिए मन में आग जल रही थी, पैसा मिल गया शान्त हो गयी। स्त्री-पुरुष चाहते थे, मिल गये, शान्त हो गयी काम की आग। तो यह लौकिक वस्तु की प्राप्ति के लिए जो आग होती है वह छोटी चीज के लिए होती है।

भक् से जलती है और बुझ जाती है; फिर जलती है फिर बुझ जाती है। यह बारूद की आग की तरह चिनगारी उठती रहती हैं, और बुझती रहती हैं, लेकिन अलौकिक वस्तु के लिए, ईश्वर के लिए, श्रीकृष्ण के लिए जब कामाग्नि उदय होती है तब काम की आग तो सबके जलती हैं पर कोई विषय से भोग चाहता है, तो कोई ईश्वर से। कोई चाहता है कि अपनी यह प्यास क्षीरसागर के दूध से ही मिटायेंगे, भेंड़-बकरी के दूध से नहीं; कोई सोचता है कि अरे बाबा, चाहे गड्ढे का पानी मिले, हमको तो प्यास बुझाने से मतलब है। लेकिन जिसके चित्त में अलौकिकविषयक अग्नि का उदय हो जाय; अलौकिक विषयक अग्नि का उदय हो जाय; अलौकिक काम का उदय हो जाय, तो वह कहेगा कि हम अपनी वासना पूरी करेंगे पर श्रीकृष्ण से करेंगे, भगवान् से करेंगे।

अब यह तो जो काम है उसमें कामना तो वही है- धन के लिए होय तो लोभ और कुटुम्ब के लिए हो तो मोह, दुश्मन के लिए हो तो क्रोध और स्त्री-पुरुष के लिए हो तो काम- पर ईश्वर के लिए हो, तो प्रेम। उसी का नाम भक्ति। चिज बिलकुल वही। भक्ति माने कोई अलौकिक दृष्टि का नाम भक्ति नहीं है, अलौकिक विषयक सामान्य दृष्टि का नाम भक्ति है। यह जो अलौकिक विषयक काम होता है उसका फल लौकिक विषय की प्राप्ति के फल से भिन्न होता है। लौकिक विषय की प्राप्ति से काम नहीं मिटता। इसका फल क्या निकला?++

वेदान्ती लोग कहते हैं कि तृण से लेकर ब्रह्मलोक तक से वैराग्य करो, एक कण से लेकर प्रकृति तक वैराग्य करो। तो यह अलौकिक विषयक कामना जो आयी चित्त में इसने क्या किया कि दुनिया के लोगों को, वस्तुओं को, संसार के विषयभोग को तुच्छ बना दिया। अरे, इसकी ओर तो हम आँख उठाकर देखना नहीं चाहते। यह जो भगवत् प्रेम का आनन्द है वह देखने लायक है। तो गोपी ने कहा- महाराज, हमारे हृदय में जो कामाग्नि पैदा हो गयी है यही हमारी तकलीफ है। कृष्ण बोले- अरी गोपियों, भला यह रोग तुम कहाँ से ले आयी? किसको देखकर आया यह रोग?

है कोई गाँव में ऐसा, यदि कहीं हो तो हम कान पकड़कर ले आवें उसको क्या हमारे दादा को देखकर मन में आग जली है? हम कहो तो बुलाकर ले आवें दाऊ-दादा को। गोपियों ने कहा- नहीं, तुम्हारी मुस्कान ने, तुम्हारी चितवन ने यह आग लगायी है; और तुम्हारी बाँसुरी ने फूँककर इस आग को प्रज्वलित कर दिया है। हासावलोककलगीत-जहृच्छयाग्निम्। अच्छा बाबा, इसकी कोई दवा हो तो बताओ। आग की दवा तो पानी है। कहो तो ले आवें यमुनाजल। गोपी ने कहा- सिञ्चांग नस्त्वदधरामृतपूरकेण यह अग्नि यमुनाजल से नहीं बुझेगी, वह तो तुम्हारे अधरामृत की बाढ़ से ही बुझेगी।

‘पूर’ माने बाढ़ और ‘क’ माने जल। श्रीवल्लभाचार्य जी महाराज ने ‘क’ का अर्थ जल किया। तो अधरामृतपूरकेणका अर्थ हुआ कि एक क्षण के लिए अधरामृत नहीं, अधरामृत पर अधरामृत, अधरामृत। उसकी बाढ़ आ जाय। उससे हम लोगों की अग्नि शान्त होगी।

श्रीकृष्ण ने कहा- जब मुस्कान से तुम्हारी अग्नि बढ़ी, चितवन से बढ़ी, वंशी की ध्वनि से बढ़ी, तो भला यह अधरामृत से घटेगी कैसे? वह तो और बढ़ जाएगी। ये तो तुम्हारी बुद्धि कुपथ्य माँग रही है। गोपी ने कहा- नहीं, थोड़ी देर का अधरामृत तो अग्नि बढ़ाने वाला है- जैसे आग में थोड़ा सा घी डालो तो आग बढ़ेगी, लेकिन टीन का टीन घी उड़ेल दो तो आग बुझ जायेगी। तो अधरामृत अगर थोड़ा दोगे तब तो यह कामाग्नि बढ़ेगी, परंतु यदि उसकी बाढ़ आ जाय तो वह बुझ जाएगी।

क्रमशः …….

प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
[Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (102)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

गोपियों का श्रीकृष्ण को पूर्वरमण की याद दिलाना

नस्त्वदधरामृतपूरकेण हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निम् ।।

इसका देखो अर्थ है कि यदि आप ध्यान करें भगवान् की मुस्कान का, भगवान् की चितवन का या भगवान् की वंशीध्वनि का, तो आपके मन में भगवान् से मिलने की लालसा जागृत होगी और लालसा जागृत होने पर भगवान् का जो दिव्य अमृत है, अमृतरस है, वह आपको प्राप्त होगा।

नो चेद् वयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहा- गोपी बोलीं कि देखो कृष्ण! यदि ऐसा नहीं करोगे, तो कामाग्नि तो हृदय में पहले से है। एक विरहाग्नि हम और जला देंगे, तो उस अग्नि में तुम्हारा ध्यान करती हुई हम यह शरीर छोड़ देंगी और उसका फल यह होगा कि तुम्हारी पदवी को हम प्राप्त हो जावेंगी। हम कृष्ण हो जावेंगी। तुम्हारी पदवी को प्राप्त हो जावेंगी, इसका अर्थ यह भी है कि तुम जिस रास्ते से चलते हो ना, उसमें हम खाक होकर मिल जायेंगी, माने तुम्हारे चरणों की धूल बन जायेंगी। अथवा पदवी का यह भी अर्थ है कि जहाँ तुम रहते हो- जिस मृत्युधाम में, गोलोक में, वृन्दावनधाम में- वहाँ हम उस नित्य वृन्दावन धाम की वासिनी हो जायेंगी।

अब देखो संस्कृत भाषा की एक विशेषता आपको सुनाते हैं- यह तो तबकी बात है, जब श्रीकृष्ण ने मना कर दिया था कि तुम लौट जाओ। बाद में तो प्रसन्न हो गये, रासलीला हुई। तो कुछ गोपी जरा अपना मान बताने लगीं कि कृष्ण। हम तुम्हारे बराबर नहीं, बहुत बड़ी है, कोई मामूली थोड़े हैं। श्रीकृष्ण ने कहा कि गोपी। अभी थोड़ी देर पहले जब मना किया था तब तो तुमने कहा था कि हम तो विरहाग्नि से जलकर मर जावेंगी, और ध्यान करके मरकर तुम्हारी पदवी को प्राप्त हो जावेगी उस समय यह मान तुम्हारा कहाँ चला गया था? अब मान क्यों करती हो?
गोपी ने कहा- अच्छा, तुमने हमारी बात का मतलब यह समझा? अरे, हमने तो बात दूसरी कही थी। तुम पंडित बनते हो और हमारी बात समझी नहीं। क्या बात है, तो बोली-बात यह कही थी कि हासावलोककलगीत जह्च्छयाग्निम्- हम जब तुमको देखकर खुशी से मुस्कुराने से लगती हैं कि हमारा नन्दनन्दन कितना बढ़िया है, रोज गाय चराने जाता है, और कैसा मुकुट बाँधता है, कैसा बाँसुरी बजाता है, गाता है, कितना सुन्दर है, कितनी बहादुरी का काम करता है और कभी-कभी जब हम तुम्हारी आँख से आँसू पोंछने लगती हैं और कभी-कभी जब हम तुम्हारी आँख से आँसू पोंछने लगती हैं और कभी–कभी गा-बजाकर हम तुमको सुला देती हैं, तो इससे तुम्हारे हृदय में- हमारे हृदय में नहीं- काम की अग्नि प्रज्वलित होती है-+

‘हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निम्’ ‘त्वदधरामृतपूरकेण सिञ्च’ तो अब इस आग को तुम बुझाना चाहते हो तो अपना ही हित समझकर बुझाओ, हमारी ओर मत देखो। हमने तो यही कहा था। अगर तुमने कुछ गड़बड़ की हमको छू दिया या छेड़ दिया, तो ‘वयं विरहाजाग्न्युपयुक्तदेहा’ हमारे पति हैं, हमारे माँ-बाप हैं, हमारे भाई बन्धु हैं, हम सती सावित्री हैं कोई मामूली थोड़ी हैं, ऐसी आग उठती है हमारे हृदय में कि हम मर मिटेंगी परंतु ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ध्यान में भी हम तुम्हें मिल नहीं सकतीं। हमारा ख्याल छोड़ों, हमने तो ऐसा कहा था, तुमने तो उल्टा समझ लिया! हम कभी मनके भीतर तुमको नहीं घुसने देंगी।

शरीर की बात तो जुदा, हम ध्यान में भी तुमको नहीं छुएँगी। हमने तो यह कहा था। बात यह है कि कोई गोपी तो साधनसिद्धि है, कोई कृपासिद्ध है, कोई श्रुतिरूप है, कोई ऋषिरूप है, कोई गोलोक से आयी हुई हैं। कोई कृष्ण की सब चातुरी जानती है। कोई कृष्ण की माधुरी का रस-रहस्य समझती है और कोई बिचारी भोली-भाली है, तो उनके मना करने का रहस्य नहीं समझती है, रोने लगती हैं। श्लोक तो एक होता है, लेकिन उसमें से भाव तरह-तरह का।

यर्ह्म्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य ।
अस्प्राक्ष्य तत्प्रभृति नान्यसमक्षमंग स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः ।।

अब जब भगवान ने कहा कि लौट जाओ तो यह भी एक प्रेम की महिमा है, प्रेम का स्वभाव है कि बुलाओ तो भाग जावें और भाग जावें तो पीछा करो। एक श्लोक है ‘कृष्ण-कर्णामृत’ में :
हे देव, हे दयति, हे श्रीभुवनैकबन्धो, हे कृष्ण हे चपल हे करुणैकसिन्धो ।
हे नाथ, हे रमण, हे नयनाभिराम, हा हा कदानुभवितासि पदं दृशोर्मे ।

एक गोपी रात्रिभर इस प्रतीक्षा में रही कि श्रीकृष्ण आवें, हमें दर्शन दें। जब श्रीकृष्ण सबेरे उस रास्ते से निकले तो दरवाजा खटखटाया। गोपी ने आकर दरवाजा खोल। बोले- देखो गोपी, देर हो गयी, माफ करना। यह घटना बाहर हुई, ऐसा ही नहीं, गोपी के ध्यान में भी ऐसा हो सकता है।++

गोपी ने कहा- अरे, तुम तो देव हो! ‘दीव्यति इति देवः।’ तुम घर-घर घुमते हो, तुम तो घर-घुमने हो गये, तुम तो चटोरे हो गये, कहीं माखन में लग गये, कहीं रोटी में लग गये।

कृष्ण ने कहा- अरे गोपी, मैं तेरे लिए आया हूँ, देख, सबेरे उठकर आया हूँ। अब तुम्हें मेरी जरूरत नहीं है तो मैं जाता हूँ। अब ध्यान में गोपी की ओर पीठ करके ज्यों चले, तो गोपी बड़े जोर से पुकारती है- हे दयित, हे प्यारे, हे नाथ, तुम्हारे बिना तो प्राण ही नहीं रहेंगे। तो फिर कृष्ण लौट आये। दरवाजे के बाहर से देखने लगी- हे भुवनैकबन्धो, अरे, तुम हमारे भर ही थोड़े हो, दुनिया-भर के हो; तो अभी पता नहीं कहाँ-कहां से आये हो, कहाँ-कहाँ जाना पड़ेगा, घुस आये हमारे घर में!

कृष्ण ने कहा- गोपी, अगर गाली देना है तो हम जानते हैं, और दरवाजे के बाहर हो गये। तो बड़े जोर से पुकारती है गोपी- हे कृष्ण! अरे बाबा, तुम कैसे भी हो, तुमने तो हमारे प्राण आकृष्ट कर लिए हैं। कहने का अभिप्रायः यह कि बारंबार आयें। आयें तब तो तिरस्कार करे, उपेक्षा करे और चले जायँ तो रोवे, हाथ-पाँव पीटे और बुलावें। तो प्रेम की रीति है वो, ‘अहिखिगतिः प्रेम्णः स्वभावकुटिला भवेत्’ जैसे साँप सीधे नही चलता है, कभी दाहिनी, कभी बायें, टेढ़े-मेढ़े चलता है ऐसे जो प्रेम है उसकी गति भी कुटिल है।

प्रेम शक्ति है, ज्ञान शक्ति नहीं है, ज्ञान शक्ति का प्रकाशक है और प्रेम तो स्वयं शक्तिरूप है, प्रेम पंगु को पाँवाला बना देता है, अन्धे को आँखवाला बना देता है, निर्बुद्धि को चतुर बना देता है, तो प्रेम में बड़ी भारी शक्ति है। जब श्रीकृष्ण ने कहा- अरे गोपियो, तुम जाओ, अपने घर वालों के साथ हँसो-खेलो, हमारे पास क्यों आयी हो? तो आज तो यह विपरीत हो गया क्योंकि रोज गोपियाँ ऐसा करती थीं; आज कृष्ण ने ऐसा कर दिया। ‘यर्ह्म्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य’ गोपियों में दैन्य का उदय हुआ- हे देव, हे दयित, हे भुवनैकबन्धो, हे कृष्ण। अब श्रीकृष्ण ने कहा- गोपी। मैं चुम्बक हूँ और तुम लोहा हो, अगर हमारी ओर तुम खिंच आयी हो, तो इसमें हमारा क्या दोष? तो लो, हम तुम्हारे पास आते हैं।

क्रमशः …….

प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
[Niru Ashra:

श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 20-23
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यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योग सेवया |
यत्र चैवत्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति || २० ||

सुख मात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् |
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्र्चलति तत्त्वतः || २१ ||

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः |
यास्मन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते || २२ ||

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् || २३ ||

यत्र – जिस अवस्था में; उपरमते – दिव्यसुख की अनुभूति के करण बन्द हो जाती है; चित्तम् – मानसिक गतिविधियाँ; निरुद्धम् – पदार्थ से निवृत्त; योग-सेवया – योग के अभ्यास द्वारा; यत्र – जिसमें; च – भी; एव – निश्चय हि; आत्मना – विशुद्ध मन से; आत्मानम् – आत्मा की; पश्यन् – स्थिति का अनुभव करते हुए; आत्मनि – अपने में; आत्मानम् – आत्मा की; पश्यन् – स्थिति का अनुभव करते हुए; आत्मनि – अपने में; तुष्यति – तुष्ट हो जाता है; सुखम् – सुख; आत्यन्तिकम् – परम; यत् – जो; तत् – वह; बुद्धिः – बुद्धि से; ग्राह्यम् – ग्रहणीय; अतीन्द्रियम् – दिव्य; वेत्ति – जानता है; यत्र – जिसमें; न – कभी नहीं; च – भी; एव – निश्चय हि; अयम् – यह; स्थितः – स्थित; चलति – हटता है; तत्त्वतः – सत्य से; यम् – जिसको; लब्ध्वा – प्राप्त करके; च – तथा; अपरम् – अन्य कोई; लाभम् – लाभ; मन्यते – मानता है; न – कभी नहीं; अधिकम् – अधिक; ततः – उससे; यस्मिन् – जिसमें; स्थितः – स्थित होकर; न – कभी नहीं; दुःखेन – दुखों से; गुरुणा अपि – अत्यन्त कठिन होने पर भी; विचाल्यते – चलायमान होता है; तम् – उसको; गुरुणा अपि – अत्यन्त कठिन होने पर भी; विचाल्यते – चलायमान होता है; तम् – उसको; विद्यात् – जानो; दुःख-संयोग – भौतिक संसर्ग से उत्पन्न दुख; वियोगम् – उन्मूलन को; योग-संज्ञितम् – योग में समाधि कहलाने वाला |

भावार्थ
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सिद्धि की अवस्था में, जिसे समाधि कहते हैं, मनुष्य का मन योगाभ्यास के द्वारा भौतिक मानसिक क्रियाओं से पूर्णतया संयमित हो जाता है | इस सिद्धि की विशेषता यह है कि मनुष्य शुद्ध मन से अपने को देख सकता है और अपने आपमें आनन्द उठा सकता है | उस आनन्दमयी स्थिति में वह दिव्या इन्द्रियों द्वारा असीम दिव्यासुख में स्थित रहता है | इस प्रकार स्थापित मनुष्य कभी सत्य से विपथ नहीं होता और इस सुख की प्राप्ति हो जाने पर वह इससे बड़ा कोई दूसरा लाभ नहीं मानता | ऐसी स्थिति को पाकर मनुष्य बड़ीसे बड़ी कठिनाई में भी विचलित नहीं होता | यह निस्सन्देह भौतिक संसर्ग से उत्पन्न होने वाले समस्त दुःखों से वास्तविक मुक्ति है |
तात्पर्य
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योगाभ्यास से मनुष्य भौतिक धारणाओं से क्रमशः विरक्त होता जाता है | यह योग का प्रमुख लक्षण है | इसके बाद वह समाधि में स्थित हो जाता है जिसका अर्थ यह होता है कि दिव्य मन तथा बुद्धि के द्वारा योगी अपने आपको परमात्मा समझने का भ्रम ण करके परमात्मा की अनुभूति करता है | योगाभ्यास बहुत कुछ पतञ्जलि की पद्धति पर आधारित है | कुछ अप्रामाणिक भाष्यकार जीवात्मा तथा परमात्मा में अभेद स्थापित करने का प्रयास करते हैं और अद्वैतवादी इसे ही मुक्ति मानते हैं, किन्तु वे पतञ्जलि की योगपद्धति के वास्तविक प्रयोजन को नहीं जानते | पतञ्जलि पद्धति में दिव्य आनन्द को स्वीकार किया गया है, किन्तु अद्वैतवादी इस दिव्य आनन्द को स्वीकार नहीं करते क्योंकि उन्हें भ्रम है कि इससे कहीं उनके अद्वैतवाद में बाधा ण उपस्थित हो जाय | अद्वैतवादी ज्ञान तथा ज्ञाता के द्वैत को नहीं मानते, किन्तु इस श्लोक में दिव्य इन्द्रियों द्वारा अनुभूत दिव्य आनन्द को स्वीकार किया गया है | योगासूत्र में (३.३४) महर्षि कहते हैं – पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति |

यह चितिशक्ति या अन्तरंगा शक्ति दिव्य है | पुरुषार्थ का तात्पर्य धर्म, अर्थ, काम तथा अन्त में परब्रह्म से तादात्म्य या मोक्ष है | अद्वैतवादी परब्रह्म से इस तादात्मय को कैवल्यम् कहते हैं | किन्तु पतञ्जलि के अनुसार कैवल्यम् वह अन्तरंगा या दिव्य शक्ति है जिससे जीवात्मा अपनी स्वाभाविक स्थिति से अवगत होता है | भगवान् चैतन्य के शब्दों में यह अवस्था चेतोदर्पणामार्जनम् अर्थात् मन रूपी मलिन दर्पण का मार्जन (शुद्धि) है | यह मार्जन वास्तव में मुक्ति या भवमहादावाग्निनिर्वापणम् है | प्रारम्भिक निर्वाण सिद्धान्त भी इस नियम के सामन है | भागवत में (२.१०.६) इसे स्वरूपेण व्यवस्थितिः कहा गया है | भगवद्गीता के इस श्लोक में भी इसी की पुष्टि हुई है |

निर्वाण के बाद आध्यात्मिक कार्यकलापों की या भगवद्भक्ति की अभिव्यक्ति होती है जिसे कृष्णभावनामृत कहते हैं | भागवत के शब्दों में – स्वरूपेण व्यवस्थितिः – जीवात्मा का वास्तविक जीवन यही है | भौतिक दूषण से अध्यात्मिक जीवन के कल्मष युक्त होने की अवस्था माया है | इस भौतिक दूषण से मुक्ति का अभिप्राय जीवात्मा की मूल दिव्य स्थिति का विनाश नहीं है | पतञ्जलि भी इसकी पुष्टि इस शब्दों से करते हैं – कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति – यह चितिशक्ति या दिव्य आनन्द ही वास्तविक जीवन है | इसका अनुमोदन वेदान्तसूत्र में (१.१.१२) इस प्रकार हुआ है – आनन्दमयोSभ्यासात् | यह चितिशक्ति ही योग का परमलक्ष्य है और भक्तियोग द्वारा इसे सरलता से प्राप्त किया जाता है | भक्तियोग का विस्तृत विवरण सातवें अध्याय में किया जायेगा | इस अध्याय में वर्णित योगपद्धति के अनुसार समाधियाँ दो प्रकार की होती हैं – सम्प्रज्ञात तथा असम्प्रज्ञात समाधियाँ | जब मनुष्य विभिन्न दार्शनिक शोधों के द्वारा दिव्य स्थिति को प्राप्त होता है तो यह कहा जाता है कि उसे सम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त हुई है | असम्प्रज्ञात समाधि में संसारी आनन्द से कोई सम्बन्ध नहीं रहता क्योंकि इसमें मनुष्य इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले सभी प्रकार के सुखों से परे हो जाता है | एक बार इस दिव्य स्थिति को प्राप्त कर लेने पर योगी कभी उससे डिगता नहीं | जब तक योगी इस स्थिति को प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक वह असफल रहता है | आजकल के तथाकथित योगाभ्यास में विभिन्न इन्द्रियसुख सम्मिलित हैं, जो योग के सर्वथा विपरीत है | योगी होकर यदि कोई मैथुन तथा मादकद्रव्य सेवन में अनुरक्त होता है तो वह उपहासजनक है | यहाँ तक कि जो योगी योग की सिद्धियों के प्रति आकृष्ट रहते हैं वे भी योग में आरूढ़ नहीं कहे जा सकते | यदि योगीजन योग की आनुषंगिक वस्तुओं के प्रति आकृष्ट हैं तो उन्हें सिद्ध अवस्था को प्राप्त नहीं कहा अ सकता , जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है | अतः जो व्यक्ति आसनों के प्रदर्शन या सिद्धियों के चक्कर में रहते हैं उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि इस प्रकार से योग का मुख्या उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है |

इस युग में योग की सर्वोतम पद्धति कृष्णभावनामृत है जो निराशा उत्पन्न करने वाली नहीं गई | एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने धर्म में इतना सुखी रहता है कि उसे किसी अन्य सुख की आकांशा नहीं रह जाती | इस दम्भ-प्रधान युग में हठयोग, ध्यानयोग तथा ज्ञानयोग का अभ्यास करते हुए अनेक अवरोध आ सकते हैं, किन्तु कर्मयोग या भक्तियोग के पालन में ऐसी समस्या सामने नहीं आती |

जब तक यह शरीर रहता है तब तक मनुष्य शरीर की आवश्यकताएँ – आहार, निद्रा, भय तथा मैथुन – को पूरा करना होता है | किन्तु को व्यक्ति शुद्ध भक्तियोग में अतवा कृष्णभावनामृत में स्थित होता है वह शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति करते समय इन्द्रियों को उत्तेजित नहीं करता | प्रत्युत वह घटे के सौदे की पूर्ति करते समय जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं को स्वीकार करता है और कृष्णभावनामृत में दिव्यसुख भोगता है | वह दुर्घटनाओं, रोगों, अभावों और यहान तक की अपने प्रियजनों की मृत्यु जैसी आपातकालीन घटनाओं के प्रति भी निरपेक्ष रहता है, किन्तु कृष्णभावनामृत या भक्तियोग सम्बन्धी अपने कर्मों को पूरा करने में वह सदैव सचेष्ट रहता है | दुर्घटनाएँ उसे कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं कर पाती | जैसा कि भगवद्गीता में (२.१४) कहा गया है – आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत | वह इन प्रसांगिक घटनाओं को सहता है क्योंकि वह यह भलीभाँति जानता है कि ये घटनाएँ ऐसी ही आती-जाती रहती हैं और इनसे उसके कर्तव्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता | इस प्रकार योगाभ्यास में परं सिद्धि प्राप्त करता है।

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