Niru Ashra: 🙏🙏🌸🙏🙏
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 139 !!
कुरुक्षेत्र में श्रीराधाकृष्ण का मिलन
भाग 3
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और श्याम सुन्दर नें देखा……..तपे हुए सुवर्ण की तरह गौर वर्णी ………कृश कटि…….लजीले नयन………नीली साडी ……..
दोनों एक दूसरे को देखते ही रहे…………अपलक ………किसी के पलक भी नही गिर रहे………….दोनों के नेत्रों से आनन्द के अश्रु बहते जा रहे हैं ……….दोनों बढ़े आगे …….धीरे धीरे …….ये सहज था ……….सहजता में बढ़ रहे थे दोनों…….पास में जाकर खड़े हो गए फिर……..पास में……….बहुत पास……..दोनों की साँसे टकरा रही थीं………दोनों के भीतर का सौ वर्षों का महावियोग………छटपटाहट उसकी ही थी ।
कुछ नही……….एकाएक हृदय से लगा लिया दोनों नें ……..एक दूसरे को………एक हो गए ………दोनों एक हैं……..धड़कनें एक हो गयीं ……..प्राण एक हो गए……….
ये होना ही था……….क्यों की प्रेम देवता भी तो यही चाहते हैं कि …….दो एक हों ………यही तो चमत्कार है प्रेम का ।
दिव्य मिलन हुआ……..पर कुछ देर बाद दोनों ही हिलकियों से रो पड़े थे………..आनन्द के अश्रु निरन्तर बहते जा रहे थे ।
कहते हैं …….उस समय अस्तित्व नें पुष्प बरसाए आकाश से ।
उफ़ ! सौ वर्षों का भीषण महावियोग था……..आज जाकर मिलन की वेला आयी थी……..इधर दोनों युगल मिल रहे थे ……….उधर बाहर बाजे गाजे बजनें शुरू हो गए थे ।
शेष चरित्र कल –
🦚 राधे राधे🦚
[Niru Ashra: !! निकुँजोपासना के सिद्धान्त !!l
( “सिद्धान्त सुख” – 23 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
श्रीहरिप्रिया पद पावनो, अतिही दुल्लभ सोइ ।
बहुत बिघन जग मगहि में, मिलिहि चलें सुख होइ ॥
॥ पद ॥
मिलि चलौ मिलि चलौ मिलि चलें सुख महा, बहुत हैं बिघन जग-मगहि माहीं ।
मिलि चलें सकल मंगल मिलें सहजहीं, अनमिलि चलेंऽब सुख नहिं कदाहीं ॥
मिलि चलें होत सों अनमिलि चलें कहाँ, फूट ते होत हैं फटफटाहीं ।
श्रीहरिप्रियाजू कौ इह परमपद पावनौं , अतिहि दुल्लभ महासुलभ नाहीं ॥ १३ ॥
ये प्रेम मार्ग है ….यहाँ सखीभाव की उपासना है ….तो अकेले चलना नही है । अकेले चलने का अर्थ …मनमानी आचरण , मनमुखी हो जाना । हे रसिकों ! आपने कल के पद में सुना-पढ़ा कि सखीभाव की प्राप्ति साधक को हो गयी है …किन्तु यहाँ से एक दिक्कत देखी गयी है …सखी भाव कहीं आपको मनमुखी तो नही बना रहा ? कहीं आप उच्छृंखल तो नही हो रहे ।
मेरे देखे ऐसे ही सखीभाव के उपासक है …जो प्रियालाल को प्याज़ के पराठें भोग लगाते हैं …मैंने उनसे कहा भी ….ये क्या है ? तो वो बोले …अपनी सखी को प्रियालाल ने कहा कि बढ़िया पराठें बनाओ …प्याज़ के ? मैंने ये भी पूछ लिया । तो उनका उत्तर था ..मुझे प्रियालाल ने कहा ….सखी ! तुझे तो पसन्द हो वो पराठें बना । मुझे उनसे बहस में उलझना नही था इसलिए मैं कुछ बोला नही …हाँ इतना अवश्य कहा …ये मनमुखी आचरण क्यों ? क्या गुरुदेव ने शिक्षा नही दी ? तो उस सखी का उत्तर था …..सखी की कौन गुरु ? मैं इसके आगे कुछ नही बोला । किशोरी जी की हम सखी हैं ….तो हमारा कौन गुरु हो सकता है ? ये नाटक है …कोरा नाटक है , इससे आपको तनिक भी लाभ नही है …हाँ , हानि महा है ।
“अब तुमको अकेले नही चलना है”…..हरिप्रिया जी ने मेरा हाथ पकड़ लिया था …इनकी गुरु सखी वो किसी कुँज में सेवा सौंज लेने के लिए जा चुकी थीं ।
“सखी अकेले कैसे चले, मर्यादा नही है ना” ।
तो कैसे चलें ? मैंने पूछा । इसके उत्तर में हरिप्रिया जी ने कहा …मिल जुलकर चलो …मिल के चलो । अपनी सखियों की मण्डली में चलो ….हंसते खेलते चलो ….किन्तु अकेले नही मिल जुल के । मैं शान्त भाव हरिप्रिया जी की शिक्षा सुन रहा था …..कहाँ अकेले चलोगे ! काम है , क्रोध है , लोभ है , मोह , मत्सर है ….ये सब दुष्ट लोग हैं ….और तुम तो कोमलांगी सखी हो ….इन सबसे बचके रहना है …अकेले रहोगे , तो अकेले देखकर ये दुष्ट लोग तुम्हें घेरने की तैयारी करेंगे …..मार्ग में बहुत विघ्न आयेंगे …बहुत विघ्न । हरिप्रिया जी अभी भी मेरा हाथ पकड़े हुई थीं …..मैं उनके पीछे चल रहा था । वो मुझे उपदेश कर रहीं थीं । अकेले चलने में विघ्न हैं ….किन्तु मिलजुल कर चलने में महामंगल है ….मंगल ही मंगल है …और अनमिले चलो तो सुख इस मार्ग में तो कभी नही मिल सकता । ज्ञान मार्ग में अकेले चलो , किन्तु ये प्रेम मार्ग है इसमें तो मिल जुल के चलो । किससे मिल जुल के चलें ? मैंने पूछा तो मुझे उत्तर मिला ….अपनी सखियों से …अपने से बड़ी पूज्य सखियों से ….अपनी गुरु सखियों से …या अपने संग की सखियों से ।
जो इस प्रेम मार्ग का वरिष्ठ पथिक है …उसके साथ चलो ….आपको जिसने दीक्षा दी …वो गुरुदेव ….उनकी बातों को , उनके उपदेश के आधार पर चलो , मनमुखी चलने से , या, हरिप्रिया जी कहती हैं …अनमिले चलने से झगड़ा होगा ….कलह होगा …हृदय जलेगा । यहाँ शब्द है हरिप्रिया जी के ……अनिमिलि चलने से …फूट पड़ती है …और उससे “फटफटाहिं” ।
हे रसिकों ! अकेले चलोगे तो अपने बुद्धि का आश्रय होगा ….क्यों की गुरु की आज्ञा तो तुमने त्याग दी ….अब करोगे क्या …बुद्धि के दम पर …फटफट करते रहोगे ….यानि तर्क करते रहोगे …..यही सब बोलोगे …हम किशोरी जी की सखी हैं …किन्तु तुम्हारे गुरुदेव तो किशोरी जी के अत्यंत नज़दीक हैं …उनको छोड़कर तुम किशोरी जी की ओर बढ़ोगे तो तुम्हें लगता है किशोरी जी अपनी वरिष्ठ सखी का अपमान सह लेंगी । ना ।
हरिप्रिया जी मेरा हाथ पकड़ कर कहती हैं …ये उत्सव धर्म है , ये आनन्द का धर्म है …उत्सव अकेले में सम्भव नही है …उत्सव के लिए समाज चाहिए ….बस वो समाज जो है …सखी समाज …उससे मिल जुल कर चलो , लोग कहें , कहने दो …किन्तु तुम अकेले चलने की सोचना मत …अपने प्रेममार्ग में निष्ठा वाली सहेलियों को चुनों …और ऐसी सहेली हों …जिनको प्रिया लाल की चर्चा में आनन्द आए , जिनको प्रिया लाल के लिए उत्सव मनाने में उत्साह आए …नाचे , गाये ….यही करना है । यही इस प्रेम मार्ग का सिद्धान्त है …..इसलिए अकेले मत चलो ..मिल जुल के चलो ….इससे तुम लक्ष्य पा लोगे । हरिप्रिया जी कहती हैं …..मिल के चलोगे तो प्रिया लाल सुलभ हैं , और मिल के नही चलोगे तो बहुत दुर्लभ हैं ।
इसलिए ….गुरु की आज्ञा में , अपने गुरु के सिद्धान्त के साथ …मिल जुलकर …चलना है तभी सफलता मिलेगी । अन्यथा नही । इतना कहकर हरिप्रिया जी सीधे चलने लगीं सामने एक कुँज था ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (108)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का उदय
‘श्रीकृष्ण-इंद्रियतर्पणं भक्तिः’ श्रीकृष्ण की इन्द्रियों को प्रसन्न करने के लिए गोपी ऐसे वेश में जाती हैं कृष्ण के सामने कि कृष्ण देखकर खुश हो जायें, ऐसी आवाज में बोलती हैं कि उनके कान तर हो जायँ, ऐसे ढंग से छूती है कि वे तृप्त हो जायें। अपने जीव को श्रीकृष्ण के सुख के लिए बनाना, यह गोपी के प्रेम का लक्षण है।
गोपी कहती है कि हम न आपको नचाना चाहती, न गवाना चाहती, न बजाना चाहती, लेकिन हमारा द्वारा हमारे शरीर से, हमारे मन से, हमारे प्राण से, हमारे हृदय से, हमारे जीवन से तुम्हारी सेवा बने, बस यही चाहती हैं। जब तुम हमारी सेवा स्वीकार करोगे, तब हम समझेंगी कि तुम प्रसन्न हो।
तत्रः प्रसीद वृजिनार्दन तेङ्घ्रिमूलं प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशाः ।
त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीव्रकामतप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम् ।।
यह प्रसंग बड़े सुंदर प्रेम का प्रसंग है। भगवान् को पुरुषभूषण कहा। पुरुषभूषण माने पुरुषोत्तम भी होता है और भूषण का अर्थ होता है कि तुमको ही हम अपना श्रृंगार बनावें। हमारी मांग का सिन्दूर कौन? कि तुम। हमारे माथे की बिन्दी कौन? कि तुम। हमारे गले का हार कौन? कि तुम। हमारे कान का कुण्डल कौन? कि तुम। यह है पुरुषभूषण! हमें और आभूषण नहीं चाहिए, हमें तो तुम चाहिए।+
तत्रः प्रसीद वृजिनार्दन तेङ्घ्रिमूलं प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशाः ।
त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीव्रकामतप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम् ।।
अच्छा भाई, अपने मन के दृश्य को बदल दे जैसे रेडियो का स्विच बदल देते हैं। जिसके अंदर यह सामर्थ्य है कि अपने मन को जब चाहे तब बाजार भाव से बाहर निकाल दे और भगवद्भाव में लगा दे। वह तो बड़ा शक्तिशाली है। जो अपने मन को जब चाहे तब बंबई से निकालकर वृन्दावन पहुँचा दे, वह तो बड़ा भारी सामर्थ्यवान है। यह मैं-मैं, तू-तू करने वालों का काम नहीं है। काट दो ये दृश्य- भला वह संसार में कितना आसक्त है, वासनाओं का कितना गुलाम है, जो अपने मन को एक जगह से उठाकर दूसरी जगह नहीं रख सकता। यह कोई साधारण काम नहीं है, यह तो जो आप सब भाग्यशाली नहीं रख सकता। यह कोई साधारण काम नहीं है, यह तो जो आप सब भाग्यशाली पुण्यात्मा सत्संगी हैं, वही ये सब कर सकते हैं। चाँदनी रात, शरद ऋतु, यमुनाजी का तट, विपिनवास-
रे मन वृन्दा विपिन निहारा ।
यद्यपि मिलै कोटि चिन्तामनि तऊ ना हाथ पसार ।।
विपिन राज सीमा के बाहर हरिहू को न निहार ।
रे मन वृन्दा विपिन निहार ।।
यह प्रेम की सृष्टि है; जहाँ प्रेम ही प्रेम की सृष्टि मिले, चलो नावको ले चलें खेके वहीं। अपना मन जहाँ फँसा हुआ है, वहाँ से उठा लेने की सामर्थ्य होना चाहिए। मन अगर दुनिया में कहीँ फँसता हो, तो वहाँ से मन को खींच लो। अब चलो वहाँ जहाँ अकेले श्रीकृष्ण हैं- मोरमुकुटवाले, बाँसुरीवाले, पीताम्बरधरी, प्रेमभरी चितवन, अनुग्रह से पूर्ण भौहें और मन्द-मन्द मुस्कान। श्रीकृष्ण ने कहा- देखो गोपी, हम तो अपने में मगन हैं, हम तो अपने रूप रस में, अपनी गान-माधुरी में, वंशी-माधुरी में तृप्त हैं। हम अपने रस में मगन होकर बाँसुरी बजा रहे हैं। यह खटपट करने के लिए तुम कहाँ से आ गयीं? आप लौट जाओ! हम बेख्वाहिश, बेपरवाह। तुम्हारी ओर कभी आँख उठाकर न देखें; बाल-ब्रह्मचारी, एकान्तजंगल में बाँसुरी बजाने वाले और स्वर संगीत के साधक, तुम बीच में कहाँ से दाल-भात में मूसरचंद हो गयी?++
गोपियों ने कहा- वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः श्रीकृष्ण। हम तो तुम्हारे चरणों की रज के शरणागत हैं। असल में प्रेम में काम बनता है तब जब एक कड़ा हो तो दूसरा नरम हो जाय; और दोनों कड़े पड़ जायँ तो प्रेम टूट जाता है, भला। यही प्रीति की रीति है, यही प्रेम का नियम है। बोलीं- हम तो तुम्हारे चरणों की रज हैं रज और रज नाहीं है, रज की शरण ग्रहण करती हैं। तो सीताराम। रज होने में भला क्या मजा है? एक तो यह जो रज है, इसमें अपनी इंद्रियों को तो कोई सुख मिलने वाला नहीं है, इसलिए रज होने का अर्थ यह हुआ कि अपनी भोग-वासना टूट गयी। दूसरे भगवान् के चरणों की रज बनाने का अभिप्राय यह है कि प्रेमी लोग चाहते हैं, कि मरने बाद भी हमारे शरीर में जो राख निकले-जलने के बाद जो भस्म हो- वह उस रास्ते में बिछ जाय, जिस पर हमारे प्रियतम चले हैं। तो रज की शरणागति माने अपनी इंद्रियों के भोग की जो वासना है उसका परित्याग करके अपने परम प्रियतम, श्रेष्ठतम् श्यामसुन्दर के अधीन होना; और तीसरी बात है अभिमान छोड़ना। रज में मिलना माने अभिमान टूटना।
गोपियों को त्याग का थोड़ा अभिमान था। सो वे पहुँच तो गयीं भगवान् के चरणों में, लेकिन त्यागाभिमान के कारण कि घर छोड़कर आयीं, धर्म छोड़कर आयीं, परिवार छोड़कर आयीं, हम अपने शरीर का श्रृंगार छोड़कर आयीं, सुख छोड़कर आयीं, जोर-जबरदस्ती करने लगीं कि आज तो कृष्ण। तुम्हें हमको अपनाना ही पड़ेगा। प्रेम का स्वभाव यह है कि वह किञ्चित भी अहं का भार नहीं सहता; इतना कोमल है। एक महात्मा से मैंने सुना था कि लौकिक लोग समझते हैं कि कोई वृत्ति बुरी होती है या कोई क्रिया बुरी होती है; परंतु यदि उसका उद्देश्य अच्छा हो तो सब ठीक हो जाता है। जैसे समझो मोह है; तो योगी कहता है कि मोहवृत्ति को मिटा दें, क्योंकि जब संसार में स्त्री, पुत्र, धन आदि से मोह होता है तो बुद्धि मूर्च्छित हो जाती है; किसी के मोह में फँस जाना, माने चित्त का विपरीत हो जाना है। परंतु भक्त लोग कहते हैं कि मोहवृत्ति में कोई दोष नहीं है : बस मोह ईश्वर कर लो। वेदान्ती कहते हैं कि मोह को धर्म से अनिषिद्ध होना चाहिए।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹श्रीमद्भगवद्गीता
[Niru Ashra: अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 30
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यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति || ३० ||
यः – जो; माम् – मुझको; पश्यति – देकहता है; सर्वत्र – सभी जगह; सर्वम् – प्रत्येक वस्तु को; च – तथा; मयि – मुझमें; पश्यति – देखता है; तस्य – उसके लिए; अहम् – मैं; न – नहीं; प्रणश्यामि – अदृश्य होता हूँ; सः – वह; च – भी; मे – मेरे लिए; न – नहीं; प्रणश्यति – अदृश्य होता है |
भावार्थ
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जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है उसके लिए न तो मैं कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है |
तात्पर्य
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कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भगवान् कृष्ण को सर्वत्र देखता है और सारी वस्तुओं को कृष्ण में देखता है | ऐसा व्यक्ति भले ही प्रकृति की पृथक्-पृथक् अभिव्यक्तियों को देखता प्रतीत हो, किन्तु वह प्रत्येक दशा में इस कृष्णभावनामृत से अवगत रहता है कि प्रत्येक वस्तु कृष्ण की ही शक्ति की अभिव्यक्ति है | कृष्णभावनामृत का मूल सिद्धान्त ही यह है कि कृष्ण के बिना कोई अस्तित्व नहीं है और कृष्ण ही सर्वेश्र्वर हैं | कृष्णभावनामृत कृष्ण-प्रेम का विकास है – ऐसी स्थिति जो भौतिक मोक्ष से भी परे है | आत्मसाक्षात्कार के ऊपर कृष्णभावनामृत की इस अवस्था में भक्त कृष्ण से इस अर्थ में एकरूप हो जाता है कि उसके लिए कृष्ण ही सब कुछ हो जाते हैं और भक्त प्रेममय कृष्ण से पूरित हो उठता है | तब भगवान् तथा भक्त के बीच अन्तरंग सम्बन्ध स्थापित हो जाता है | उस अवस्था में जीव को विनष्ट नहीं किया जा सकता और न भगवान् भक्त की दृष्टि से ओझल होते हैं | कृष्ण में तादात्म्य होना आध्यात्मिक लय (आत्मविनाश) है | भक्त कभी भी ऐसी विपदा नहीं उठाता | ब्रह्मसंहिता (५.३८) में कहा गया है-
प्रेमाञ्जनच्छुरित भक्तिविलोचनेन
सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति |
यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ||
“मैं आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, जिनका दर्शन भक्तगण प्रेमरूपी अंजन लगे नेत्रों से करते हैं | वे भक्त के हृदय में स्थित श्यामसुन्दर रूप में देखे जाते हैं |”
इस अवस्था में न तो भगवान् कृष्ण अपने भक्त की दृष्टि से ओझल होते हैं और ण भक्त उनकी दृष्टि से ओझल हो पाते हैं | यही बात योगी के लिए सत्य है क्योंकि वह अपने हृदय के भीतर परमात्मा रूप में भगवान् का दर्शन करता रहता है | ऐसा योगी शुद्ध भक्त बन जाता है और अपने अन्दर भगवान् को देखे बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता |


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