Niru Ashra: 🌸🌷🌸🌷🌸
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 140 !!
हे रुक्मणी ! श्रीराधा यानि “प्रेम”
भाग 1
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प्रभु ! आप कहाँ थे ?
उद्धव जी नें पूछा ।
कन्हैया !
बलराम जी नें इस नाम से पुकारा था आज…….अपनें अनुज को ।
चौंक कर कृष्ण नें देखा था बलभद्र को ……….।
वत्स ! कहाँ थे ? वसुदेव जी नें भी पूछा ।
“पिता जी ! वृन्दावन से बाबा मैया”……..इतना ही बोल सके कृष्ण ।
अभी तक आपनें स्नान भी नही किया ? कुछ बालभोग, कलेवा ।
रुक्मणी नें पूछा ……..तो – “नही मुझे मेरी मैया यशोदा नें माखन खिलाया दिया है……..कृष्ण नें कहा ।
पर आप तो बिना स्नान किये कुछ खाते नही थे………….
अब रुक्मणी के इस प्रश्न का क्या उत्तर दिया जाता ……….प्रेम सबसे बड़ा तत्व है …….क्या ये पता नही है रुक्मणी को !
प्रेम में नियम रहे………तो क्या उसे प्रेम कहेंगे ?
हमें भी ले चलता …………अकेले अकेले चला गया !
बलराम को शिकायत है ।
परसों सूर्यग्रहण है……..वृन्दावन वाले अभी हैं …..रहेंगें……दाऊ ! कभी भी मिल लेना……..इतना कहते हुए अपनें शिविर में चले गए थे कृष्ण ।
राधा मिली थी ?
ये रुक्मणी नें प्रश्न किया था ।
हाँ ……….मिली थी । कृष्ण नें रुक्मणी से नजर चुराते हुए कहा ।
क्या है राधा ? कौन है ये राधा ? मैं आपसे आज पूछ रही हूँ ……बताइये राधा कौन है ? रुक्मणी आक्रामक हो उठीं ।
बिना किसी को सूचना दिए चले गए मिलनें के लिये ……अरे ! हमें भी कहते ………हम भी चलतीं ………पर नही …..हाँ अकेले में मिलना होगा ना आपको ……..राधा से !
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –
🙇♀️ राधे राधे🙇♀️
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना के सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 24 )
गतांक से आगे –
!! दोहा !
आदि मध्य अवसान में, परिकर सहज सहेत ।
परतें पर श्रीहरिप्रिया, राजत परम निकेत ॥
!! पद !!
राजत परतें पर सर्वेश्वर परमधाम वृन्दावन निजघर।
आनन्द अहह्लादिनि अद्भतवर, गौर स्याम सोभा अपरंपर ॥ टेक ॥
आदि मध्य अवसान एक रस सब कारन कारन करतार ।
आगम अगम अगोचर अधिपति पदनख अनु आभा अवतार ॥१॥
विविध रूप इच्छा विग्रह करि अमित कोटि बैकुण्ठ विलास ।
जामधि उपजि समावत जामधि कमोग्रादि कुल कोटि प्रकास ॥२॥
सुद्ध सत्व अव्यय अविकृत कृत अगुण गुणालय ईस अनूप।
है है नहीं नहीं जिहि भाषत शब्द ब्रह्म सो सुद्ध स्वरूप ॥३॥
अद्वय द्वय बहु भेद विसेषण आदि आभास ऑचत अनन्त ॥
श्रीहरिप्रिया सहज परिकर सह करत विहार कामिनो कंत ॥ 14 !
*ये गुलाब कुँज है …इसमें सन्ध्या के समय वन विहार की वेला में युगलसरकार यहाँ रुकते हैं …हरिप्रिया सखी जी ने उस गुलाब कुँज को मुझे दिखाया …पूरा कुँज गुलाब पुष्पों से बना था …उसमें से जो हवा के झौंके निकलकर बाहर आरहे थे वो पूरे निकुँज में सुवास फैला रहे थे ।
मैंने उस कुँज को प्रणाम किया ।
हरिप्रिया सखी इस गुलाब कुँज को निहारती हुयी बोलीं ….सर्वोपरि धाम है श्रीवृन्दावन उस श्रीवृन्दावन -नित्य निकुँज में आदि अनादि परात्परतम श्रीयुगलवर , त्रिकाल जिन्हें बाधित नही कर सकता ऐसे कालातीत हमारे प्रियवर यहाँ विराजते हैं । मैंने हरिप्रिया जी की बात सुनकर फिर उस गुलाब कुँज की ओर देखा उसके भीतर एक सिंहासन भी जगमगा रहा था । इसी में विराजते होंगे युगल सरकार ……मैंने उस सिंहासन के दर्शन किए । “पर” हैं हमारे श्याम सुन्दर , नही नही “पर से परतम”हैं हमारे ये सरकार । “दिव्य वैभवन को दिव्य आगार” । हरिप्रिया जी बोलीं ।
निकुँज विलासी लाड़ली लाल परम ऐश्वर्य से भरे हैं …जितना ऐश्वर्य है ब्रह्माण्ड आदि में उन ऐश्वर्यों का मूल भी निकुँज ही है । हरिप्रिया जी की ये बात सुनकर मैं इस बार चकित था …माधुर्य सार , माधुर्य रस सिन्धु , यही तो कहा था आपने …..फिर अब ऐश्वर्य का भी मूल निकुँज को आप बता रही हैं , क्यों ? तब हरिप्रिया जी हंसीं …और बोलीं ….पहले ऐश्वर्य का वर्णन सुनो निकुँज का , और निकुँज के अधिपति युगल सरकार का । ये कहकर हरिप्रिया जी युगल के अमित अनन्त ऐश्वर्य का वर्णन करने लगीं ।
वेद शास्त्र की इस रसराज तक पहुँच नही है ….पुराणों का ज्ञान यहाँ कुंठित हो जाता है । युगलवर के चरण नख आभा से ही सारे अवतार प्रकट होते हैं । अनन्त वैकुण्ठ इन्हीं से प्रकट होते हैं और इन्हीं में विलीन हो जाते हैं ….उत्पत्ति करने वाले भले ब्रह्मा हों किन्तु उनमें ये जो उत्पन्न करने की शक्ति है ये यहीं से ब्रह्मा को मिलती है , ऐसे ही विष्णु को भी पालन करने की शक्ति और शिव को संहार करने की ….सब कुछ निकुँज के अधिनायक लाड़ली लाल से ही सबको , सब कुछ मिल रहा है । इसलिए इन युगलवर को “सर्वेश्वर” नाम से भी पुकारा जाता है …हरिप्रिया कहती हैं ….ये नाम इन्हीं का है ….ये नाम रूढ़ वाचक है …यानि सर्वेश्वर यही हैं , समस्त के ईश्वर यही हैं ….ये ईश्वर के भी ईश्वर हैं सखी ! ये कहकर हरिप्रिया जी सहज हो गयीं थीं ।
किन्तु ऐश्वर्य नही है निकुँज में ? ऐश्वर्य नही है युगल सरकार में ? ऐसा मैंने आप सबसे ही सुना था कि यहाँ तो केवल माधुर्य ही माधुर्य है । तब हरिप्रिया हास्य बिखेरती हुई बोलीं …जब ये परात्पर हैं ….तो सबके मूल यही हुये ना ! फिर सबके मूल में ये हैं तो ऐश्वर्य जो दिखाई देता है नाना लोकों में वो कहाँ से आरहा है ? जब ये युगल सरकार मूल हैं तो यहीं से तो जा रहा होगा ना ?
सुनो अब ….गुलाब कुँज के बाहर ही सखी जी बैठ गयीं तो मैं भी वहीं बैठ गया था ।
ऐश्वर्य अनन्त है निकुँज में ….तुम्हें दिखाई नही दे रहा ? ये मणियों से निर्मित अवनी ….यहाँ अनन्त वैभव चारों ओर पसरा है …देखो । कुँज में झरोखे आदि हैं वो चिंतामणि आदि से बने हैं …जो मणि देवों को भी दुर्लभ है …कौस्तुभ मणि के झालर हैं …..ये ऐश्वर्य परम ऐश्वर्य है ….हरिप्रिया बोलीं ….ऐश्वर्य और माधुर्य के सरोवर में ये युगल विहार करते हैं ….इसलिए ये परात्पर हैं …परतर हैं ….परतम हैं । ये कहकर हरिप्रिया जी ने दूसरी ओर देखा ….और उन्होंने कहा ….अब मैं तुमको माधुर्य सार का ही दर्शन कराने वाली हूँ ….जहाँ माधुर्यमूर्ति सखियाँ सेवा में नित लगी रहती हैं ….उनका सेवा ही मूल धर्म है ….ऐसी ये सखियाँ हैं ….इन्हें प्रणाम करो …हरिप्रिया जी के कहने से मैंने पूर्ण श्रद्धा से सखियों को प्रणाम किया । हाँ , अब ठीक है ….इतना कहकर ….हरिप्रिया जी मुझे सखियाँ का वर्णन करके बताने लगीं थीं ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 31
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सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः |
सर्वथा वर्तमानोSपि स योगी मयि वर्तते || ३१ ||
सर्व-भूत-स्थितम् – प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित; यः – जो; माम् – मुझको; भजति – भक्तिपूर्वक सेवा करता है; एकत्वम् – तादात्म्य में; आस्थितः – स्थित; सर्वथा – सभी प्रकार से; वर्तमानः – उपस्थित होकर; अपि – भी; सः – वह; योगी – योगी; मयि – मुझमें; वर्तते – रहता है |
भावार्थ
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जो योगी मुझे तथा परमात्मा को अभिन्न जानते हुए परमात्मा की भक्तिपूर्वक सेवा करता है, वह हर प्रकार से मुझमें सदैव स्थित रहता है |
तात्पर्य
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जो योगी परमात्मा का ध्यान करता है, वह अपने अन्तःकरण में चतुर्भुज विष्णु का दर्शन कृष्ण के पूर्णरूप में शंख, चक्र, गदा तथा कमलपुष्प धारण किये करता है | योगी को यह जानना चाहिए कि विष्णु कृष्ण से भिन्न नहीं है | परमात्मा रूप में कृष्ण जन-जन के हृदय में स्थित हैं | यही नहीं, असंख्य जीवों के हृदयों में स्थित असंख्य परमात्माओं में कोई अन्तर नहीं है | न ही कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति में निरन्तर व्यस्त व्यक्ति तथा परमात्मा के ध्यान में निरत एक पूर्णयोगी के बीच कोई अन्तर है | कृष्णभावनामृत में योगी सदैव कृष्ण में ही स्थित रहता है भले हि भौतिक जगत् में वह विभिन्न कार्यों में व्यस्त क्यों न हो | इसकी पुष्टि श्रील रूप गोस्वामी कृत भक्तिरसामृत सिन्धु में (१.२.१८७) हुई है – निखिलास्वप्यवस्थासु जीवन्मुक्तः स उच्यते | कृष्णभावनामृत में रत रहने वाला भगवद्भक्त स्वतः मुक्त हो जाता है | नारद पञ्चरात्र में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है –
दिक्कालाद्यनवच्छिन्ने कृष्णे चेतो विधाय च |
तन्मयो भवति क्षिप्रं जीवो ब्रह्मणि योजयेत् ||
“देश-काल से अतीत तथा सर्वव्यापी श्रीकृष्णके दिव्यरूप में ध्यान एकाग्र करने से मनुष्य कृष्ण के चिन्तन में तन्मय हो जाता है और तब उनके दिव्य सान्निध्य की सुखी अवस्था को प्राप्त होता है |”
योगाभ्यास में समाधि की सर्वोच्च अवस्था कृष्णभावनामृत है | केवल इस ज्ञान से कि कृष्ण प्रत्येक जन के हृदय में परमात्मा रूप में उपस्थित हैं योगी निर्दोष हो जाता है | वेदों में (गोपालतापनी उपनिषद् १.२१) भगवान् की इस अचिन्त्य शक्ति की पुष्टि इस प्रकार होती है – एकोऽपि सन्बहुधा योऽवभाति – “यद्यपि भगवान् एक है, किन्तु वह जितने सारे हृदय हैं उनमें उपस्थित रहता है |” इसी प्रकार स्मृति शास्त्र का कथन है – “विष्णु एक हैं फिर भी वे सर्वव्यापी हैं | एक रूप होते हुए भी वे अपनी अचिन्त्य शक्ति से सर्वत्र उपस्थित रहते हैं, जिस प्रकार सूर्य एक ही समय अनेक स्थानों में दिखता है |.
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (109)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का उदय
मोह यदि धर्मानुकूल है तो वह धर्म से प्रतिकूल निर्मोह से श्रेष्ठ है-
मोही दशरथलाल निर्मोही नन्दलाल ।
वे बन-बन ढूँढ़त फिर इन्ह ढूँढ़हि ब्रजबाल ।।
निर्मोह है तो, मोह है तो, परंतु भगवान से है। विषय का परिवर्तन, वृत्ति का परिवर्तन, भक्ति सिद्धांत की विलक्षण बात है। भक्त सिद्धांत में प्रेम को आरंभिक मानते हैं, वह शुरू-शुरू की चीज है।
प्रेम उसको कहते हैं कि ऐसा भाव का बन्धन आ जाय कि फिर छूटने की शंका न रहे। ऐसी स्थिति में जो पहुँचा हुआ भाव-बन्धन उसको प्रेम बोलते। इसमें तृप्ति लेना भी है और तृप्ति देना भी है। प्रेम से ऊपर होता है स्नेह। स्नेह में देना-लेना नहीं है; अपने हृदय के स्नेह से प्रेमास्पद को तर कर देना यह स्नेह है। माता स्नेह करती है पुत्र से, गाय स्नेह करती है बछड़े से; अपने हृदय में जितनी चिकनाई है, स्निधता है उसको अपने पुत्र को देती है, परंतु स्नेह अपने बच्चे से करना दूसरी चीज है; और भगवान से स्नेह हो जाना, यह दूसरी चीज है। संसार में अपने से छोटे हैं उनसे स्नेह होता है। और योगदर्शन की दृष्टि से स्नेह एक क्लिष्ट वृत्ति है, रागवृत्ति के अंतर्गत; और उसका निरोध करके समाधि में स्थित होना पड़ता है।
भक्ति की दृष्टि से भगवान को स्नेह करके उनको अपना बालक बना लेते हैं। वेदान्त की दृष्टि से स्नेह वृत्ति किस दिशा में है- विषयानुकूल है कि धर्मानुकूल है कि विरोधानुकूल है- इससे मतलब नहीं, मतलब इससे है कि आत्मा और ब्रह्म की एकता और ज्ञान से वह बाधित हो गया कि नहीं। भक्ति-सिद्धांत में स्नेह से ऊपर भी मान है, क्योंकि स्नेह झटसे गल जाता है। स्नेह घृत है, मान मधु है। जैसे घी खुद में मीठा नहीं होता, उसमें शक्कर मिलाओ तब मीठा होता है; और जैसे घी जरा-सा ताप लगने पर ही गल जाता है; और इससे विपरीत जैसे मधु खुद में मीठा होता है, परंतु ताप लगने से वह गलता नहीं है; उसी प्रकार मधुरूप मान घृतरूप स्नेह से अधिक मीठा और स्थायी है। इसी से शास्त्र में स्नेह से भी बड़ा मान को मानते हैं।+
भक्ति-सिद्धांत में, भगवान से पहले प्रेम, फिर स्नेह, फिर प्रणय या मान, फिर राग, फिर अनुराग, और उसके बाद भाव और अंत में महाभाव- ये भूमिकाएँ हैं। जैसे जीवनमुक्ति सात भूमिका मानते हैं से ही प्रेम-सिद्धांतों में भी भूमिका मानी जाती है। महाभाव में भी फिर मोहन और मादन ये दो विभाग हैं। मोहनरूप महाभाव में मोह को मानते हैं। विचित्र बात है। श्रीराधारानी श्रीकृष्ण की गोद में अपना शिर रखके लेटी हुई थीं; उनको ख्याल हुआ कि कृष्ण चले गये। अब तो मोहन! हा मोहन! हा मोहन! पुकारने लगीं। राधारानी की यह अवस्था देखके श्रीकृष्ण भी पुकारने लगे- हा राधे!राधे! और बेहोश होकर गिर पड़े। मोहन! मोहन! मैं यहीं हूँ। तो बोले- राधे-राधे-राधे। तब तक राधा बोहोश। यह मोह की दशा है-
अंकस्थितेऽपि दयिते क्रियते प्रलापं ।
गोद में बालक, शहर में ढिंढोरा। इसी को वेदान्ती लोग कहते हैं कि नित्य प्राप्त में अप्राप्त का भ्रम। राधारानी को प्राप्त हैं, और मोह हो गया कि नहीं हैं; और श्रीकृष्ण को राधारानी प्राप्त हैं और अप्राप्त हैं। यह बात आपको सुनायी कि संसार में मोह सबसे निकृष्ट है, इससे कुछ अच्छा है स्नेह, और उससे अच्छा है प्रेम; यह संसार की स्थिति है। और भगवद्भाव में संसार के प्रेम से अच्छा है भगवत-प्रेम, भगवत-प्रेम से अच्छा भगवत-स्नेह और भगवत-स्नेह से भी अच्छा भगवत-मोह।
आप कभी श्री सुबोधिनीजी का पाठ करें तो रासलीला को उन्होंने तामस-तामस फल बोला है। इसका नाम ही रखा है तामसफल। बोले कि जहाँ जितनी तन्मयता होती है, जहाँ जितनी गाढ़ता होती है, वहाँ जीव को जगाने के लिए उतना ही अधिक अपना सौन्दर्य, माधुर्य प्रकट करना पड़ता है। सनकादियों के उद्धार के लिए भगवान को कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। और वसुदेव के लिए यज्ञ करवाना पड़ता है, और नारद से उपदेश दिलवाना पड़ता है। और जब व्रज में तो नन्दबाबा को गर्गाचार्यजी बता जाते हैं कि ये भगवान हैं, लेकिन गोपियों को बताने के लिए श्रीकृष्ण को स्वयं गोलोक से उतरना पड़ता है, माखन चुराना पड़ता है, चीरहरण करना पड़ता है, उनके साथ मिलकर नाचना पड़ता है; ये जल्दी मानने वाली नहीं है कि भगवान हैं। उनके सामने अपनी सारी सुन्दरता, सारी मधुरता, सारा सौरभ, सारा सौकुमार्य, सारा सौरस्य, अपनी पूर्ण भगवक्ता, भगवान प्रकट करते हैं।++
गोपियों के प्रेम की यही विशेषता है। श्रीवल्लभाचार्य जी का मत है कि भगवान का पूर्ण प्रकाश है; और चैतन्य महाप्रभु के सम्प्रदाय का मत है कि गोपियों के हृदय में प्रेम का पूर्ण प्रकाश है। अब प्रसंग आपको सुनाते हैं- तत्रः प्रसीद। तो त्याग का अभिमान छोड़कर और अपने सुख का ख्याल छोड़कर गोपी कहती हैं कि अब आप हम पर प्रसन्न हो जाओ। प्रेम में जहाँ अपने सुख का ख्याल है उसको पूरा प्रेम नहीं मानते हैं। प्रेम में तो प्रेमास्पद के सुख में ही सुख है। तत्-पदार्थ की प्रधानता भक्ति में होती है। त्वम्-पदार्थ की प्रधानता से योग होता है, और असि-पदार्थ अर्थात् ऐक्य की प्रधानता से वेदान्त होता है।
वेदान्त में जीव और जगत् का ब्रह्म के साथ सामानाधिकरण है, जीव की उपाधि का बाध करके चैतन्यांश में जीव और ब्रह्म का मुख्य सामानाधिकरण्य है। जगत् के नामरूप का बाध करके अस्ति, भाति, प्रिय अंश में जगत् का ब्रह्म के साथ बाध सामानाधिकरण्य है। और नारायण! जब संपूर्ण जगत् ब्रह्मरूप है, तब यह गोपी-प्रेम का उदय होता है। इसमें वृक्ष भी ब्रह्म है, लता भी ब्रह्म। इस ऐक्य- भूमिका में जहाँ सब ब्रह्म ही है, वहाँ रस ही रस है, ज्ञान ही ज्ञान है, आनन्द ही आनन्द है। और वहाँ गोपी बोल रही है- तन्नः प्रसीद। अब न तो यहाँ प्रतिबंधक स्वसुख की वासना है, न तो त्याग का अभिमान है। तन्नः प्रसीद इसलिए अब हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाओ।
प्रसीद का अर्थ है प्रसन्न हो जाओ, अर्थात् प्रसाद की अभिव्यक्ति। श्रीकृष्ण बोले- गोपी, कैसे समझोगी कि मैं प्रसन्न हूँ? तो एकने कहा- हमारे सिर पर बैठ जाओ। लो बैठ गया; दूसरी ने कहा- हमारे सिर पर हाथ रख दो। लो रख दिया; तीसरी ने कहा- जरा मुसकराकर देखो। लो मुसकरा दिया; एक ने कहा – हमारी ओर देखो! लो देख लिया। लेकिन इसका नाम प्रसाद नहीं है, ऐसा तो मूर्ख लोग समझते हैं। मान की प्रक्रिया बहुत विलक्षण है- एक बार श्रीराधारानी श्रीकृष्ण से रूठ गयीं। कृष्ण मनाने आये; बोले- प्रियाजी, उठो, रूठो मत। बोली- किसने कहा तुमसे कि मैं रूठ गयी हूँ? राम-राम-राम, किसी दूसरे से सुनकर आये हो क्या? मुझसे भी तो कुछ पूछो।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹


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Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877