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August 30, 2025 10:31 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 140(2) !!, महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (110),!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!&श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 140(2) !!, महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (110),!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!&श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

Niru Ashra: 🌸🌷🌸🌷🌸

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 140 !!

हे रुक्मणी ! श्रीराधा यानि “प्रेम”
भाग 2

🍁🌲🍁🌲🍁🌲🍁

राधा मिली थी ?

ये रुक्मणी नें प्रश्न किया था ।

हाँ ……….मिली थी । कृष्ण नें रुक्मणी से नजर चुराते हुए कहा ।

क्या है राधा ? कौन है ये राधा ? मैं आपसे आज पूछ रही हूँ ……बताइये राधा कौन है ? रुक्मणी आक्रामक हो उठीं ।

बिना किसी को सूचना दिए चले गए मिलनें के लिये ……अरे ! हमें भी कहते ………हम भी चलतीं ………पर नही …..हाँ अकेले में मिलना होगा ना आपको ……..राधा से !

रुक्मणी आज से पहले इतनी आक्रामक कहाँ हुयी थीं ………….पर कृष्ण राधा से मिलकर आये हैं ……….वैसे रुक्मणी की आक्रामकता से कुछ विशेष फ़र्क पड़नें वाला है नही कृष्ण को ।

आपनें कोई उत्तर नही दिया ? रुक्मणी फिर पूछने लगीं ।

मुस्कुराये कृष्ण…..सहज रहो रुक्मणी !……ऐसी आक्रामकता क्यों ?

गलती का भान हुआ रुक्मणी को ……….इसलिये कुछ देर के लिये शान्त हो गयीं ।

कौन है ये राधा ? बताइये ना ? फिर वही प्रश्न ।

गम्भीर मुद्रा में रुक्मणी के पास आये कृष्ण………..प्रेम से रुक्मणी को बैठाया…………सच में जानना चाहती हो कौन है राधा ? तो सुनो ……..राधा, राधा है ।

रुक्मणी ! प्रेम अगर आकार ले आये तो जैसा लगेगा ………वैसी है राधा………..कृष्ण को पूर्ण बनाया है रुक्मणी ! राधा नें ।

कृष्ण तो मात्र 15 कला का ही था …..पर सोलहवीं कला तो स्वयं श्रीराधा थीं ……….उन्हीं के कारण तो ये कृष्ण पूर्ण सोलह कला का हुआ है …………कृष्ण बड़े प्रेम से अपनी महारानी रुक्मणी को समझा रहे थे – हे रुक्मणी ! प्रेम की उच्चतम शिखर हैं श्री राधा ।

क्रमशः….
शेष चरित्र कल –

🙇‍♀️ राधे राधे🙇‍♀️
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (110)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

गोपियों में दास्य का उदय

कृष्ण बोले- हम तब समझेंगे कि तुम रूठी नहीं हो जब तुम हमारे साथ बैठ जाओ। लो बैठ गयी; अच्छा मेरे साथ खा लो। बोली- खिला दो। अब जो-जो कृष्ण कहें वही-वही राधारानी करती जायँ, और कृष्ण समझें कि यह तो अभी रूठी हैं। बोले- बाबा, तुम क्या कोई आज्ञापालन के लिए दासी हो? कहा- प्रियतम, मैं तुम्हारी दासी ही हूँ, जो आज्ञा करें सो करूँ। मैं तुसमे रूठी नहीं, भला अपने मालिक से कभी रूठूँगी? अब महाराज वह कृष्ण सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, सर्वशक्तिमान्, उनको कोई युक्ति ही न सूझे कि इनको कैसे मनावें। इसी प्रकार गोपियों ने भी कहा कि हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाओ। तो प्रसाद का अर्थ है हृदय में किसी प्रकार की मैल न रहना। प्रसन्नम् सरः – कहते हैं ना कि आज सरोवर प्रसन्न हैं, तो प्रसन्न है माने उसके जल में कोई गंदलापन या कोई चञ्चलता नहीं है। गँदलापन और चञ्चलता दोनों का न होना, यह सरोवर का प्रसाद है। और चित्त में चञ्चलता, गँदलापन और कपट की छाया न हो, तब समझना कि प्रसन्न है। और जहाँ ढोंग है, कपट है, वहाँ प्रसन्नता कहाँ?

एक ठाकुर साहब थे मध्यप्रदेश के; उन्होंने हमको एक बहुत बढ़िया चिट्ठी लिखी। यह बात कोई बीस वर्ष पहले की है। वे वहाँ की विधानसभा के मेम्बर भी थे और राजा ही माने जाते थे। गवर्नर उनको नमस्कार करता था; उनके पास ताम्रपत्र था, तो उन्होंने बढ़िया चिट्ठी लिखी। अब हम तो समझो लेखक भी है ना। हम तो प्रेम-साहित्य पर भी लिखते हैं, दर्शन-साहित्य पर भी लिखते हैं। अब उनकी प्रेमभरी चिट्ठी देखकर हमको आश्चर्य हुआ कि ये ठाकुर साहब ऐसा बढ़िया लिखते हैं। लिखता था- दिल तो ले गये अब जान भी ले जाओ। क्योंकि बेदिल अब रहा नहीं जाता।। मैंने किसी जानकार को दिखाया कि देखो, इतना बढ़िया प्रेम-पत्र लिखा है इसने। उन्होंने कहा-स्वामीजी, आप भोले हो, प्रेम-पत्र लिखने के लिए एक किताब छपी हुई है, और वह बाजार में मिलती है, इसने तो यह उसी में से लिखकर भेजा है। अब मैंने वह किताब मँगायी तो सचमुच वह चिट्ठी उसमें लिखी हुई थी। नारायण, जो लोग सिनेमा देख-देखकर आते हैं और उसमें से प्रेम के संवाद याद कर लेते हैं और फिर वैसा ही लिखते हैं।+

तो प्रेम जो है, प्रसीद है। कपट न हो, ‘क’ माने सुख और ‘पट’ माने कपड़ा परदा। हृदय मं जो सुख के फुहारे छूटते हैं उनके ऊपर कोई आवरण न हो, परदा न हो, कोई ढक्कन न हो; हृदय का निरावरण हो जाना प्रसाद है। तो गोपियाँ बोलीं- ‘प्रसीद’ प्रसन्न हो जाओ। माने हमारे सामने निरावरण हो जाओ; यह नहीं कि मुस्कराओ या सिर पर हाथ रखो। भगवान बोले- देखो, हम तो तीनों काल में और तीनों लोक पर ऐसे ही प्रसन्न, खुश रहते हैं; हम अपने-आप में खुश हैं, तुम हमको खुशी का उपदेश करने चली हो?

बोलीं- ना कृष्ण, हमको तीन लोक में मत गिनो; हम गोपी हैं; नः प्रसीद- हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाओ, हम तो अपने ऊपर प्रसन्नता चाहते हैं। बोले- नारायण, तुम्हारे ऊपर कैसी प्रसन्नता चाहिए? बोलीं- यह जो दुःख है- वृजिनार्दन- यह संबोधन है- वृजिन माने पाप, वृजिन माने दुःख; अपने मन में कोई ऐसा पर्दा है, अपने मन में ही कोई ऐसा संकोच है, जिससे भगवद्भाव का आदरभाव नहीं होत। दूसरे पर दोष का आरोप करना, यह हमारे हृदय का दोष है; अपने दोष को समझ करके उसको मिटाना, यह प्रीति का लक्षण है। वृजिनार्दन- जब तक श्रीकृष्ण हमारे ऊपर प्रसन्न नहीं होते, तब तक हमारा कोई ऐसा पाप है, अपराध है कि उनके प्रसन्न होने में बाधा डाल रहा है।

कृष्ण ने कहा कि हाँ गोपियों, है तो सही! बोली- है तो मिटा दो, ‘वृजिनार्दन’ उसको मिटाना भी तुम्हारा ही काम है। बोले- हम क्यों मिटावें, हमको क्या जरूरत है? देखो, गोपियों का इसमें कोई पाप नहीं है, गोपियों के जीवन में पाप का फल दुःख नहीं है। गोपियों के जीवन में जो दुःख है, वह श्रीकृष्ण की कृपा का फल है, आप इस बात को बिल्कुल निश्चित रूप से समझना। क्योंकि जब कृष्ण के वियोग का ज्यादा दुःख होता है, तब कृष्ण के मिलने से ज्यादा सुख होता है।++

जैसे आदमी जितना प्यासा हो, जल मिलने पर उतना ही मजा आवेगा, जितना धूप में चल चुका हो हवा में पहुँचने पर उतना ही मजा आवेगा- इसी प्रकार श्रीकृष्ण के विरह में जिसको जितना दुःख हो चुका होता है, उसको बाद में उतना ही सुख होता है। तो गोपियों के जीवन में वृजिनार्दन का अर्थ यह है कि यह तो तुम हमलोगों से रूठ गये हो और लौटने के लिए कह रहे हो- बुलाकर, स्वीकार करके, अपना करके, प्रेम-निमंत्रण- दे करके और कहते हो कि चली जाओ- तो यह जो हमारा दुःख है इसको तुम मिटा सकते हो। हम क्यों मिटावें? तो गोपियाँ अपनी विशेषता बताती हैं-

तेऽङ्घ्रिमूलं प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशाः ।

विशेषता यह है कि एक तो हम तुम्हारे चरणों के तलवों में पहुँच गयी हैं। और आज तक सृष्टि में ऐसा कोई कृष्ण नहीं हुआ जो अपने चरणों में आये हुए को लौटा दे। भगवान के पास पहुँचकर कोई लौटता नहीं है। ऐसी कोई पोल-पट्टी है भगवान के घर में कि दूर से बड़ा सुवाहना लगता है कि ऐसा है, ऐसा है, ऐसा है, ऐसा आनन्द है, फलाना है, ढिकाना है, लेकिन वहाँ पहुँचते हैं तो सब ठन-ठन पाल ही है, भला! तो भगवान कहते हैं कि यह भगत लौट जायेगा हमारे घर से तो कहने लगेगा कि भगवान तो निर्गुण है, निर्विशेष हैं, निराकार हैं, यह जाकर ऐसी अफवाह फैलावेंगे कि दुनिया में जल्दी फिर हमारी तरफ कोई आना नहीं चाहेगा। क्योंकि हमारे घर में पहुँचने के बाद सब वेदान्ती हो जाते हैं, इसलिए भगवान ने रोक लगा दी कि लौटकर जाने न पावें, लौटकर जाये ना- ‘न स पुनरावर्तते, न रस पुनरावर्तते’ श्रुति है।

अनावृत्तिः शब्दात्- यह ब्रह्मसूत्र है कि वहाँ से लौटना होता नहीं। वहाँ से क्यों नहीं लौटने देते भगवान? बोले- यहाँ से तो सुनकर गये कि सगुण है, साकार है, ऐसा आनन्द है, ऐसा प्रेम है, ऐसा रूप है, ऐसा माधुर्य है, और वहाँ गये तो नारायण कहो। इसलिए भगवान ने लौटने पर रोक लगा दी। तो ‘तेऽङ्घ्रिमूलं प्राप्ताः’ एक तो तुम्हारे चरणों में आ चुकी हैं, और दूसरी बात और ‘वसतीः विसृज्य’ से वासना को पूर्ण करने की जो बस्ती है वह हमने छोड़ दी है; और तीसरे ‘त्वदुपासनाशाः’ हम तुम्हारी उपासना का फल नहीं चाहती हैं, एकमात्र तुम्हारी उपासना की ही आशा रखती हैं। देखो इसमें अन्तर। उपासना का फल चाहना, और केवल उपासना की आशा रखना; बोले- अब-

त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीव्रकामतप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम् ।

‘त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षण’ इसको कई तरह से लगाते हैं- त्वत् को अलग कर दिया तो रह गया- सुंदरस्मितनिरीक्षण त्वत् त्वतः तीव्रकामतप्तात्मनां इसका उल्टा अर्थ भी निकलता है। ‘पुरुषभूषण देहि दास्यम्’ हम तो केवल तुम्हारी सेवा चाहती हैं, तुमसे हम सेवा करवाना नहीं चाहती हैं; तुम्हारी सेवा करना चाहती हैं; हम तुमसे सुख लेना नहीं चाहतीं हैं, तुमको सुखी देखकर सुखी होना चाहती हैं; केवल तुम्हारे सुख में सुखी होना चाहती हैं। यह प्रेम का लक्षण है।

क्रमशः …….

प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख”- 25 )

गतांक से आगे –

॥ दोहा ॥

सेवें सहज सदा सखी, लगी सबै चहुँ ओरि ।
गुन निधि गोरी साँवरी, नित्य किसोरी जोरि ॥

॥ पद ॥

नित्य किसोर किसोरी जोरी। परम उदारि साँवरी गोरी ॥
सेवें सहज सदा रँग बोरी। सहचरि सकल लगी चहुँ ओरी ॥
समैं समैं सेवा जो जोई। करत रहति निति प्रति सो सोई ॥
मिथुन कुँवर मन जो रुचि होई। सो पहिलहिं पुरवति रति भोई ॥
हित चित बातनिमें बहु बितपनि । बिबिधि भाँति रसदाउर अनुगनि ॥
तुरत सुरत सहजहिं सुख सरसनि। सनमुख सदा सुरुख बनबरषनि ॥
प्रथमहिं श्रीरंगदेवि मनाऊँ। तिनकी कृपा यहै जस गाऊँ ॥
कल कंठयादिक आठ सहेली। आठ आठ इनिकें अलबेली ॥

*बोलो , पराधीनता किसी को प्रिय लगती है ? स्वतन्त्र होना सबको अच्छा लगता है …किन्तु प्रेम देश में पराधीनता ही लक्ष्य है ….अपने प्रीतम की आधीनता ….उनकी सेवा में लगे रहना , उनको रिझाना , उन्होंने सुख देना ….उनके लिए ही जीवन धारण करना ….इसका आनन्द तो प्रेमी लोग ही जानते हैं ….बाकी लोग इस सुख से पूरी तरह वंचित हैं । हरिप्रिया जी मुझे बता रहीं थीं कि तभी ….सामने से आठ सखियाँ जो अत्यन्त सुन्दरी थीं ….उनका गौर वर्ण दर्पण की तरह था ….इतनी गोरी और सुन्दर ।

ये युगल की प्रमुख अष्ट सखियाँ हैं ? मैंने उनको देखा वो सब जा रहीं थीं ….उनके हाथों में फूल डलिया थी …..चहकती , इतराती चल रहीं थीं ….कुछ अल्हड़ पना भी था , उनकी सुन्दरता में ये अल्हड़ता चार चाँद लगा रहा था ।

ये प्रमुख अष्ट सखियाँ हैं ना ? मैंने उन्हें प्रणाम करते हुये कहा ।

हरिप्रिया जी बोलीं – नहीं, ये प्रमुख अष्ट सखियाँ नहीं हैं….ये श्रीरंगदेवि जी की अष्ट सखियाँ हैं …हरिप्रिया जी मुझे ये बताती हुई ….मुस्कुरा रहीं थीं ।

मैं कुछ नही बोला …बस मुग्ध होकर उन अष्ट सखियों को …जो मुझे बताया गया था की अष्ट सखियों में प्रमुख श्रीरंगदेवि जी की ये अष्ट सखियाँ हैं ।

मैं कुछ नही बोला …बस उन प्रेम पगी सखियों को देखता रहा ।

प्रमुख अष्ट सखियाँ हैं ….उन अष्ट सखियों की एक एक की आठ आठ सखियाँ हैं ….ये भी मुझे हरिप्रिया जी ने बताया । फिर मुझे उत्सुक जान वो बताने लगीं …युगल सरकार के लिए ही हैं ये …..उन्हीं की सेवा में अपने को समर्पित कर दिया है ….सुख देना , यही इनका धर्म है ….सुख लेना नही , सखियाँ तो कहती हैं …हमारा भी सुख इन्हीं को मिल जाये । अच्छा , एक बात है …सेवा में इतनी कुशल हैं ये सखियाँ कि …अपनी कुशलता से ये युगल के मन की बात भी जान लेती हैं ….और वही करती हैं …हर समय तटस्थ रहती हैं …..कभी आलस इन्हें छू पाता नही है …..ये युगल को प्रसन्न करने के लिए ही सजी धजी रहती हैं ….रति रंग में डुबो कर युगल को ये परम सुख का अनुभव कराती हैं ….हरिप्रिया जी मुझे आगे बताती हैं ….यह सखियों का परिकर युगल के अन्तकरण में जागृत प्रेम के अंकुर को भी देख लेता है …फिर उसी अंकुर को लता बनाकर लहलहाये इस प्रयास में जुट जाता है । क्या समझ रही हो ? हरिप्रिया जी ने मुझ से अचानक पूछ लिया । ब्रह्म को उनकी आल्हादिनी से मिलन करवाने वाली हैं ये सखियाँ ….ये सामान्य नही हैं ….ये अभी जैसी खिली खिली लग रही हैं ना ….ऐसे ही ये रहती हैं ।

ये कहने के बाद ….सामने मुझे एक सखी दिखाई दीं …..सुन्दर थीं , बहुत सुन्दर थीं …ये सब बातें अब व्यर्थ लगती हैं ….क्यों की सुन्दरता यहाँ चारों ओर बिखरी हुयी है ।

ये सखी ? मैंने पूछा ही था कि …..अरे ! यही तो हैं ….अष्ट सखियों की प्रमुख सखी जी …श्रीरंगदेवि । हरिप्रिया जी ने वहीं साष्टांग प्रणाम किया ….तो मैंने भी उन्हें प्रणाम किया ….तभी – इनके पीछे अष्ट सखियाँ वही आरहीं थीं ….इतना ही नही ….इन अष्ट सखियों की …प्रत्येक सखी की आठ आठ सखियाँ और थीं ……वो सब ज्योति स्वरूप , अत्यन्त प्रकाश मान लग रहीं थीं ….क्या कहें ? हरिप्रिया जी ने प्रमुदित होते हुए कहा ….श्रीरंगदेवि जी की ये अष्ट सखियाँ हैं …जो उनके साथ , थोड़ा पीछे चल रहीं हैं ……ये कहते हुए हरिप्रिया जी ने मुझे श्रीरंगदेवि जी की अष्ट सखियों के नाम बताये …..एक एक का नाम बताया ।

कलकंठी जी , शशि कला जी , कमला जी , कंदर्पा जी , हित सुन्दरी जी , काम लता जी , प्रेम मंजरी जी , और प्रेमदा जी । हरिप्रिया जी ने कहा …ये अष्ट सखियाँ जिनका नाम मैंने बताया ये श्रीरंगदेवि जी की आठ सखियाँ हैं । तभी बहुत सारी सखियाँ ….पीछे से आ रहीं थीं …ये वही सखियाँ थीं जो गयीं थीं ….शायद अपनी सखी जू श्रीरंगदेवि जी को लेने ।

वो देख रहे हो …..कलकंठी जी …..ये श्रीरंगदेवि जी की आठ सखियों में प्रथम हैं …इनके पीछे जो आरही हैं ….वो कलकंठी जी की अष्ट सखियाँ हैं ……..ये कहकर हरिप्रिया मुग्ध भाव से उन सबको देखती रहीं । इनके नाम क्या हैं ? मैंने पूछा ….श्रीरंगदेवि जी की अष्ट सखियों के तो नाम आपने बता दिए अब कृपा करके इनकी सखियों की जो सखियाँ हैं उनका भी नाम बता दें ।

मेरी ये प्रार्थना थी ।

हाँ , सखियों का नाम लेने से युगलवर बड़े प्रसन्न होते हैं …..सखियों के नाम का प्रातः उच्चारण करने से मन युगल चरणों में सहज लग जाता है ….इतना कहकर हरिप्रिया जी श्रीरंग देवि जी की सखियों की सखियों के नाम बताने लगीं ….और हाँ , इन नामों को जब मैं सुन रहा था …तो मेरा हृदय प्रेम रस सिन्धु में अवगाहन करने लगा था ।

शेष अब कल –
] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 32
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आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योSर्जुन |
सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मतः || ३२ ||

आत्म – अपनी; औपम्येन – तुलना से; सर्वत्र – सभी जगह; समम् – समान रूप से; पश्यति – देखता है; यः – जो; अर्जुन – हे अर्जुन; सुखम् – सुख; वा – अथवा; यदि – यदि; वा – अथवा; दुःखम् – दुख; सः – वह; योगी – योगी; परमः – परम पूर्ण; मतः – माना जाता है |

भावार्थ
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हे अर्जुन! वह पूर्णयोगी है जो अपनी तुलना से समस्त प्राणियों की उनके सुखों तथा दुखों में वास्तविक समानता का दर्शन करता है |

तात्पर्य
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कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पूर्ण योगी होता है | वह अपने व्यक्तिगत अनुभव से प्रत्येक प्राणी के सुख तथा दुःख से अवगत होता है | जीव के दुख का कारण ईश्र्वर से अपने सम्बन्ध का विस्मरण होना है | सुख का करण कृष्ण को मनुष्यों के समस्त कार्यों का परम भोक्ता, समस्त भूमि तथा लोकों का स्वामी एवं समस्त जीवों का परम हितैषी मित्र समझना है | पूर्ण योगी यह जानता है कि भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित बद्धजीव कृष्ण से अपने सम्बन्ध को भूल जाने के करण तीन प्रकार के तापों(दुखों) को भोगता है; और चूँकि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सुखी होता है इसीलिए वह कृष्णज्ञान को सर्वत्र वितरित कर देना चाहता है | चूँकि पूर्णयोगी कृष्णभावनाभावित बनने के महत्त्व को घोषित करता चलता है; अतः वह विश्र्व का सर्वश्रेष्ठ उपकारी एवं भगवान् का प्रियतम सेवक है |

न च तस्मान् मनुष्येषु कश्र्चिन्मे प्रियकृत्तमः (भगवद्गीता १८.६९) |

दूसरे शब्दों में, भगवद्भक्त सदैव जीवों के कल्याण को देखता है और इस तरह वह प्रत्येक प्राणी का सखा होता है | वह सर्वश्रेष्ठ योगी है क्योंकि वह स्वान्तःसुखाय सिद्धि नहीं चाहता, अपितु अन्यों के लिए भी चाहता है | वह अपने मित्र जीवों से द्वेष नहीं करता | यही है वह अन्तर जो एक भगवद्भक्त तथा आत्मोन्नति में ही रूचि वाले योगी में होता है | जो योगी पूर्णरूप से ध्यान धरने के लिए एकान्त स्थान में चला जाता है, वह उतना पूर्ण नहीं होता जितना कि वह भक्त जो प्रत्येक व्यक्ति को कृष्णभावनाभावित बनाने का प्रयास करता रहता है |

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