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August 30, 2025 10:29 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 140 (3) !!,!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!& श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 140 (3) !!,!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!& श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

] Niru Ashra: 🌸🌷🌸🌷🌸

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 140 !!

हे रुक्मणी ! श्रीराधा यानि “प्रेम”
भाग 3

🍁🌲🍁🌲🍁🌲🍁

कृष्ण तो मात्र 15 कला का ही था …..पर सोलहवीं कला तो स्वयं श्रीराधा थीं ……….उन्हीं के कारण तो ये कृष्ण पूर्ण सोलह कला का हुआ है …………कृष्ण बड़े प्रेम से अपनी महारानी रुक्मणी को समझा रहे थे – हे रुक्मणी ! प्रेम की उच्चतम शिखर हैं श्री राधा ।

राधा उस तत्व का नाम है …….जहाँ तृष्णा ही तृप्ति बन उठती है ……

और तृप्ति ही तृष्णा …………विरह ही संयोग बन जाता है ….और जहाँ संयोग ही विरह बन उठता है………हँसना, जहाँ रोना कहलाता है ….और रोना जहाँ हँसना कहलाता है ….उस प्रेम नगरी की साम्राज्ञी हैं श्रीराधारानी……..भावावेश में आगये थे कृष्ण चन्द्र ।

हे रुक्मणी ! उस प्रेम नगर में……….सब कुछ उल्टा पुल्टा है प्रेयसि ही प्रियतम हैं ….और प्रियतम, प्रेयसि हैं …………ऐसे प्रेमवैचित्र्य नगरी वृन्दावन की ये महारानी हैं ………….पता है रुक्मणी ! सौ वर्षों के बाद में हम लोग मिले हैं………..इतनें वर्षों तक मेरी प्रतीक्षा में रहीं ……….पर रुक्मणी ! हम सौ वर्षों के बाद मिल रहे थे ……..और मध्य में मैने कभी मिलनें की कोशिश भी नही की ……..पर राधा को कोई शिकायत नही ……..कोई शिकायत नही है………..मैने सफाई देनी भी चाही …………..पर राधा नें उसे सुनी ही नही ।

कहती है …….प्रेम में क्या सफाई दे रहे हो लाल !

इतना कहते हुए हिलकियों से रो पड़े थे कृष्ण …………….

रुक्मणी कुछ नही बोलीं …पर कुछ देर में रुक्मणी नें फिर पूछा –

हमसे सुन्दर है राधा ? आपकी हम सब रानियाँ बहुत सुन्दर हैं …….पर क्या राधा हमसे ज्यादा सुन्दर है ?

सामान्य नारियों की तरह किया गया प्रश्न था ये ………….

मन्द मुस्कुराये द्वारिकाधीश ।

आप लोगों को मिलनें जाना चाहिये …………राधा कैसी है ? राधा क्या है ? सब उत्तर मिल जायेगा ।

इतना कहकर शान्त हो गए द्वारिकाधीश………गवाक्ष से बाहर देख रहे हैं ……..कभी मुस्कुराते हैं ……..तो कभी नयनों में जल भर आते हैं …..कहनें की बात तो है ही नही कि …….प्रेम देवता नें आज फिर इनके हृदय में तूफ़ान मचा दिया है……..राधा नामक देवी प्रकट हो गयी हैं …….और उनके आराधक बन बैठे हैं – श्री कृष्ण चन्द्र जू ।

शेष चरित्र कल –

🙇‍♀️ राधे राधे🙇‍♀️
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख” – 26 )

गतांक से आगे –

  • कलकंठी जू की *

अलबेलि’ नवला विस्वआभा, उत्तमा जु बिलासिनी ।
सरसिका मधुरा सुभद्रा, और पद्मसुवासिनी ॥

  • ससिकला जू की *

स्यामा सारदा कृपाला देवदेवी सुंदरी।
पद्मआस्या इंदिरा पुनि सुनहु रामासहचरी ॥

  • कमला जू की *

वामा अरु कृष्णा सुपद्मा श्रुतिस्वरूपा भगवती।
माधवी असिता गुनाकरि, सदासेवति रसरती ॥

  • कंदर्पा जू की *

बल्लभा गौरांगि केसी पवित्रा अरु कुंकुमा।
हितूसहचरि हितविचित्रा अग्रवर्तनि अनुपमा ॥

  • हितसुंदरी जू की *

महामोहनि मानवति मनिमंजरी मधुरप्रभा ।
बिमलनी वारिजमुखी कलवयनिका सुचिसौरभा ॥

  • कामलता जू की *

सुखदसहचरि चारुमति अलबेलि व्याहबिनोदिनी ।
भाना सुभगासहचरि पुनि कमलबदनी कमलिनी ॥

  • प्रेममंजरी जू की *

बृंदा ऽरु रसिका अनंदा परमसहचरि हितअली।
नितनवीना मनोमंजरि ब्रजेसुंदरि अतिभली ॥

  • प्रेमदा जू की *

चंद्रहासा चारुभासा दिब्यवासा मोददा ।
मृदुलअंगा ऐलिबेली अनुपमा अनुरागदा ॥

सर्व प्रथम मैं अष्ट सखियों की प्रमुख सखी श्रीरंगदेवि जू को प्रणाम करती हूँ …और उनकी सखियों का , उनकी सखियों की सखियों का यश गान करती हूँ । सुनो ! तुम्हें तो पता ही है ना , कि भगवान भी अपने भक्त के यश गान से अत्यधिक प्रसन्न होते हैं ….अपने यश की अपेक्षा अपने जनों का यश सुनना भगवान को प्रिय है । हरिप्रिया जी बड़ी सहज हैं ….वो आनन्द सिंधु में अवगाहन कर रही हैं ….वो अब सखियों का यश गान सुना रही हैं ।

ये तो फिर सखियाँ हैं ….युगल से अभिन्न , इनका अपना कोई अस्तित्व ही नही हैं ….इन्होंने अपना अलग से अस्तित्त्व रखा ही नही हैं ….प्रेम रस में पगी ये सखियाँ ….युगल की चकोरी हैं …युगल चन्द्र की चकोरी । इन सखियों के प्राण प्यारे हैं युगल , तो युगल के लिए भी ये सखियाँ प्राण प्यारी हैं । हरिप्रिया सखी जी अत्यन्त आनन्द विभोर हैं । श्रीरंगदेवि जी …इनकी प्रमुख आठ सखियाँ हैं ….इनका नाम सुनो ! और हो सके तो प्रातः इनका नाम लो …स्वयं के नाम से युगल इतने प्रसन्न नही होते जितना इनकी सखियों का नाम लेने से होते हैं । हरिप्रिया जी कहती हैं …”प्रात काल ही ऊठ के , धारी सखी को भाव” । इन सखी के भाव को धारण करो ….भाव धारण करना यानि स्वसुख की इच्छा का पूर्ण त्याग । इनका नाम लो …नाम लेने से इनके जो गुण हैं वो तुम्हारे भीतर आयेंगे ….युगलवर प्रसन्न होंगे तो तुम्हें सहचरी भाव से भावित कर देंगे । ये कहते हुए हरिप्रिया जी ने प्रथम श्रीरंगदेवि जी का स्मरण किया …फिर उनकी अष्ट सखियों का , एक एक सखी की आठ आठ सखियाँ हैं ।

( हे रसिकों ! इस उपासना में एक प्रमुख सखी जू को चुनकर , उनके आदेश में रहकर भावना से अपनी सेवा दीजिए , यही है निकुँज प्रवेश का उपाय ।)


हरिप्रिया जी अब प्रसन्न चित्त हैं ….वो श्रीरंगदेवि जी की सखियों की सखियों के नाम का स्मरण कर रही हैं …और हमें सुना रहीं हैं ।

श्रीरंगदेवि जी की अष्ट सखियों में प्रथम सखी हैं …..कलकंठी जी ।

अब इन “कलकंठी” जी की अष्ट सखियाँ हैं ……इनका नाम सुनो ।

नवला जी , विश्व आभा जी , उत्तमा जी , विलासिनी जी , सरसिका जी , मधुरा जी , सुभद्रा जी , तथा पद्म सुवासिनी जी । हरिप्रिया बोलीं …ये सब अलबेलि सखियाँ हैं …बड़ी सुन्दरी हैं ..और सेवा में अत्यंत निपुण हैं ।

अब श्रीरंगदेवि जी की दूसरी सखी ….जिनका नाम है ….”शशिकला”जी ….इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं ….उनका भी नाम सुनो और अपने हृदय को पवित्र बनाओ …क्यों की प्रेमीजनों का स्मरण करने से ही हृदय पवित्र होता है ।

श्यामा जी , शारदा जी , कृपाला जी , देवदेवी जी , सुन्दरी जी ,पद्मास्या जी , इन्दिरा जी , और रामा जी । हरिप्रिया कहती हैं ये सब सेवा में कुशल-दक्ष हैं ।

अब श्रीरंगदेवि जी की जो तीसरी सखी हैं ….”कमला”जी ….इनकी अष्ट सखियों के नाम सुनो ।

वामा जी , कृष्णा जी , पद्मा जी , श्रुति रूपा जी , भागवती जी , माधवी जी , असिता जी और गुणाकारी जी । इन सखियों में युगल के प्रति अनन्य निष्ठा है ….ये अपनी गुरु सखी से युगल के विषय में ही पूछती रहती हैं , हरिप्रिया जी ने कहा ।

“कंदर्पा” जी । ये श्रीरंगदेवि जी की चौथी सखी हैं ….इनकी अष्ट सखियों के नाम श्रवण करो ।

मुझे हरिप्रिया जी नाम सुना रही हैं …..कंदर्पा जी की अष्ट सखियों के नाम ।

बल्लभा जी , गौरांगी जी , केशी जी , पवित्रा जी , कुमकुमा जी , हितु सहचरी जी , हित विचित्रा जी , और अग्रवर्तिन जी । ये सब सखियाँ अनुपमेय हैं …इनकी कोई उपमा नही है ।

अब हरिप्रिया जी हमें श्रीरंगदेवि जी की जो पाँचवीं सखी हैं ….”हित सुन्दरी”जी …इनकी अष्ट सखियों के नाम बता रही हैं ।

महामोहिनी जी , मानवति जी , मणि मंजरी जी , मधुर प्रभा जी , विमली जी , वारिज मुखी जी , कलवैनी जी , और सुचि सौरभा जी ,

हरिप्रिया कहती हैं ….ये सब चंचल हैं …किन्तु इनकी चंचलता युगल को प्रिय है इसलिए ये चंचलता दिखाती हैं । हरिप्रिया हंसीं ….बोलीं ….एक बार प्रिया जी के सामने इन सखियों ने अपनी चंचल वृत्ति का प्रदर्शन किया तो इनकी गुरु श्रीरंगदेवि जी ने इन्हें आँखें दिखाईं ….किन्तु प्रिया जी इनकी चंचलता पर बहुत हंसीं तो श्याम सुन्दर भी हंसें ….दोनों प्रसन्न । तो श्रीरंगदेवि जी ने इनको छूट दे रखी है कि …युगल को हास्य से सराबोर रखो ।

अब छटी सखी हैं …..श्रीरंगदेवि जी की, ये छटी सखी ….”कामलता” जी । इनकी अष्ट सखियों के नाम सुनो ……

सुखदा जी , चारुमति जी , अलबेलि जी , ब्याह विनोदिनी जी , भाना जी , सुभगा जी , कमल वदनी जी , कमलिनी जी । हरिप्रिया जी कहती हैं …ये सब ब्याहुला में बड़ा रंग-रस बरसाती हैं ।

श्रीरंगदेवि जी की अब सातवीं सखी का नाम …..”प्रेम मंजरी” जी । इनकी अष्ट सखियों का नाम भी तुम सुनो ….हरिप्रिया जी कहा …और नाम सुनाने लगीं ।

वृंदा जी , रसिका जी , परम सहचरी जी , हित अलि जी , नित नवीना जी , मान मंजरी जी , बृज सुन्दरी जी , …..ये सब रूप गुण में सबसे आगे हैं ….इनकी सुन्दरता देखते ही बनती है ।

हरिप्रिया कहती हैं …..अब आठवीं सखी श्रीरंगदेवि जी की ….जिनका नाम है …”प्रेमदा” जी । तभी मुझे हरिप्रिया जी ने कहा …वो देखो ….सामने से प्रेमदा सखी जा रहीं थीं ….वो पुष्पों को भी देख रहीं थीं तो प्रेम झर रहा था उनकी दृष्टि से , वो हिरण , शुक , हंस आदि को छूते हुए चल रहीं थीं …….इनकी अष्ट सखियों के नाम ये हैं ……चन्द्रहासा जी , ( ओह ! हाँ इनकी हंसीं भी चंदा की चाँदनी की तरह बिखर रही है )। चारु भासा जी , दिव्य वासा जी , मोद प्रदायका जी , मृदुल अंगा जी , अलबेलि जी, अनुपमा जी , अनुरागिदा जी । ये नाम श्रीरंगदेवि जी की अष्ट सखियों की अष्ट सखियों के हैं …इनका जो नाम लेता है …उनका जीवन उत्सव और मंगल रूप ही हो जाता है । इतना बोलकर हरिप्रिया जी ने उन सखियों को भाव से प्रणाम किया था ।

शेष अब कल –
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 33
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अर्जुन उवाच
योSयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन |
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् || ३३ ||

अर्जुनः उवाच – अर्जुन ने कहा; यः-अयम् – यह पद्धति; योगः – योग; त्वया – तुम्हारे द्वारा; प्रोक्तः – कही गई; साम्येन – समान्यतया; मधुसूदन – हे मधु असुर के संहर्ता; एतस्य – इसकी; अहम् – मैं; न – नहीं; पश्यामि – देखता हूँ; चञ्चलत्वात् – चंचल होने के करण; स्थितम् – स्थिति को; स्थिराम् – स्थायी |

भावार्थ
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अर्जुन ने कहा – हे मधुसूदन! आपने जिस योगपद्धति का संक्षेप में वर्णन किया है, वह मेरे लिए अव्यावहारिक तथा असहनीय है, क्योंकि मन चंचल तथा अस्थिर है |

तात्पर्य
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कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पूर्ण योगी होता है | वह अपने व्यक्तिगत अनुभव से प्रत्येक प्राणी के सुख तथा दुःख से अवगत होता है | जीव के दुख का कारण ईश्र्वर से अपने तथा लोकों का स्वामी एवं समस्त जीवों का परम हितैषी मित्र समझना है | पूर्ण योगी यह जानता है कि भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित बद्धजीव कृष्ण से अपने सम्बन्ध को भूल जाने के करण तीन प्रकार के तापों(दुखों) को भोगता है; और चूँकि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सुखी होता है इसीलिए वह कृष्णज्ञान को सर्वत्र वितरित कर देना चाहता है | चूँकि पूर्णयोगी कृष्णभावनाभावित बनने के महत्त्व को घोषित करता चलता है; अतः वह विश्र्व का सर्वश्रेष्ठ उपकारी एवं भगवान् का प्रियतम सेवक है |

न च तस्मान् मनुष्येषु कश्र्चिन्मे प्रियकृत्तमः (भगवद्गीता १८.६९) |

दूसरे शब्दों में, भगवद्भक्त सदैव जीवों के कल्याण को देखता है और इस तरह वह प्रत्येक प्राणी का सखा होता है | वह सर्वश्रेष्ठ योगी है क्योंकि वह स्वान्तःसुखाय सिद्धि नहीं चाहता, अपितु अन्यों के लिए भी चाहता है | वह अपने मित्र जीवों से द्वेष नहीं करता | यही है वह अन्तर जो एक भगवद्भक्त तथा आत्मोन्नति में ही रूचि वाले योगी में होता है | जो योगी पूर्णरूप से ध्यान धरने के लिए एकान्त स्थान में चला जाता है, वह उतना पूर्ण नहीं होता जितना कि वह भक्त जो प्रत्येक व्यक्ति को कृष्णभावनाभावित बनाने का प्रयास करता रहता है |

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