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!!”श्रीराधाचरितामृतम्” 153 !!
“बृज की पुनर्स्थापना” – परीक्षित का प्रस्ताव
भाग 2
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नेत्र सजल हैं परीक्षित के ।
बृज अभी जन शुन्य है ……..जन की भी आवश्यकता पड़ेगी बृज को वापस बसानें में……….मैं उसकी कमी भी पूरी करूँगा ……परीक्षित उत्साहित हैं…….महर्षि ने परीक्षित की बात का अनुमोदन किया ।
हे परीक्षित ! पर आज पूर्णिमा है……..आज संकीर्तन होगा ………कुसुम सरोवर के निकट…….पूर्ण चन्द्रमा की चाँदनी में ….उद्धव जी नें परीक्षित के पीठ में हाथ स्नेह से मारते हुए कहा ।
बालक की तरह चहक उठे थे परीक्षित………आहा ! कितना आनन्द आएगा ……..वज्रनाभ आज परीक्षित को पाकर और अच्छा अनुभव कर रहे हैं ……..परीक्षित कुसुम सरोवर के संकीर्तन की भावना में ही डूबे रहे थे दिन भर ।
आहा ! क्या संकीर्तन था …….कुसुम सरोवर झूम उठा था ………..गिरिराज जी की लताएँ चमक उठीं थीं ………….
पूर्णिमा की चाँदनी में गिरिराज जी अद्भुत लग रहे थे ।
बृज रज में अद्भुत चमक थी…….चाँदनी जब यमुना की रेत में पड़ती तो गौर और श्याम दो रज कण श्यामा श्याम ही लगते थे ।
उद्धव जी नें मंजीरा लिया था……….और वो भावोन्माद में अद्भुत नृत्य कर रहे थे ………….
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे !
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ।
क्रमशः …..
शेष चरित्र कल-
🌺 राधे राधे🌺
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 63 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
दरसनीय कैसोर मृदु, मूरति अति कमनीय।
आनंदमय अहलाद जै, नित्य-सुधाम धनीय ॥
॥ पद ॥
जै-जै नित्यधाम धनीय।
स्याम-स्यामा सहज सुंदर कामरति कमनीय ॥
दरसनीय किसोर मूरति महामोद सनीय ।
श्रीहरिप्रिया आनंदमय अहलाद जोरि बनीय ॥ ३५ ॥
*हे रसिकों ! वो जीव महाभाग्यशाली है …जो इस रस मार्ग को समझने की चेष्टा कर रहा है …उससे भी बड़ा भाग्यशाली वो है ….जो इस रस मार्ग में चल पड़ा है …..किन्तु हमारे श्रीवृन्दावन के रसिकाचार्य कहते हैं कि त्रिदेव भी उसके ऊपर पुष्प बरसाते हैं …जब एक जीव चिदानंदमय सखी वपु प्राप्त करके अप्राकृत प्रेम राज्य में प्रवेश कर जाता है । हमारे श्रीमहावाणी कार कहते हैं …..ये सखी वपु धारण किया जिस जीव ने …वो तो ब्रह्मादि का भी वंदनीय हो गया । वो निकुँज रस में निमग्न ही सदा रहता है ….आनन्द और आल्हाद के मिलन में मुख्य भूमिका निभाता है …..मुझ से कल होली प्रसंग में गौरांगी ने पूछा …..हरि जी ! सखियों के भी विभाग होंगे ना ?
परम प्रेष्ठ सखी , प्रेष्ठ सखी , नित्य सखी , और सखी । मैंने कहा था ।
इसको स्पष्ट कीजिए हरि जी ! गौरांगी ने कहा ।
श्रीरंगदेवि जी , श्रीललिता जी , श्रीचित्रा जी ….ये परम प्रेष्ठ सखियों में आती हैं ….ये विशेष प्रिय सखी हैं ….वैसे अष्टसखियाँ ही प्रिय हैं युगलवर को …अष्ट सखियाँ ही क्यों सभी सखियाँ प्रिय हैं ….किन्तु परम प्रेष्ठ में ये तीन सखियाँ आती हैं । फिर प्रेष्ठ सखी में श्रीसुदेवी जी , श्रीविशाखा जी , श्रीइन्दुलेखा जी , श्रीतुंगविद्या जी और श्रीचम्पकलता जी । गौरांगी ने फिर पूछा था …..नित्य सखी क्या हैं ? नित्य सखी हैं …..श्रीवासा सखी , श्रीअग्रवर्ती सखी , श्रीहरिप्रिया सखी आदि । “नित्य सखी” इतने ही हैं ऐसा नही मानना चाहिए …अन्य भी हैं ।
और “सखी” में निकुँजोपासना में रत जीव हैं ….जो जो युगलवर के रस में निमग्न होना चाहते हैं ….वो इस ओर आते हैं ….आरम्भ भक्ति से करते हुए दास्य , सख्य , वात्सल्य से होकर मधुर रस में पहुँचते हैं …फिर श्रीजी की कृपा से ही उन्हें “निकुँज उपासना” की ओर बढ़ना अच्छा लगता है …वो बढ़ते हैं …वो युगलनाम मन्त्र का आश्रय लेते हुए गोपाल मन्त्रराज के माध्यम से उस प्रेम लोक को आकर्षित करते हैं …जैसे – सूर्य के सामने आइना रख दो ….तो वो प्रकाश को जैसे खींचता है ऐसे ही ये मन्त्र आदि आइना की तरह हो जाते हैं ….जब मन्त्र का जाप यहाँ साधक करता है तो उधर मन्त्र के यन्त्रवत लोकों को ही वो आकर्षित करता है । ये विज्ञान है , मैंने कहा था ।
गौरांगी ने एक प्रश्न और किया ….श्रीराम मन्त्र का कोई जाप कर रहा है ….और वो श्रीवृन्दावन में है उसका देह श्रीवृन्दावन में छूटता है तो वो कहाँ जाता है ? मैंने कहा ….उसका मन्त्र जिस लोक का है वो वहीं जाता है । आपको राम परम्परा का मन्त्र मिला है ….तो आप चाहें श्रीवृन्दावन में ही देह त्यागें किन्तु आप जाएँगे साकेत धाम में ही ….आप निकुँज नही जाएँगे । ऐसे ही सबका है ….शिव मन्त्र वाले कैलाश जायेंगे …नारायण मन्त्र वाले वैकुण्ठ जाएँगे …आदि आदि । गौरांगी इसके बाद कुछ नही बोली थी ।
सामने कुँज है ….उस कुँज में फूलो का सिंहासन है …अभी अभी सिंहासन कुंजों ने ही बना दिया है ….उसी सिंहासन में देखते ही देखते युगल सरकार विराजें हैं ….दर्शन हुए हमें । हरिप्रिया जी ने प्रणाम नही किया मैंने साष्टांग किया …..वो तो निहार रहीं थीं बस । मैंने इतना तो पक्का समझ लिया कि यहाँ विधि मुख्य नही है प्रेम मुख्य है । इसलिए तो सखियाँ प्रणाम करने की अपेक्षा निहारने में जोर देती हैं …..अपलक निहार रहीं हैं हरिप्रिया जी । मुस्कुराती हुयी निहार रही हैं । उनके नेत्रों के कोरों से अश्रु बह रहे हैं । कितने समय तक ये चलता रहा …युगलवर की झाँकी और हरिप्रिया जी का उस प्रेमपूर्ण ढंग से निहारना । समय मैं क्या बताऊँ ….यहाँ समय यानि काल की गति ही नही है । अब हरिप्रिया जी ने मुझ से कहा ….जब युगलवर वहाँ से चले गए ….तब कहा ……अरी ! दर्शनीय तो यहीं हैं ……आह भरते हुए बोलीं थीं हरिप्रिया जी …..सच ! दर्शनीय जोरी यही है …..क्यों ? इसलिए कि नित्य किशोर यही हैं …और नित्य किशोरी यही हैं …आनन्द ये हैं और आल्हादिनी यही हैं ….कितने सुन्दर हैं …ऐसा लगता है अनन्त कामदेव की सुन्दरता समेटे काम विराजमान है …और अनन्त रति की मधुरता समेटे रति विराजमान हैं ….कितने सुकुमार हैं …अतीव कोमल हैं ….हरिप्रिया जी कहती जा रहीं हैं । कुछ देर के लिए यहाँ मौन हो जाती हैं ….वाणी हरिप्रिया जी की अवरुद्ध हो गयी है । किन्तु फिर …..कैसे मुस्कुराते हुए , अत्यंत हर्षित होते हुए, ये जोरी चारों ओर प्रेम माधुरी को फैला रही है । ऐसे रस सम्राट श्रीवृन्दावन के नरेश श्यामा श्याम की – जय हो जय हो जय हो । हरिप्रिया जी आनन्दमग्न हो जाती हैं ….वो बस जय जयकार कर रही हैं ।
शेष कल चर्चा –
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (138)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
प्रथम रासक्रीड़ा का उपक्रम
तो भगवान ने गोपियों का रसदान कैसे किया वह प्रक्रिया बताते हैं-प्रहस्य सदयं गोपी। बोले-बावरी हैं ये, भोली हैं, इनको स्वयं अपने सुख का ही भान नहीं है, सुख कैसे लेना चाहिए, रस कैसे मिलना चाहिए, जीवन को आनन्द से कैसे बिताना चाहिए, इनको मालूम नहीं है। लोग समझते हैं कि हम बढ़िया कपड़ा पहनेंगे तो आनन्द में रहेंगे। हमारे पास बढ़िया कपड़ा पहनकर ऐसे-ऐसे लोग आते हैं जिनके दिल में आग लगी होती है। कपड़ा बढ़िया, बाल बढ़िया, शक्ल-सूरत बढ़िया और दिल में आग लगी है। मतलब यह है कि तुमको सुख की कला, जीवन की कला, आनन्द की कला नहीं मालूम है, तुमको नकल मालूम है- ‘नास्ति कला यास्मिन्।’ तो अब देखो- आत्मारामोऽप्यरीरमत्- यह रास जो भगवान ने किया वह पुष्टि है, मर्यादा नहीं है।
वल्लभ-संप्रदाय में जो दो शब्द चलते हैं- मर्यादा और पुष्टि। मर्यादा का अर्थ होता है सामाजिक समाज की परम्परावैदिक शब्द है मर्यादा इसलिए इसका वैदिक अर्थ है- मर्यैः मृत्युग्रस्तैः मनुष्यैः आदीयते इति मर्यादा। मनुष्य जिसको परंपरा के रूप में ग्रहण करता है उसका नाम है मर्यादा; और पुष्टि माने, सिंचन और पोषण जैसे ऊपर से खाद पड़ जाय। मर्यादा है कि बीज को गीली मिट्टी में डाल दो तो उसमें से अंकुर निकल आवे, लेकिन अंकुरमात्र तो निकलना पर्याप्त नहीं है, सिंचाई चाहिए उसको, उसके लिए पौष्टिक खाद चाहिए। तो मर्यादा यह है कि मनुष्य पैदा हो गया है, अब इसके जीवन में आनन्द आवे, रस आवे इसके लिए पुष्टि चाहिए।
आपको गोपी और आत्मारामः दोनों शब्दों पर ध्यान देना चाहिए। गोपी कौन है? गोपनाद् गोपी- एक गोपी ऐसी है व्रज में, गोप ऐसा है व्रज में जो कृष्ण के मन का काम करता है, वह मन क्या है? श्रीकृष्ण अपने को छिपाने के लिए कि ईश्वरावतार हो गया है, मथुरा से भगवान की जगह बालक बनकर वसुदेवजी की गोद में बैठकर रातों रात गोकुल आये। गोकुल वाले चाहते हैं तो इस रहस्य को एक मिनट में उघाड़ सकते थे, लेकिन इन्होंने कहा कि जब श्रीकृष्ण उसको छिपाना चाहते हैं, अगर वह बच्चा बनकर अपने ईश्वरत्व को छिपाना चाहते हैं, तो हम चोर बनाकर उनके ईश्वरत्व को छिपायेंगे। जब चोर-चोर प्रसिद्धि होगी तो कंस कैसे कहेगा कि ईश्वर है।+
एक महात्मा किसी चीज को छिपाना चाहते थे तो उन्होंने एक मुट्ठी धूल उस पर डाल दी। चेले ने देखा तो उस पर एक टोकरी धूल और डाल दी। यह तो ठीक चेला हुआ। और अगर वह गुरुजी की अनुपस्थिति में कुरेदकर देखना शुरू कर देता तो वह गुरु-प्रेमी नहीं है, वह तो खुफिया है। तो देखो, वह चोर की प्रसिद्धि करना एक मुट्ठी धूल पर एक टोकरी धूल डालना हुआ कि नहीं? इसका नाम प्रेम है। खुफियागीरी का नाम प्रेम नहीं होता।
एक घर में बहू और उसके पति दोनों बहुत दुःखी थे। क्या दुःखी थे कि अब दोनों रात को कमरे में सोते तो बुड्ढे ससुर उठकर आते और खिड़की में- से झाँकते कि हमारे बहू और बेटे क्या कर रहे हैं। बड़ी लड़ाई हुई घर में! प्रेम का मतलब सीआयीडीपना नहीं है, वहाँ तो एक बार अगर मन में कोई बात खटक गयी, तो हमेशा के लिए खटक जाती है। तो कृष्ण ने कहा- कि हम ईश्वर नहीं है, हम गोप-बालक हैं। गोपियों ने हल्ला किया गाँव में कि चोर-चोर! किसने चोरी की? कि नन्दनन्दन ने। कंस ने कहा- यदि वह हमारा दुश्मन होता तो चोरी थोड़े ही करता?
गोपी ने कहा- उसने तो हमारे साथ छेड़-छाड़ की है, वह तो माखन चुराता है, अरे गगरी फोड़ता है। तो गोपनाद गोपी- माने श्रीकृष्ण के रहस्य को गुप्त रखने वाली होने के कारण गोपी का नाम गोपी है, गोपी का नाम गोप है। उन्होंने जब कृष्ण के ईश्वरत्व को दबा दिया तो वह कृष्ण की प्रेमिका हो गयीं।
अच्छा, अब देखो दूसरी बात है- गोभिः पिवन्ति ‘गाः पान्ति इति गोपाः वृत्ति-र्गोपा अदाभ्यः’।
ऋग्वेद में श्रुति है कि विष्णु का एक नाम गोप भी है। गाः पान्ति भगवान् किससे मिलते हैं कि जो अपनी इंद्रियों को सुरक्षित रखता है, गाः इंद्रियाणि पान्ति संयमी पुरुष से भगवान् मिलते हैं, घड़े में रस भरा हो और घड़े में छेद हो, तो जो अपने रस को बहा देगा, वह भगवान् के सामने क्या जायेगा? हमने बचपन में पढ़ा था कि एक सज्जन मरने के बाद वैकुण्ठ में गये। जब वैकुण्ठ में पहुँचे तो वहाँ फाटक बन्द। अब वह रोयें- हे भगवान्, हमारे लिए फाटक खुले! प्रार्थना करें, नाम लेकर पुकारें, पर फाटक न खुले। जब बहुत व्याकुल हुए तब आकाशवाणी हुई कि भक्तराज, तुम मृत्युलोक से वैकुण्ठ में आये हो तो मेरे लिए कोई गुप्त चीज लाये हो कि सब जूठी चीज लाये हो?++
जो वस्तु दुनिया में जाहिर कर दी जाती है, वह जूठी हो जाती है। बोले कि महाराज, यह तो सब जाहिर हो गया है और तब वैकुण्ठ का फाटक नहीं खुला। प्रेम जाहिर करने पर जूठा हो जाता है। प्रेम में ईर्ष्या आने पर नरक हो जाता है, प्रेम जबान पर लाने पर जूठा हो जाता है, प्रेम दूसरा का चिन्तन होने से व्यभिचार हो जाता है, प्रेम जब क्रिया में उतरता है, शोला बन जाता है और प्रेम जब शास्त्रोक्त विधान में आता है तब परमधर्म बन जाता है। प्रेम की विद्या निराली है। यह जो दुनियादारी में सजग हैं उन्होंने कभी सच्चा प्रेम देखा नहीं है, स्वार्थ का प्रेम देखा है। तो ‘गाःपान्ति’ अपनी इन्द्रियों के छिद्र बन्द करके, संयम में रहकर, हृदय-कलश में प्रेमामृत भरकर उसको भगवान् के सामने जिसने उपस्थित किया वह गोपी है। इस प्रेम को बहने नहीं दिया, प्रेम में ईर्ष्या नहीं आने दी, प्रेम को नरक नहीं बनाया, प्रेम उच्छिष्ट नहीं किया, प्रेम को अधर्म नहीं होने दिया।
गोभिः पिबन्ति- ये आँख से कृष्ण को पीती हैं, कान से कृष्ण को सुनती हैं, नाक से कृष्ण को सूँघती हैं, जीभ से कृष्ण को चाटती हैं, त्वचा से कृष्ण के साथ लिपटती हैं, उन्होंने अपनी सब इंद्रियों को श्रीकृष्ण के प्रति दे दिया। ‘पिबन्ति इव चक्षुर्भ्याम् लिह्यन्ति इव जिह्वया’ आंखों से मानो कृष्ण को पी जाती हैं; जीभ से मानो चाट लेती हैं; ‘रमन्ति इव बाहुभ्याम्’ बाँहों से मानो आलिंगन कर लेती हैं ऐसा भागवत् में वर्णन है। तो कृष्ण ने कहा कि इनके भीतर वह रस स्थापित करें जो हमारा है, आत्मप्रेमः आत्मारामोऽपि। इसको बोलते हैं कि गोपी के परकीयापन को स्वीकाय बना दिया। बोले- यहाँ परकीयापन काहे का है? तो कहते हैं कि भगवान् भला कच्चा रस क्यों पियेंगे? माने रस भी तो भोग्य रस होना चाहिए।
हमको गाँव की बात याद है घर में दूध भी रहता है और शक्कर भी रहती थी। यह उस जमाने की बात है जब शक्कर की इतनी मिलें नहीं थीं। घर में शक्कर भी रहती और गुड़ भी रहता था, कोई थोड़ा गरीब आदमी आता तो उसको गुड़ का शर्बत पिलाया जाता और कोई रईस आदमी आया होता तो उसके लिए शक्कर का शर्बत बनता। तो भोक्ता के हिसाब से भोग रस होता है। इसलिए आत्माराम श्रीकृष्ण ने गोपियों में अपना स्वरूप-रस डालकर पहले उनको स्वकीया बनाया और फिर उनके साथ रास-विहार किया। ‘गोपिषु आत्मारामोऽपि’ श्रीकृष्ण ने कहा- अपने आत्मा को मैंने गोपी से मिला दिया है, माने जो गोपी सो मैं, जो मैं सो गोपी; परकीयापन बिलकुल निवृत्त हो गया।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
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श्लोक 7 . 24
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अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः |
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् || २४ ||
अव्यक्तम् – अप्रकट; व्यक्तिम् – स्वरूप को; आपन्नम् – प्राप्त हुआ; मन्यन्ते – सोचते हैं; माम् – मुझको; अबुद्धयः – अल्पज्ञानी व्यक्ति; परम् – परम; भावम् – सत्ता; अजानन्तः – बिना जाने; मम – मेरा; अव्ययम् – अनश्र्वर; अनुत्तमम् – सर्वश्रेष्ठ |
भावार्थ
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बुद्धिहीन मनुष्य मुझको ठीक से न जानने के कारण सोचते हैं कि मैं (भगवान् कृष्ण) पहले निराकार था और अब मैंने इस स्वरूप को धारण किया है | वे अपने अल्पज्ञान के कारण मेरी अविनाशी तथा सर्वोच्च प्रकृति को नहीं जान पाते |
तात्पर्य
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देवताओं के उपासकों को अल्पज्ञ कहा गया है | भगवान् कृष्ण अपने साकार रूप में यहाँ पर अर्जुन से बातें कर रहे हैं, किन्तु जब भी निर्विशेषवादी अपने अज्ञान के कारण तर्क करते रहते हैं कि परमेश्र्वर का अन्ततः स्वरूप नहीं होता | श्रीरामानुजाचार्य की परम्परा के महान भगवद्भक्त यामुनाचार्य ने इस सम्बन्ध में दो अत्यन्त उपयुक्त श्लोक कहे हैं (स्तोत्र रत्न १२) –
त्वां शीलरूपचरितैः परमप्रकृष्टैः
सत्त्वेन सात्त्विकतया प्रबलैश्र्च शास्त्रैः |
प्रख्यातदैवपरमार्थविदां मतैश्र्च
नैवासुरप्रकृतयः प्रभवन्ति बोद्धुम् ||
“हे प्रभु! व्यासदेव तथा नारद जैसे भक्त आपको भगवान् रूप में जानते हैं | मनुष्य विभिन्न वैदिक ग्रंथों को पढ़कर आपके गुण, रूप तथा कार्यों को जान सकता है और इस तरह आपको भगवान् के रूप में समझ सकता है | किन्तु जो लोग रजो तथा तमोगुण के वश में हैं, ऐसे असुर तथा अभक्तगण आपको नहीं समझ पाते | ऐसे अभक्त वेदान्त, उपनिषद् तथा वैदिक ग्रंथों की व्याख्या करने में कितने ही निपुण क्यों न हों, वे भगवान् को समझ नहीं पाते |”
ब्रह्मसंहिता में यह बताया गया है कि केवल वेदान्त साहित्य के अध्ययन से भगवान् को नहीं समझा जा सकता | परमपुरुष को केवल भगवत्कृपा से जाना जा सकता है | अतः इस श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न केवल देवताओं के उपासक अल्पज्ञ होते हैं, अपितु वे अभक्त भी जो कृष्णभावनामृत से रहित हैं, जो वेदान्त तथा वैदिक साहित्य के अध्ययन में लगे रहते हैं, अल्पज्ञ हैं और उनके लिए ईश्र्वर के साकार रूप को समझ पाना सम्भव नहीं है | जो लोग परमसत्य को निर्विशेष करके मानते हैं वे अबुद्धयः बताये गये हैं जिसका अर्थ है, वे लोग जो परमसत्य के परं स्वरूप को नहीं समझते | श्रीमद्भागवत में बताया गया है कि निर्विशेष ब्रह्म से ही परं अनुभूति प्रारंभ होती है जो ऊपर उठती हुई अन्तर्यामी परमात्मा तक जाती है, किन्तु परमसत्य की अन्तिम अवस्था भगवान् है | आधुनिक निर्विशेषवादी तो और भी अधिक अल्पज्ञ हैं, क्योंकि वे पूर्वगामी शंकराचार्य का भी अनुसरण नहीं करते जिन्होंने स्पष्ट बताया है कि कृष्ण परमेश्र्वर हैं | अतः निर्विशेषवादी परमसत्य को न जानने के कारण सोचते हैं कि कृष्ण देवकी तथा वासुदेव के पुत्र हैं या कि राजकुमार हैं या कि शक्तिमान जीवात्मा हैं | भगवद्गीता में (९.११) भी इसकी भर्त्सना की गई है | अवजानन्ति मां मूढा मानुमानुषीं तनुमाश्रितम् – केवल मुर्ख ही मुझे सामान्य पुरुष मानते हैं |
तथ्य तो यह है कि कोई बिना भक्ति के तथा कृष्णभावनामृत विकसित किये बिना कृष्ण को नहीं समझ सकता | इसकी पुष्टि भागवत में (१०.१४.२९) हुई है –
अथापि ते देव पदाम्बुजद्वय प्रसादलेशानुगृहीत एव हि |
जानाति तत्त्वं भगवन् महिन्मो न चान्य एकोSपि चिरं विचिन्वन् ||
“हे प्रभु! यदि कोई आपके चरणकमलों की रंचमात्र भी कृपा प्राप्त कर लेता है तो वह आपकी महानता को समझ सकता है | किन्तु जो लोग भगवान् को समझने के लिए मानसिक कल्पना करते हैं वे वेदों का वर्षों तक अध्ययन करके भी नहीं समझ पाते |” कोई न तो मनोधर्म द्वारा, न ही वैदिक साहित्य की व्याख्या द्वार भगवान् कृष्ण या उनके रूप को समझ सकता है | भक्ति के द्वारा की उन्हें समझा जा सकता है | जब मनुष्य हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे | हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे – इस महानतम जप से प्रारम्भ करके कृष्णभावनामृत में पूर्णतया तन्मय हो जाता है, तभी वह भगवान् को समझ सकता है | अभक्त निर्विशेषवादी मानते हैं कि भगवान् कृष्ण का शरीर इसी भौतिक प्रकृति का बना है और उनके कार्य, उनका रूप इत्यादि सभी माया हैं | ये निर्विशेषवादी मायावादी कहलाते हैं | ये परमसत्य को नहीं जानते |
बीसवें श्लोक से स्पष्ट है – कामैस्तैस्तै र्हृ तज्ञानाः प्रपद्यन्तेSन्यदेवताः – जो लोग कामेच्छाओं से अन्धे हैं वे अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं | यह स्वीकार किया गया है कि भगवान् के अतिरिक्त अन्य देवता भी हैं, जिनके अपने-अपने लोक हैं और भगवान् का भी अपना लोक है | जैसा कि तेईसवें श्लोक में कहा गया है – देवान् देवजयो यान्ति भद्भक्ता यान्ति मामपि – देवताओं के उपासक उनके लोकों को जाते हैं और जो कृष्ण के भक्त हैं वे कृष्णलोक को जाते हैं, किन्तु तो भी मुर्ख मायावादी यह मानते हैं कि भगवान् निर्विशेष हैं और ये विभिन्न रूप उन पर ऊपर से थोपे गये हैं | क्या गीता के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि देवता तथा उनके धाम निर्विशेष हैं? स्पष्ट है कि न तो देवतागण, न ही कृष्ण निर्विशेष हैं | वे सभी व्यक्ति हैं | भगवान् कृष्णपरमेश्र्वर हैं, उनका अपना लोक है और देवताओं के भी अपने-अपने लोक हैं |
अतः यह अद्वैतवादी तर्क कि परमसत्य निर्विशेष है और रूप ऊपर से थोपा (आरोपित) हुआ है, सत्य नहीं उतरता | यहाँ स्पष्ट बताया गया है कि यह ऊपर से थोपा नहीं है | भगवद्गीता से हम स्पष्टतया समझ सकते हैं कि देवताओं के रूप तथा परमेश्र्वर का स्वरूप साथ-साथ विद्यमान हैं और भगवान् कृष्ण सच्चिदानन्द रूप हैं | वेद भी पुष्टि करते हैं कि परमसत्य आनन्दमयोSभ्यासात् – अर्थात् वे स्वभाव से ही आनन्दमय हैं और वे अनन्त शुभ गुणों के आगार हैं | गीता में भगवान् कहते हैं कि यद्यपि वे अज (अजन्मा) हैं, तो भी वे परकत होते हैं | भगवद्गीता से हम इस सारे तथ्यों को जान सकते हैं | अतः हम यह नहीं समझ पाते कि भगवान् किस तरह निर्विशेष हैं? जहाँ तक गीता के कथन हैं, उनके अनुसार निर्विशेषवादी अद्वैतवादियों का यह आरोपित सिद्धान्त मिथ्या है | यहाँ स्पष्ट है कि परमसत्य भगवान् कृष्ण के रूप और व्यक्तित्व दोनों हैं |
