मिथिला के भक्त – 10 – !! मामा श्रीप्रयाग दास जी !! : नीरु आशरा

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मिथिला के भक्त - 10

!! मामा श्रीप्रयाग दास जी !!


मैंने पूर्व में भी बहुत बार कहा है ….”भगवान सम्बन्ध देखते हैं”…..नाता उनके लिए महत्वपूर्ण है ….जो उन्हें जिस भाव से मानता है ये भी उन्हें उसी भाव से देखना शुरू कर देते हैं । ये तो हुयी भगवान की बात ….लेकिन उस भगवत्ता की भी जो परमाद्या शक्ति हैं …उनमें तो करुणा विशेष है …वो माता के रूप में वात्सल्यमयी हैं ….बेटी के रूप में भावदात्री हैं …बहन के रूप में सदा हित चिंतिका हैं ….आप बस ये समझिये ….उनकी कृपा निरन्तर हम जीवों पर किसी न किसी रूप से बरस ही रही है । दिखावा ये करती नहीं …क्यों कि माता में कहीं कोई दिखावा नही होता…नाही बहन और बेटी में । ये सब निस्वार्थ प्रेम के रूप हैं । इसलिए साधकों ! भक्ति मार्ग में विशेष श्रीकृष्ण के पूर्व श्रीराधा पुकारने की परम्परा है …और श्रीराम से पूर्व श्रीसीता कहने में भक्तों को विशेष सुख की प्राप्ति होती है ……क्यों की अकारण करुणा बरसाने वाली ये हमारी श्रीकिशोरी जी ही हैं …..इन्हीं को भजो …इन्हीं को सुमिरो …और इनके सुमिरन से इनके नाथ श्रीरघुनाथ बहुत प्रसन्न होते हैं …….कोई सम्बन्ध जोड़ लो ना श्रीकिशोरी जी से …..इनकी गोद में सिर रखकर कभी रो लो ….देखो ! तुम्हारे सारे कष्ट दुःख , क्षण में ही दूर हो जायेंगे ।


कल से आगे का प्रसंग –

साधकों ! कहते हैं कि श्रीसूर किशोर दास जी ने ही फिर से श्रीजनकपुर धाम को बसाया । क्यों कि जनकपुर धाम उस समय पूर्ण उपेक्षित था …जंगल के रूप में परिणत हो चुका था ।

जैसे – श्रीवृन्दावन के विषय में कहा जाता है कि श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके अनुयायियों ने श्रीवृन्दावन को फिर से बसाया ….ऐसे ही श्रीसूरकिशोर दास जी ने श्रीजनकपुर धाम को फिर से बसाया । नेपाल का एकीकरण महाराजा श्रीपृथ्वीनारायण शाह के द्वारा हुआ …उस समय महाराजा द्वारा श्रीजानकी मन्दिर की भूमि को ताम्रपत्र में उकेरकर श्रीसीता राम जी के चरणों में अर्पण कर दिया गया था ।

बाबा श्रीसूरकिशोर दास जी ने आस पास के गाँवों से हर वर्ग को जनकपुर धाम में बुला बुला कर बसाया । जिसमें सभी जातियाँ शामिल थीं । समाज की स्थापना के लिए हर वर्ग की आवश्यकता होती है । इसलिए हर वर्ग को स्थान दिया और उन सबको अपना अपना व्यापार चलाने के लिए भी कहा । बाबा सूरकिशोर दास जी जनकपुर धाम को पूर्व की तरह समृद्ध और ज्ञान सम्पन्न बनाना चाहते थे … इसलिए उन्होंने ब्राह्मणों को भी विशेष बुला कर यहाँ बसाया ।

इन्हीं ब्राह्मण परिवारों में एक परिवार ऐसा भी था …जो अतिअकिंचन था …अपने ब्राह्मणोचित कर्म में प्रवृत्त था ….किन्तु भगवान के प्रति भाव भक्ति भी इनमें भरपूर देखी गयी थी ।

ब्राह्मण दम्पति थे …बस – पति और पत्नी …ये दोनों ही थे परिवार में । पतिदेव को अपने नित्य कर्म, वेद पाठ आदि से ही फ़ुरसत नही थी ..तो पत्नी को चूल्हा फूँकने से फ़ुरसत नही मिलती थी ।

घर आदि का खर्चा कैसे चलता ? ये प्रश्न छोड़ दीजिए ….क्यों की ब्राह्मण का ध्यान कभी भी …धन आदि के संग्रह में रहा ही नही । उसका तो पूरा का पूरा ध्यान ज्ञानार्जन में ही रहता था ।

सन्तान नही थे इन ब्राह्मण दम्पति के । लेकिन कभी इस बात की ब्राह्मण को चिंता भी नही थी ।

नित्य श्रीजानकी मन्दिर जाना और युगल सरकार की स्तुति आदि से उन्हें प्रसन्न करना । ये भी इन ब्राह्मण का नियम था । सात्त्विक जीवन था ….कभी किसी से कुछ माँगना है नही …कर्मकाण्ड आदि के लिए किसी ने बुला लिया और उसी में जो मिल गया उसी से सन्तोष कर लिया । निष्ठा थी इनकी श्रीसूरकिशोर बाबा के प्रति ….ये बाबा के पास भी जाते , और उनको कभी कुछ शास्त्र की बातें बताते , कभी कुछ बताते ….बाबा इनसे बहुत प्रसन्न होते ….कुछ देना चाहते तो ये लेते नही …कहते …हम ग्रहस्थ हैं ….आप लोग विरक्त हैं …..गृहस्थ का धर्म है की विरक्त को दे …ना कि विरक्त से लें । हाँ , लड्डू आदि प्रसाद ये ले लेते लेकिन धन आदि नही ।

सुनिए ना ! पड़ोसी अब ताने देने लगे हैं …….आज ब्राह्मण पत्नी ने अपने पति को अपना दुःख सुनाया । पड़ोसी की बातें सुनकर उड़ा देनी चाहिए उसे तुम दिल से क्यों लगाती हो । ब्राह्मण ने समझाया अपनी पत्नी को । लेकिन ……अश्रु झरने लगे पण्डितानी के तो । अच्छा बताओ क्या कह रहे हैं पड़ोसी ? हमारे कोई सन्तान नही हैं …..पत्नी के मुख से ये सुनकर पण्डित जी हंसे ….और बोले …ये व्यर्थ की बातें हैं …..भगवान जो देता है उसे स्वीकार करो …बाकी उसके हाथ में ही है जो दे ..जो न दे । इतना कहकर पण्डित जी चले गए थे श्रीजानकी मन्दिर । लेकिन इधर पण्डितानी को पड़ोसियों के ताने से परेशानी होने लगी थी ….फिर मातृत्व उसका स्वभाव भी तो है ।

आज रात्रि में पण्डित जी आए तो पत्नी ने फिर चरण दवाते हुये कहा …….सुनिए ना ! माघ का महीना आरहा है …..सुना है प्रयागराज में कल्प वास करने लोग जाते हैं …माघ के महीने में संगम में वास करते हैं …….हाँ तो …..ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से पूछा । वहाँ कल्प वास करने से मनोकामना पूर्ण होती है ……चलिए ना ! हम दोनों मिलकर प्रयाग में कल्प वास करें ….क्या पता भगवान “वेणी माधव” हमारी सूनी गोद भर दें ? पण्डित जी विचार करने लगे प्रयागराज में जाना वहाँ माघ में वास करना ….ये तो शुभ है …अत्यन्त मंगल है ….ऐसी जिद्द तो मानी ही ज़ानी चाहिए ….ऐसा विचार कर ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को हाँ कह दिया । बस फिर क्या था ….भगवान के श्रीचरणों में पत्नी ने प्रार्थना करी …..समान तैयार किया ….और दोनों दम्पति होकर जनकपुर धाम से प्रयाग राज की ओर चल दिए थे ।

आगे का प्रसंग अब कल –

Hari sharan

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