मुर्झा चांद, जलती राख और मैं : अंजली नंदा

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हीकुछ कहने को बेताब है खामोशी अपने आप में एक किताब है।
रात्रि की तन्द्रा को (निरिख्यन)अवलोकन करते-करते मैंने देखा जन्ह अब मध्य आकाश में (तक) उठ गया है।
झिंकरी की झिंग झिंग (जिन जिन) स्वर संग को रजनीगंधा का उछलती सुगंध निशीथिनी का उम्र सुचित कर रहा हे(की सूचना दे रहा हे )(यह दर्शा रहा है)। मेरे हृदय तंत्री में रात्रि की स्वर (ध्वनि) अनुरणित (गूंजती) होते हुए कुछ
जन्त्रणा खचित(जर्जरित) मुहूर्त को धक्का(प्रखेपित) देते हुए मानस पट्ट में अतीत के स्वप्न भिजा बसंत के छबि अंकित होता जा रहा हे । रेणु रेणु किरणें गिर रही हे हमारी छोटी सी लन में । ज्योस्ना स्नात सुप्त गोलाप, शेफाली और कागज के फूल के पेड़ सब स्वप्न में बिभोर । कुछ पाने का अनेक आनंद, पूर्णता प्राप्ति के आकाङ्ख्या उनकी रात्रि को स्वप्नमय कर रही है ।
और मैं !
निरबता के जन्त्रणा में निसंग मुहूर्त सब के आघात में बिरह बिधुरा बिनिद्र रजनी अतिबाहित करती चली जराही हुं।
रात्रि की काला पनत (पल्लू) से ढाका अबगुण्ठन के तले मेरी सुप्त प्राण चौंक उठती हे ।
बहुत इर्षा होती हे हंसते हुए तारों और खिलती हुई फूलों को देख कर, इच्छा होती हे सब कुछ भूल कर किरण गुच्छा बनकर बिखर जाने को ,कविता के सुर बनके छा जाने को ,सभी के आत्मा को छु के, दिलों को मेहका देने को, प्रेम के ग़जल बन के आपके अन्दर गूंज उठने को । परन्तु मन मेरा बिदग्ध हो उठती है जब मैं देखती हूँ बिस्मृति के अथल गर्भ में वो अन्तरंग मुहूर्त सब खो गया है । अंतहीन सुनामी स्वप्न में मेरी भट्टा पड़ जाती है । आँखों तले आँसू उसकी राज्य बिस्तार करती जा रही है । उस दिन के रजनी गन्धा आजके वसंत की मालय के जादूइ सुरभि नही बिखेर रही है । उस दिन के प्रेम आज प्रतारणा के रंग में रंगी हुए हैं । परिस्थिति के दासत्व स्वीकार करके एक गंध हिन् पलास आज वो । हृदय के प्रत्येक तंत्री में आज बेसुरा रागिनी सुनाई देती हे । अनेक बार आपके प्रतिख्या में चौंक उठती हूँ मैं । नीरवता संपूर्ण रुप में ग्राश कर चुकी (निगल चुकी) हे अब मुझे । लगता है कोई जैसे गुमर गुमर के रोती हे । पर हसी आती है जब मैं आबिस्कार करती हूँ की ये रोने की आवाज़ तो मेरे ही अन्दर से निकल रही हे ।
यही तो जीवन है,कुछ पानेका आनंद ,कुछ हार देने का दुःख,मिलन और बिच्छेद को लेके अनाहूत स्वप्प्न के समष्टि ।
आज जीवन के(अपेख्या) के बिलम्बित प्रहर में आपके बातें याद आती हे. जिनके लिए जीवन के चला पथ में प्रसस्थ प्राचीर(बृहत् दीवार) । और जिसने दिया एक जला देगा कह के मुखाग्नि दिया हे,निस्तब्द (बहुत शांत) एक स्मशान जगह पर ,जंहा मेरी चिता के राख एक मुट्ठी चक्की दे रहा हे कोई एक थुंटा सियामी झाड़ के चारो ओर I
यद्यपि बास्तव में जिन्दा हु तो केवल मात्र एक जिंदा लाश के भांति । स्वर हिन् ,गंध हिन् , बर्ण हिन् ये जीवन । कुछ स्मृतियों के सहारे ही तो जीना है I समय आज दिखा दिआ हे मेरे प्रेम की पबित्रता को , उसकी मूल्य निरूपण कर दिया हे । जीवन में सब कुछ जलांजलि देते हुए तुम्हारे खुसी में मैंने देखि हे मेरी खुसी । पर तुम्हारे लिए उम्र के ब्याबधान में मैं एक स्मृति ।
अब ना आशा बांध रही हूं प्रतिख्या की ना स्वप्न देख रही हूं अतीत का Iअब ना पछताप होति हे ना दुख, केवल दया आती हे अपने आप पर। उसदिन बहुत कुछ लिख कर आपको एक चिट्ठी भेजी थी I और वो चिट्ठी के प्रत्येक
अक्षर आज भी मुझे याद हैI
शुभम !
आदर में ना सही अनादर में भी ये मेरी चिट्ठी ज़रूर पढ़ना। ये मेरी अंतिम चिट्ठी हे. ठीक 2 साल पहले जो नीरव ता को सच मे जैसा मां बन बैठे सिखाते थे, और मैं सर हिला के समर्थन करती थी I किंतु अब मैं आपके वो नीरवता का दाशि बन चुकी हूं। दिन था जब मुझे साथ लेके पिंजरा (एक स्वप्न के घर)बनाने का सपना देख रहे थे। भाव प्रवणता में सिहर उठेते थे आप और फिर निजस्व को लौटते हुए सिर पर हाथ थामें हस देते थे सुन्यको देखते हु ए, क्यों की वहा बैठे अपने आपको अकेले पा कर I तब मुझे शायद मुझे पता नहीं चल रहा था किआप चुपके-चुपके से अपने पैर मेरे अंदर रख रहे थे,अपना तस्वीर बना चुके थे Iआपके बात के कुछ जवाब ना देते हुए सर झुकाये
बैठी रहती थी मैं आपके पास । सायद मुझे अच्छा नहीं लगता था वो सभी सपने।पर आप भबिस्य के बारेमे बहुत कुछ ऐसे बयां करते जाते थे I मेरे नीरवता को देख कर आपके हाथ छू लेता था मेरे होठों को I नजरें मिलते ही आपके वो गहरी आँखों से बहुत कुछ कह जाने जैसे लगती थी I आपके साथ कट जाती थी यूँ हर पल चाँद उगने से लेके अस्थ तक I बिलम्बित रात्रि सब जैसे घुस जाते थे मेरे दिल के बंद दरवाजे को खोलते हुए भीड़ में I रात्रि के उम्र बढ़ते ही आँखे पलके मुद देती हे I नींद की छाओं में,और सुबह अनेक रंगीन स्वप्न को अधूरा किये पूर्णच्छेद लगा देती थी I ऐसे अनेक ……..I
सच में आपको देख कर ऐसा लगता है कि आप एक अबूझ प्रेमी हैं I समय अबिराम गति में निकलता चला जाता हे और गांव छोड़ कर सहर में आरंभ आपके छात्रावास जीवन I अपनी डिग्री के लिए चले जाते हैं आप, पर मैं रह जाती हूं अंका बंका लाल रास्ता के ताड़, नारियल, आम, फनस, झाउं बन के दूसरे और नदी तट के गांव में। लंबे दिन के अंतराल में दिखे आप। दूर से देख के बिन कुछ कहे चुप चाप बिन कहे चले गए आप I आसमाप्त प्रश्न बाची में बिभोर मन मेरा बिब्रत हो उठा।
उसदिन के आप और आज के आप में पार्थक्य कितना? निस्चय बहुत.आपके ऐसे परिवर्तन मैं सहन नहीं कर पा रही थी I कसौटी पत्थर मान के आपके नीरवता को आकण्ठ पी जाने जैसी शक्ति तो मेरे नही हे I पर अनेक सारे जन्त्रणाप्लुत अश्रु से भरा मेरे मन हे I
अनेक बार आप से प्रतारीत होने के वाबजूद भी मैं ने आपको प्यार किया है I आपके डायरी पन्ना में मैं एक बेसुरा कबिता. यदि अगर आपके मन्तब्य मेरे ऊपर अपरिबर्तित रहे तो,मैं आपकी थोड़ी सी स्नेह चाहती थी पर स्नेह के आवरण के नीचे कलुषित जंतरणा शिक्त मन लेके जिना नेही मन्जूर हे I घीसती हुई पैरों में अनिच्छा के घुंघरू बंधे दुनिया को ढूढ़ता का परिचय देना चाहा हे मैंने I मेरे अंदर के वो ” में ” को बहत दिनों से जला दिए हे मैंने I हो सके आप मुझे समझने को कोशिश कर सकते हो और वो भी आप पर ही निर्भर है I
पर क्या मिला आपको मेरे जीवन के साथ खेल के ? किसी के कपटता को कलना नही कर पाती हूँ बोल के शायद निरीह मन को खिभिन कर दिए आप I जले हुए मान में जंतरणा रहती हे,आपके हर वो बात याद आती हे बार बार,चुप चाप ,कोई सुन न ले I प्यार करना शायद आपके सामायिक रुचि,बिस्वाश नही होती है पर ये सच है, आप वो करते हैं I
जिन का प्रहेलिका भी आपके लिए ही सृस्टि. अनेक संदेहि आंखे मेरे चारों ओर घूर ते रहते हैंI शायद उसी के लिए घरमे सभी के होठों से हसि बुझ गयी हे I वात्सल्य का वो जंजीर भी कलंकित होने लगी है I अंत में आँखों के आगे नाच उठती हे आपके परिचित कहानी सब I आपके होठों के वो सारे अनकही बातें, अंत में में अंतिम अनुरोध एक जरूर रख ना, यदि कब भी मेरी याद आये , अपने आपको सोचने को किंचित भी तैयार न करना
आनेवाले जन्म में आपको इसी रूप में पाऊँगी ,देखना उसदिन तक आपके यंही नीरवता को संभाल के रखी रहूँगी मेरे ह्रदय के किसी कोने में I
आपके ….. सीतल
रात्रि के गेहराई,आश्मान के कैनवास पर चाँद भी फीकी दिखने लगी है.काली बादल सब पहाड़ के उस पर भीड़ जमाए हैं I बिजली भी दूर दिग्बलाय धार पर पहरा दे रही है.झांजी पवन भी वो सुखी बरगद के पेड के आसपास थकन मिटा रहे थे I गाओं की समसान से स्वान, सृगाल के कलह के ध्वनि प्रतिध्वनित हो रहा था .लेकिन मैं ढूंढ रही थी मेरे खोए हुए दिनों के वो अभुला स्मृति I इतने बड़े निसंग नीरवता में मेरे आँखों के दो बुन्ह अंशु वो नीरवताको स्वीकृति दे रहा था I

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