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August 30, 2025 10:32 am

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श्रीकृष्णचरितामृतम् – वर्षा-नृत्य – एक अद्भुत झाँकी !!-भाग 1 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम् –  वर्षा-नृत्य – एक अद्भुत झाँकी !!-भाग 1 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! वर्षा-नृत्य – एक अद्भुत झाँकी !!

भाग 1

आज दूर निकल गए दोनों , वर्षा ऋतु है ……बारिश हो ही रही है ।

कुञ्ज की छाँव में दोनों अब ठाड़े हैं ………पर नन्ही फुहियाँ तो पड़ ही रही हैं ……..बिजुली चमकती है तो श्रीराधा डर जाती हैं …….ये क्षण श्याम को बहुत प्रिय है क्यों की उनकी प्रिया उनके हृदय से लग जाती हैं ………..तब श्याम सुन्दर का आनन्द द्विगुणित हो जाता है ।

अब वर्षा कम हो गयी है ……..बादल जा रहे हैं ……जा रहे हैं दूसरी जगह बरसनें के लिये ।

अरे ! ये क्या ! अगनित मोर उस स्थान पर आजाते हैं ।

और पंखों को फैलाये नाचना शुरू कर देते हैं …………पंखो को फैलाते हैं फिर समेटते हैं ………फिर फैलाकर कम्पित कर देते हैं ।

ये सब कन्हाई के लिये कर रहे हैं ये मोर ……..करतल ध्वनि करते हुये उछल पड़ती हैं श्रीजी !

आपको अच्छा लग रहा है प्यारी ! बड़े प्यार से पूछते हैं श्याम ।

जब प्रिया हाँ कहती हैं …….तब पीताम्बरी कदम्ब में रखते हुये वे मोरों के साथ उतर पड़ते हैं नृत्य के लिए…..आहा ! श्याम घन को आज अपनें पास पाकर ये मोर , बड़ भागी मोर आनन्दित हो उठे हैं ।

जैसे मोर नृत्य कर रहे हैं वैसे ही …….नही नही …उससे भी सुन्दर श्याम सुन्दर नृत्य करते हैं ……मुग्ध हैं श्यामा प्यारी ये सब देखकर ।

मेघ गए थे पर यहाँ की इस दिव्य झाँकी नें उन्हें फिर बुला लिया था ।

हाँ ……ऐसे स्थान को छोड़कर ये मेघ भी अब कहाँ जाएँ ।

“श्याम मेघ” जहाँ स्वयं नृत्य कर रहा हो …………ओह !

छा गए मेघ फिर नभ में ……….फिर फुहियाँ पड़नें लगीं ……….

नीचे कोमल बालुका ……….ऊपर मेघाच्छन्न आकाश ……….श्रीराधा निहार रही हैं अपनें प्रियतम को ……..वे नृत्य कर रहे हैं ……….मोर के साथ ………..घूमते हैं …………फिर रुक जाते हैं ………ठुमकते हैं ……अपनी ग्रीवा को हिलाते हैं ………..जैसे मोर हिलाता है ।

अद्भुत !


“प्यारे ! तुम मोर से अच्छा नाचते हो”

…..खिलखिलाते हुये श्रीराधा रानी बोलीं ।

श्याम सुन्दर नें अपनी प्यारी की जब वो उन्मुक्त मुस्कुराहट देखि ……..तो कुञ्ज में गए …..और हाथ पकड़ कर मुक्त आकाश के नीचे लेकर आये …………नही , नही, ………..हँसते हुये मना करती हैं श्रीराधा ……पर श्याम अब कहाँ मानेंगें ।

मयूर पिच्छ लहरा रहा है ……..अलकें हिल रही हैं ……पीताम्बरी फहर रही है । श्रीजी की शोभा का वर्णन तो शब्दों में हो ही नही सकता ……..दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर घूम रहे हैं ……….अच्छे से घूम रहे हैं ……इन दोनों युगल के घूमनें के कारण ……सब घूम रहे हैं …….पृथ्वी, आकाश, वृक्ष वन ……….सब ।

*क्रमशः ….

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