श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! इन्द्र को हुआ अपराध बोध – “गोवर्धन प्रसंग” !!
भाग 2
उद्धव कुछ देर के लिये नेत्र बन्द कर लेते हैं ।
डूब चुका होगा अब तो बृज ?
सात दिन पूरे हुये ………इन्द्र नें आज अपनें सेवकों से फिर पूछा ।
सिर झुकाकर खड़े रहे इन्द्र के सेवक ।
क्या हुआ ? तुम लोग बोलते क्यों नही हो ? इन्द्र को क्रोध आया ।
हे देव ! बृज में आज भी धूल उड़ रही है ……..दबी आवाज में बोले ।
क्या ! सात दिन हो गए ! प्रलयंकारी वर्षा के बाद भी धूल उड़ रही है बृजमण्डल में ? अब क्रोध नही अब इन्द्र को भय लगनें लगा था ।
और जल बरसाओ ! इन्द्र नें फिर आदेश दिया ।
पर हमारे पास जल नही है…….जितना था सब बरसा चुके हैं ।
सेवकों नें हाथ जोड़कर कहा ।
क्यों ? वाष्प बनकर ऊपर ही तो आरहा होगा जल …….उसे वापस जल बनाकर बृज में गिराओ ।
अब वाष्प बनकर भी ऊपर नही आरहा ……..सेवकों नें कह दिया ।
क्यों ? ऐसा कोई नियम नही है …………..वाष्प बनकर तो ऊपर ही आएगा जल ।
हे देव ! हमनें देखा कि गोवर्धन पर्वत के ऊपर त्रिपुरारी अपनी जटाओं को खोल कर खड़े हैं……..जितना भी जल गिरता है वो सब समा जाता है उनकी जटाओं में…….सेवकों नें ये बात अब कही ।
क्या ! कम्पित हो उठे देवराज के पद ………..पसीनें आने लगे मस्तक पर…….क्या कहा तुमनें ? भगवान शंकर ! स्वयं खड़े हैं गोवर्धन पर्वत के ऊपर ?
ओह ! इन्द्र भयभीत हो उठा …..अब उसके कुछ समझ में आरहा था…….वो सोचनें लगा ……….मुझ से तो बहुत बड़ा अपराध हो गया …………ये श्रीकृष्ण ! ……..गोलोक बिहारी हैं ………वो गोलोक बिहारी जिनके अंग से ब्रह्मा विष्णु महारुद्र का प्राकट्य होता है ……..और मैं ? हँसा इन्द्र ………मैं देवराज इन्द्र ! नन्दनन्दन के मात्र पलक गिरते हैं तो मेरे जैसे हजारों इन्द्र जन्मते हैं और मर भी जाते हैं……..मैने अपराध किया श्रीवृन्दावन बिहारी का !
मैं क्या करूँ अब ? मेरा देह दूख रहा है ……हजारों बार मैने बिजली गिराई होगी अपनें बज्र से …….पर मैं क्या बृज का एक तृण भी जला सका ? मैं अपराधी हूँ………मैं तो सौ बार यज्ञ करके इन्द्र बना …….ऐसे कितनें इन्द्र आये और गए ………..इसमें अहंकार क्या !
वे सर्वेश्वर हैं …………मैं एक तुच्छ देवता !
जल भी वही देते हैं मुझे बरसानें के लिये ……….जल को खींचनें की शक्ति भी वही देते हैं ……हँसा इन्द्र …….मैं मूढ़ हूँ उन्हीं की दी गयी शक्ति का उपयोग उन्हीं के ऊपर किया ! ओह !
इन्द्र के कुछ समझ में नही आरहा कि इस अपराध का प्रायश्चित्त क्या ?
कन्हैया ! लाला ! भैया !
सब सखा आनन्दित हो एकाएक पुकारनें लगे थे ।
क्या हुआ ? सब बृजवासियों नें पूछा ।
बादल छंट गए ………धूप निकल गयी ।
क्या सच ! सब गोप गोपी भागे बाहर की ओर …………
हाँ , सच ! देख तो उज्ज्वल धूप निकली है …..और कन्हैया ! धरती गीली भी नही है …..और यमुना में बाढ़ का जल भी नही है ।
मनसुख ये कहता हुआ उछल रहा था ।
कन्हैया मुस्कुराये……..गोवर्धन पर्वत को उतारा अपनी ऊँगली से ।
वाह ! बहुत बड़ा काम किया है आपनें !
जब गोवर्धन को उतारकर नीचे रखा ……तो सामनें श्रीराधारानी खड़ी थीं …….वहीं मुस्कुराते हुये कन्हैया को कह रही थीं ।
हाँ , कनिष्ठिका ऊँगली, फिर नख पर ! ………बड़ी बात है ।
कन्हैया नें भी कह दिया, बड़ी बात तो है प्यारी !
पर इससे भी बड़ी बात ये है ……….कि मैने तुम्हे, तुम्हारे गोवर्धन पर्वत के सहित अपनें नयनों की कोर में बिठाया ………..है ना प्यारे !
कन्हैया नें देखा श्रीराधा रानी को …..तो वे ये कहते हुए खिलखिलाती हुयी वहाँ से चली गयीं थीं ।
कन्हैया अपनी अल्हादिनी को देखते रहे ।
