श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! ज्ञान गुदड़ी – “उद्धव प्रसंग 24” !!
भाग 2
ये कहते हुये मैया नें मेरे हाथ धुलवाए ……..फिर मुझे साग रोटी माखन गुड़ ये सब दिया ……..दूध देती हुयीं बोलीं थीं ……..दूध पीना ……..ये पद्मगन्धा गाय का दूध है……..आज ही उसनें दूध दिया है ……उद्धव ! तुझे देखकर दिया होगा ……नही तो इस पद्म गन्धा नें जो मेरे लाला की प्रिय गाय है……….लाला के मथुरा जानें के बाद इसनें दूध ही नही दिया था …….दूध देना ही बन्द कर दिया था…..आज ही इसनें दूध दिया है ……..तू दूध पीले और सो जा ।
मैने भोजन करनें के बाद …..दूध पीया …..अद्भुत स्वाद था उस दूध में ………फिर बाबा आये ……..बाबा के साथ बैठा , बहुत शान्त हैं बाबा उनके साथ बैठता हूँ तो लगता है किसी महान महर्षि के साथ बैठा हूँ ……..रात हो गयी थी तो ……. सोनें के लिये चला गया ।
ब्रह्म मुहूर्त में ही उठा और स्नान के लिये यमुना की ओर चल दिया…..
पर आज तो मेरे जानें से पहले ही गोपियाँ मेरी प्रतीक्षा में बैठीं थीं ।
विरह से सन्तप्त प्रेमी की कोई सुननें वाला भी हो ना तो उसका आधा दुःख तो वैसे ही दूर हो जाता है …………..प्रेमियों को अपनी बातें सुनानी होती है …..अपनी बातें क्या ! अपनें प्रियतम की बातें ……..कोई सुन ले ……..उद्धव सुन रहे थे उनकी बातें ।
कोशिश करो कि तुम उन्हें भूल जाओ ……….क्यों की वो ब्रह्म हैं …..फिर क्यों ब्रह्म से तुम ऐसी अपेक्षा रखती हो ।
उद्धव ! हमनें प्रेम ब्रह्म जानकर नही किया था ……..हमनें तो बस प्रेम किया……….तुम कहते हो भूल जाओ कैसे भूल जाएँ ! उसकी छुअन को कैसे भूल जाएँ, उसकी मन्द मुस्कान को कैसे भूल जाएँ ……..उसकी झूठी साँची बतियां को कैसे भूल जाएँ ……..उसके छलियापनें को कैसे भूल जाएँ……..ललिता बोलती रही…..उद्धव सुनते रहे …..शब्द अब उद्धव के पास खतम होते जा रहे हैं ।
…..ब्रह्म है वो ! पर हमारे साथ प्रेम करते समय उसे याद नही रहा वो ब्रह्म है ? क्यों किया हमारे साथ प्रेम उसनें ।
अन्तःकरण मिथ्या है ……….मन बुद्धि चित्त अहं सब मिथ्या है …….
उद्धव की बातें सुनकर गोपियाँ हंसी ……..उद्धव ! छोडो भी ये सब …..
हाँ सत्य कह रहे होगे तुम ……पर हम कैसे मान लें ………हमें वो मोहनी मुस्कान कुछ भी माननें नही देती ………हम क्या करें ?
बस तुम एक बात बता दो ……….वो हमें याद करते हैं ?
तुम सत्य बोलते हो इसलिये पूछ रही हैं हम ………..बताओ उद्धव ! उन्होंने हमें त्याग दिया …..पर उनके स्मृति पटल पर कहीं हम हैं ?
तुम तो दयित सखा हो उनके ……….बताओ उद्धव !
तभी मेरी दृष्टि श्रीराधारानी के चरणों में गयी…..मैं स्तब्ध रह गया …..मैने श्रीकृष्ण चरणों की बहुत सेवा की है ……पर आश्चर्य ये था यहाँ कि जो चिन्ह श्रीकृष्ण चरणों में थे…..वही श्रीराधारानी के भी चरणों में ।
तो ये दोनों एक ही हैं ? मेरा अभिमान गलनें लगा ……….ये क्या चमत्कार हो रहा था मेरे साथ …….श्रीराधा चरणों के दर्शन करते ही आज मेरे तन मन से “कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण” बस यही गूँज निकल रही थी ……..मैं कुछ समझ नही पा रहा था …………
तभी मेरे सूक्ष्म शरीर में एक चुनरी आकर गिरी …….वो चुनरी नीले रंग की थी …………उस चुनरी में से कमल की सुगन्ध निकल रही थी…..
मैं सब कुछ भूल गया था …..मैं रसोन्मत्त हो गया था …..उफ़ !
तभी मैने देखा ……..मेरा ज्ञान चादर धरती में पड़ा हुआ है ……..गुदड़ी बन गयी थी वो मेरी ज्ञान की चादर ………मेरे चार महावाक्य सब उस चादर से मिट गए थे ……………मैने देखा ………..पर मेरे ऊपर जो प्रेम की चादर अल्हादिनी की कृपा से मुझे मिली थी ……..उससे तो मैं आज प्रेम रंग में रंग गया था ……….कन्हैया ! कन्हैया ! कन्हैया ! मैं आज पहली बार रोया ……….हिलकियों से रोया …………..ओह !
शेष चरित्र कल –
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