श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! शिशुपाल वध – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 50 !!
भाग 2
कौन नहीं था उस सभा में राजसूय यज्ञ का ये समय था आगन्तुक में सब थे ,
अग्र पूजा किसकी होनी चाहिए ?
देवर्षी ने ही ये प्रश्न और कर दिया उस सभा में ।
बड़े बड़े विद्वान थे वहाँ , बड़े बड़े ऋषि मुनि सब बैठे थे वो देवर्षी के इस प्रश्न पर विचार करने लगे थे । श्रीकृष्ण आनन्द से विराजे हैं और सब की बातें सुन रहे हैं ।
“ श्रीकृष्ण ही अग्र पूजा करने योग्य हैं “ सहदेव उठकर खड़े हो गए और समस्त लोक पाल ऋषि और राजाओं को सम्बोधित करते हुए बोले थे ।
क्यों ? श्रीकृष्ण की ही प्रथम पूजा क्यों ?
नारद जी मुस्कुराते हुए सहदेव से पूछते हैं ।
तब सहदेव ने अद्भुत कहा था , – श्रीकृष्ण हमारे समक्ष विराजमान हैं मैं कह सकता हूँ कि ये यह मात्र एक व्यक्ति नहीं हैं ये प्रत्येक व्यक्ति के अंदर बैठा आत्म तत्व है , समस्त जीवों में यही हैं , बस यही हैं सर्वत्र , सर्वदा यही हैं इनके सिवा और कुछ नहीं हैं ।
बस इतना कहते कहते सहदेव के नेत्र बन्द हो गए थे , उनके रोम रोम से ये वेद की श्रुति प्रकट होने लगी थी – “ एवम् चेत् सर्व भूतानाम् आत्मनम् चार्हंणम् भवेत् “।
हे मेरे आदरणीय महानुभावों ! श्रीकृष्ण ही कारण हैं और कार्य भी यही हैं , यही सबकी सृष्टि करते हैं पालन करते हैं और संहार भी करने वाले यही हैं । सहदेव की बात सुनकर सभा में भीष्म पितामह उठ गए थे , हे सहदेव ! धन्य हो तुम तुमने जो श्रीकृष्ण की महिमा गाई उससे हमारे कान पवित्र हो गए हैं , हम धन्य हो गए , सच कहा तुमने श्रीकृष्ण ही अग्र पूजा करने योग्य हैं ।
भीष्म की बातें सुनकर समस्त ऋषि मुनि साधु ! साधु कहने लगे थे ।
अतिप्रसन्न होकर समय न गँवाते हुए महाराज युधिष्ठिर अपने सिंहासन से उठ गए , महारानी द्रोपदी भी उठीं , अर्जुन आनन्द की अतिरेकता में भागे सुवर्ण की थाल लाने पर सहदेव ने पहले से व्यवस्था कर रखी थी सुवर्ण की जल झारी भी थी वहाँ ।
महाराज युधिष्ठिर और द्रोपदी श्रीकृष्ण चरणों में बैठ गए थे ,
नेत्रों से अश्रु बह चले थे भाव की अधिकता के कारण महाराज के और द्रोपदी के ।
पावनों को भी पावन करने वाले श्रीकृष्ण के चरणों में जैसे ही जल को डाला महाराज युधिष्ठिर ने, बोलो श्रीकृष्ण चंद्र जू की …… जय जय जय । सब ऋषियों ने एक स्वर में यह जयकारा लगाया था । आकाश से पुष्प वृष्टि होने लगी थी । महाराज युधिष्ठिर प्रेम के कारण अश्रु बहाते जा रहे थे , द्रोपदी के आनन्द का कोई ठिकाना नहीं था , वो भाव लोक में विचरण कर रही थी उसके प्राण प्रिय सखा के चरण धोने का आज सौभाग्य प्राप्त हुआ था उसे ।
आह ! तात , युधिष्ठिर ने समय न गँवाते हुये चरणामृत हाथ में लेकर अपने मुख में और मस्तक में डाल लिया था , कुन्ती माता इस दृश्य को देखकर उस सभा में नाच उठीं थीं आनन्द ही आनन्द छा गया था इन्द्रप्रस्थ में , देवों में भी इस सुन्दर श्रीकृष्ण की झाँकी को देखने की नभ में होड़ लग गयी थी , देवता बार बार पुष्प बरसा रहे थे , जय हो जय हो की ध्वनि से पूरा इन्द्रप्रस्थ गूँज रहा था कि –
हा हा हा हा हा हा ,
यह हंसी उसी समय सभा में गूंजी , सब लोग जो जय जयकार कर रहे थे वो शांत हो गए , ये इस तरह हंस कौन रहा है अर्जुन ने भीम से पूछा ।
शिशुपाल , भीम देख चुका था शिशुपाल को इसलिय बिना देखे ही वो बोला ।
ये तो सभा के रंग को बेरंग कर देगा भीम दादा ! अर्जुन ने भीम से कहा ।
कहो तो मार दूँ , भीम ने गदा उठाई , नहीं दादा ! रुको अभी , अर्जुन ने भीम को रोक दिया ।
ग्वाले की पूजा , हा हा हा हा , अब तो ये शिशुपाल गाली देने लगा था और गाली देते हुये हँसता भी जा रहा था , चोर , माखन चोर, फिर हँसता है शिशुपाल नहीं नहीं माखन चोर ही नहीं परस्त्री का चोर , मुझे देखो रुक्मणी मेरी थी पर इसने उसे चुरा लिया , सगाई मेरे साथ हुई थी उसकी , पर ये कृष्ण ! अब तो हद्द ये हो गयी थी की ये खड़े होकर गालियाँ देने लगा था ।
गोविन्द ! मार दें इस शिशुपाल को , आप आज्ञा दें , अर्जुन नेश्रीकृष्ण से धीरे पूछा ।
पर अद्भुत , मुस्कुरा रहे थे श्रीकृष्ण और अर्जुन से कह रहे थे , अर्जुन ! जो भी दे रहा है ये मुझे , हृदय से दे रहा है सखे ! अर्जुन क्रोध में थे , भीम की गदा बारबार उठ रही थी , नकुल सहदेव तलवार पर हाथ रखे हुए थे , भीष्म आदि शिशुपाल को चुप कराना चाह रहे थे किन्तु , दुर्योधन और बोलने के लिए शिशुपाल को उकसा रहा था ।
आप लोग इसकी पूजा करोगे ? ये तो पशुपाल है , और इसलिए इसकी बुद्धि भी पशुओं जैसी है , देखो , इसको देखो , मैं गाली दे रहा हूँ और ये मुस्कुरा रहा है , बुद्धिमान व्यक्ति गाली को सुनकर शर्मिंदा होता है , उसे लाज आती है , पर इसे क्या लाज , ये तो गंवार है , भला कोई चरवाहा पूजा करने योग्य होता है , शिशुपाल बोलता गया , श्रीकृष्ण का मुखमंडल अब बदलने लगा था , सबको देखते हुये श्रीकृष्ण खड़े हो गए थे , ये बृज में ग्वाल गँवारों के साथ रहता था ………. ये सुनते ही श्रीकृष्ण का मुखमण्डल लाल सूर्य की भाँति दमकने लगा ।
अपनी तर्जनी उँगली को श्रीकृष्ण ने ऊपर किया ….नेत्र बन्द किए ।
और , भीम देखो ! अर्जुन ने कहा , – सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का मस्तक धड़ से अलग कर दिया श्रीकृष्ण ने, पर दादा ! उसकी आत्मज्योति श्रीकृष्ण में ही आकर लीन हो गयी है ।
दुर्योधन पैर पटकने लगा था , वो शकुनि को लेकर सभा से ही चला गया ।
पर देवताओं ने और ऋषियों ने राजाओं ने श्रीकृष्ण की स्तुति की थी ।
शेष चरित्र कल


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