श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “श्रीराधेवृन्दावनेश्वरी” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 76 !!
भाग 1
स्वामिनी ! आप से कल गलती हो गयी …….मेरी ललिता मुझ से यही कह रही है ।
अब इसमें मेरी क्या गलती ? मुझे तो पता ही नही था कि मेरे श्याम सुन्दर कहाँ हैं।
मैं तो चली जा रही थी ग्रहण का स्नान करने ……मुझे क्या पता कि प्यारे ने पीछे से आकर मेरे हाथों को पकड़ लिया ……कृष्ण पटरनियाँ आपको देख रहीं थीं …ललिता कहती है ….अब देखने दो इसमें मैं क्या कर सकती हूँ ।
बाबरी है ललिता ….राधा ने अपने ब्रज में परवाह नही की , कि कोई क्या बोल रहा है फिर कुरुक्षेत्र में ……हंसती हैं राधा ……राधा को क्या परवाह ।
यमुना में आप लोग स्नान करते थे …..स्वामिनी ! जल केलि आप युगल का हमने बहुत देखा है ….और कल का स्नान भी देखा ….सौ वर्ष बाद मिलन हुआ था आप दोनों का …जल क्रीड़ा भी हुई आप दोनों की …….ललिता भगवती है आद्यम्बा है वो कह रही थी कि जब आप दोनों कुरुक्षेत्र के सरोवर में स्नान कर रहे थे तब सम्पूर्ण प्रकृति स्तब्ध हो रोमांचित हो उठी थी ।
जड़ प्रकृति नही , चैतन्य प्रकृति भी ……पता नही क्या क्या कहती रहती है ये ललिता भी ।
वही कह रही थी कि वृन्दावन में आप लोग मिलते थे जल केलि भी होती थी …..यहाँ कल भी हुई ……क्या अन्तर था स्वामिनी ! कुरुक्षेत्र के मिलन में और वृन्दावन के मिलन में ।
अब मैं क्या कहूँ इस ललिता को …..आकाश पाताल का अन्तर है कुरुक्षेत्र और वृन्दावन में ।
भूमि का अपना प्रभाव होता है ….भूमि की अपनी ऊर्जा होती है ……प्रेम के लिए जो भूमि उपयुक्त है वो वृन्दावन ही है ….विश्व में वृन्दावन जैसी भूमि नही , प्रेम की अद्भुत छटा यहीं बिखरती है ।
प्रेम के पुष्प पल्लवित यहीं होते हैं …..ललिता ! वृन्दावन के मिलन में और कुरुक्षेत्र के मिलन में कोई समानता ही नही है …..।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल
