श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “आस्तित्व अहंकार खाता है” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 79 !!
भाग 2
आप हंस क्यो रहे हो नाथ ! रुक्मणी ने पूछा …..श्रीकृष्ण बोले ….समझता नही है ये बेचारा अर्जुन , मेरा आहार यही तो है …….अपने भक्त का अहंकार ।
बाहर ब्राह्मण से अर्जुन बोला – “इस बार तुम्हारी पत्नी गर्भवती हो तब मुझे सूचना देना ….मैं उसके बालक की रक्षा करूँगा ….यम से लड़ना पड़े तो भी अर्जुन लड़ेगा” ।
अगर रक्षा नही कर सके तो ….ब्राह्मण ने पूछा ।
मर जाऊँगा …..चिता जलाकर उसी में अपने प्राणों को भस्म कर दूँगा ।
देखते हैं क्या हो तुम ! इस बार तुम्हें सूचित करूँगा …….ब्राह्मण चला गया था ।
हे भारत ! क्या हुआ ….तुम बहुत ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे …क्या हुआ भाई ।
श्रीकृष्ण ने सहजता से जब अर्जुन महल के भीतर आया तब पूछा ।
उस ब्राह्मण बालक की रक्षा नही हुई आपकी द्वारिका में ?
अर्जुन का अहंकार अभी भी बोल रहा था ।
पर तुमने तो रक्षा का प्रण ले लिया ना ! श्रीकृष्ण ने हंसते हुए अर्जुन की पीठ थपथपाई ।
मेरी पत्नी को आज प्रसव होगा अर्जुन ! चलो मेरे पुत्र की रक्षा करने ।
नौ मास पूरे हो गए थे उस ब्राह्मण ने आकर अर्जुन को सूचना दी थी ।
गाण्डीव धारण करके …अर्जुन ब्राह्मण के साथ दौड़े उसकी कुटिया की ओर ।
जाकर अर्जुन ने कुटिया का निरीक्षण किया …फिर बाहर आकर मन्त्रपूत शर का संधान किया… और ऐसा जाल बनाया कि ब्राह्मण की कुटिया में अब वायु भी प्रवेश नही कर सकती थी ।
समय हुआ प्रसव का ….बालक हुआ भी ….उसके रोने की अवाज बाहर रक्षा में खड़े अर्जुन ने भी सुनी …….पर कुछ ही देर में वो रोने की आवाज नभ में सुनाई देने लगी …अर्जुन चौंक कर नभ में देखने लगे थे ….पर वहाँ से केवल रोने की आवाज ही सुनाई दे रही थी ….पर वो आवाज भी अब बन्द हो गयी ।
ब्राह्मण की कुटिया के भीतर बाणों को हटाते हुए अर्जुन जैसे ही गए ……
ब्राह्मण रो रहे हैं ……ब्राह्मणी मूर्छित हो गयीं हैं ।
बालक कहाँ है ? अर्जुन ने पूछा ।
तुम्हारे कारण इस बार तो हम बालक का मुख भी न देख सके ……..
धिक्कार है तुम्हें अर्जुन ! …….धिक्कार है तुम्हारे गाण्डीव को ।
ब्राह्मण भरे समाज में अर्जुन को बोल रहा था ।
अर्जुन ने इधर देखा न उधर वो सीधे गया यमराज के पास ……
“द्वारिका पृथ्वी की वैकुण्ठ है …वहाँ के वासी को हम छू भी नही सकते” ।
यमराज ने दो टूक कह दिया था ।
सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने कहा – अर्जुन ! ये बालक तो मेरी सृष्टि का ही नही है ।
अब जब ब्रह्मा की सृष्टि का ही नही है बालक ….तो फिर इधर उधर भटकने से क्या होगा ।
लौट आए अर्जुन …….समुद्र के किनारे चिता बनाई ….द्वारिका के सब लोग जुटने लगे …”अर्जुन चिता में कूद कर मर रहा है”…….लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी देखने ।
नाथ ! अर्जुन मर रहा है ……..रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को सूचना दी ।
सभी मर रहे हैं …..यहाँ अमर कौन है देवी ! श्रीकृष्ण सहज ही बने रहे ।
वो सच में चिता में कूदकर अपने प्राणों को त्याग रहा है ।
रुक्मणी ने फिर कहा ।
तुम जा रही हो वहाँ ?
हाँ , रुक्मणी बोलीं ।
चलो , हम भी देखते हैं , अर्जुन मरता कैसे है , देखते हैं ।
रुक्मणी को आश्चर्य हुआ …..ये एकाएक अर्जुन के प्रति इतने कठोर क्यों हो गए ।
सागर किनारे सब लोग पहुँचे हैं …..अर्जुन ने चिता तैयार की ….उसमें अग्नि प्रज्वलित ……
सामने से आरहे हैं – पीताम्बर धारी श्री कृष्ण , मुस्कुराते हुए आ रहे हैं ।
अर्जुन ने गले लगना चाहा….पर श्रीकृष्ण अर्जुन के गले नही लगे …बस मुस्कुराते हुए बोले …
ये सब क्या कर रहे हो ? किसी के साथ “सती” होने जा रहे हो ? ….ओह …नही नही, रुक्मणी ! सती तो स्त्री , जब पति मरता है तब होती है ना , किन्तु तुम तो पुरुष हो ….”सता” होना तुम ।
ये कहते हुए अट्टहास किया श्रीकृष्ण ने ।
आपको विनोद सूझ रहा है ……….मैं मरने जा रहा हूँ ……अर्जुन बोला ।
विजय ! ये याद रखो ….मनुष्य क्या ..देवों का क्या …बड़े बड़े सिद्धों का अहंकार यहाँ नही टिकता फिर तुम क्या हो ?
“अहंकार ही अस्तित्व का भोजन है” …मैंने तुम्हें कहा था ….मेरा भोजन तुम्हारा अहंकार है ……पर तुम तो ….हंसे श्रीकृष्ण…
“मैं अर्जुन हूँ ….मैं अर्जुन हूँ” और बोलो ……
अर्जुन समझ गया था कि मेरे अहंकार को ही मिटाने के लिए ।
तभी हाथ पकड़ा श्रीकृष्ण ने अर्जुन का …..और अपने रथ में बिठाया ….आज सारथी दारुक नही है….अर्जुन को सारथी बनाकर कहा ……पार्थ ! हांको रथ …….रथ की लगाम खींचते ही , अश्व तो दौड़ पड़े थे ……………
शेष चरित्र कल –


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