श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “परमधाम गमन की भूमिका”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 84 !!
भाग 2
चिन्ता मत करो…..कुछ नही होगा ……मैं नही कहूँगा वासुदेव से …..उग्रसेन ने ये कहकर कुछ निश्चिन्तता प्रदान की थी कुमारों को ।
चले गए समुद्र के किनारे ये लोग ….और वहाँ जाकर पहले तो लौह के उस मुशल बन चुके पिण्ड को काटने लगे थे ……दो लोग काट रहे थे ….और चार लोग मिलकर उसे चूर्ण बनाने का कार्य करने लगे थे ।
चूर्ण बनता जा रहा था ……उसको कुमार लोग समुद्र में डालने का कार्य करते जा रहे थे ।
पर इस और इन्होंने ध्यान ही नही दिया की चूर्ण को तो समुद्र वापस किनारे में फेंक रहा है !
उन्हें बस चूर्ण बनाना था ……..बाकी उनकी मति मूढ़ हो चुकी थी ।
दो घड़ी लगी थी इन कार्यों में ………….
“भगवान द्वारिकाधीश की जय हो”
उसी समय महायज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण का आगमन हुआ …..जयजयकार चारों ओर हो रहा था ……जय घोष इन सब कुमारों ने भी सुना …..पूरा लौह पिण्ड घिस का बहा चुके थे ये सब लोग ……..बस एक नुकीला टुकड़ा बच गया ……”इसको ऐसे ही फेंक दो ….भगवत् श्री आरहे हैं यज्ञ में ….हमें वहाँ उपस्थित होना ही पड़ेगा ……नही तो वो समझ ना जाएँ कि हमसे क्या अपराध बन गया है” ।
लौहकारों को कुमारों की आज्ञा माननी ही थी …….उस नुकीले टुकड़े को समुद्र में ऐसे ही फेंक दिया …….और वो सब वहाँ से यज्ञ क्षेत्र की और भाग गए …..क्यो भगवान श्रीकृष्ण वहाँ पधार चुके थे ।
समुद्र लेता कहाँ है ….उसे तो सनक है कि उसे जो दो वो किनारे में फेंक देता है ……
समुद्र वही कर रहा था ….लौह चूर्ण किनारे में इकत्रित हो रहा था ..और समय के साथ “एरका” नामक नुकीला वनस्पति बन कर किनारे में उगने भी लगा था ।
और वो लौह का बचा हुआ जो नुकीला टुकड़ा था ……वो समुद्र के अतल में चला गया ….वहाँ एक विशाल मत्स्य …उसने उस टुकड़े को निगल लिया ।
यज्ञ पूर्ण हुआ ….उस तट से सब विदा हुए तब मछुआरों का झुण्ड आया। नौका में बैठकर ये लोग मत्स्य पड़ने लगे ही थे कि …उसी समय जाल में वही विशाल मत्स्य आ फँसा था ।
विशाल इतना था की जैसे तैसे वो लोग हाट में उस मत्स्य को ले आए थे और उसे काटा ….”ये क्या है “ प्रसिद्ध “जरा” नामक व्याध वहाँ आपहुँचा ….आज मत्स्य ही लेने ये चला आया था हाट में …
आज इसे कोई शिकार मिला नही तो मत्स्य से ही भोजन करूँगा ये विचार करके ही ये आया था …..पर इसने देखा मत्स्य के उदर से एक लौह का टुकड़ा ! आगे बढ़कर उसने उस टुकड़े को देखा ….ये प्रसिद्ध व्याध था ….”जरा” इसका नाम था…..लोग इसे जानते थे ।
ये मुझे दे दो ……..टुकड़े को पकड़ कर उसके नुकीले पन को उसने छुआ था ….मात्र छूने से ही उसकी उँगली कट गयी ….पर इस बात से वो बहुत खुश हुआ …..इसे मैं अपने बाण में लगाऊँगा ……और एक ही बार में मेरा शिकार ……….
व्याध बहुत प्रसन्न हो उठा ……..उन मछुआरों को उस टुकड़े से क्या लेना देना था …..उन सबने जरा व्याध को वो टुकड़ा दे दिया ………
तात ! अपने घर में आकर उस व्याध ने उस नुकीले टुकड़े को अपने बाण में लगा लिया ….
वो बहुत प्रसन्न था ….अब मेरा शिकार मुझ से बच नही सकता ……
काँपते हुए उद्धव बोले ….तात ! यही बाण मेरे नाथ के अत्यन्त कोमल चरणों में लगे थे ।
ये कहते हुए रो उठे उद्धव ….कुछ देर तक वो बोल नही पाए ….फिर अवरुद्ध कण्ठ से उद्धव ने कहा …….तात ! अपने परमधाम गमन की भूमिका मेरे भगवान ने बना ली थी ….इसके आगे उद्धव मौन हो गए ….और कुछ देर के लिए अपने नेत्र बन्द कर लिए ।
शेष चरित्र कल –


Author: admin
Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877