श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “उद्धव गीता – “अपना उद्धार करो” , उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 88 !!
भाग 2
पशु , पेट भरने के बाद वो खाने की लालसा नही करता ….न वो कल के खाने की चिन्ता में भटकता है …आज पेट भर गया …कल का कल ……किन्तु मनुष्य ! पेट भरने के बाद भी वो और खाता है …..फिर अस्वस्थ होकर पड़ा रहता है ।
निद्रा , नींद जब आती है तो पशु सो जाता है ….वो करवट बदलते नही देखा गया…न वो तनाव ग्रस्त रहता है ….नींद पूरी कर लेता है । किन्तु मनुष्य !
भय , बिना मतलब के मनुष्य ही भय के साथ जीता है …अज्ञात भय …उद्धव ! जिसका कोई अर्थ नही ….येसा भय …..कल को पैसा नही होगा तो क्या होगा …..अरे ! कल को तुम ही नही रहोगे ….ये क्यो भूल जाते हो ।
उद्धव ! संतानोत्पत्ति , भोग विलास इन सबके लिए पशुओं का समय निर्धारित है … उनका काल समय है भोग का भी …किन्तु मनुष्य का ? भगवान श्रीकृष्ण बोले जा रहे थे ।
मनुष्य के पास ये तीन शक्तियाँ हैं ….जो मनुष्य को मनुष्य बनाती हैं …..उद्धव सुनो !
पहली क्रियाशक्ति ….जो शरीर के द्वारा होती है …..इसको हमारे मनीषी क्रिया योग कहते हैं । दूसरी शक्ति है …..विचार शक्ति ….जो बुद्धि के माध्यम से हम ज्ञान का मार्ग चुन सकते हैं …और तीसरी शक्ति हैं …भावना शक्ति …जिसका केंद्र है हृदय …..इसके माध्यम से हम भक्ति – प्रेम का मार्ग चुन सकते हैं ।
उद्धव ! ये तीन शक्तियाँ मनुष्य को ही प्राप्त हैं ….क्रिया शक्ति, विचार शक्ति और भावना शक्ति …कर्मयोग, ज्ञान योग और भक्ति योग । इनमे से मनुष्य जिसको चाहे उसे चुन ले …और मुक्त हो जाए ।
हे भगवन ! आप बताइए …..इन तीनों में से सरल और श्रेष्ठ कौन सा मार्ग है ……
उद्धव ! भक्ति ….ये सबसे सरल और सुगम है ……..मुझे ही समस्त में देखते हुये ….उद्धव ! समस्त में ….भगवान फिर बोले – मनुष्य जीवन को व्यर्थ न जाने दें …..अन्यथा पछताना पड़ेगा ।
भगवान श्रीकृष्ण इसके बाद मुझे बड़े प्रेम से देखने लगे थे ….मैं उस समय निहाल हो गया था ।
शेष चरित्र कल


Author: admin
Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877