श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! व्याध ने जब बाण मारा – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 93 !!
भाग 1
युद्ध यदुवंशियों का प्रारम्भ हुआ था प्रातः से ही । दोपहर तक शस्त्र से युद्ध करते रहे पर शस्त्र जब समाप्त हो गए तो ये लोग समुद्र के किनारे आगये थे ….वहाँ तीखे नुकीले समुद्री घास से युद्ध चलता रहा …भगवान बलराम जी ने रोकना चाहा तो उन्हें भी मारने का प्रयास किया ….बलराम जी समझ गए कि भगवान श्रीकृष्ण के लीला संवरण का समय आगया है …अवतार के परिकरों को पूर्व ही धाम में जाना है….इसलिए बलभद्र जी भगवान श्रीकृष्ण से पूर्व ही चले गए थे …ये तो शेष नाग के अवतार जो थे …भगवान की शैया यही तो हैं ।
लाखों यदुवंशी शाम होते होते समाप्त हो गए ..चार पाँच ही बचे होंगे …बाक़ी कोई नही बचा था । उद्धव विदुर जी को कहते हैं …..भगवान श्रीकृष्ण अब उस क्षेत्र को छोड़कर वन की ओर चल दिए …..समुद्र के किनारे से कुछ दूरी पर था वन । वहीं एक विशाल प्राचीन पीपल का वृक्ष था ….भगवान श्रीकृष्ण शान्त भाव से वहीं जाकर विराजमान हो गए ।
उनके मुखारविंद में गहन शान्ति दिखाई दे रही थी …..वो पीपल वृक्ष से टिक कर बैठ गए थे ….पर कुछ देर बाद ही उन्होंने अपने दोनों चरणों को फैला लिया था ……कुछ देर इसी मुद्रा में ही रहे फिर एक चरण को दूसरे पर रख लिया …..शान्त , पूर्ण शान्त थे भगवान श्रीकृष्ण ।
वो जरा व्याध,
दो दिनों से उसे कोई शिकार मिला नही था ….इस बात से ये बहुत दुखी और परेशान था ।
“ये यदुवंशी यहाँ भी आगये”…..वो व्याध चिढ़ता था यादवों से ।
ये लोग सत्ता और सम्पत्ति के मद में अन्धे हो गए हैं ….ओह ! ये लोग अब आपस में लड़ कर मर रहे हैं …..व्याध ने जब देखा कि उसके क्षेत्र में आकर रक्त पात कर रहे थे यदुवंशी ….तब ये और चिढ़ उठा था ….”मरना था तो अपने ही द्वारिका में मरते …..अब तो मृग कहाँ मिलेंगे …भाग गए होंगे इन यादवों के युद्ध से …आज भी मेरे परिवार को आहार नही मिलेगा”…..वो दुखी होता हुआ व्याध वन की ओर चला गया था ….
“भगवान श्रीकृष्ण वो तो करुणानिधान हैं…..उनको कितना कष्ट होगा ये सब देखकर” ।
वो व्याध यही सब सोचता हुआ यादवों के कृत्य से दुखी होता हुआ जा रहा था ……और सबसे बड़ा दुःख तो इसका ये की …..शिकार नही मिला ….
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –


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