श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! विदा – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम 94 !!
भाग 2
अर्जुन ! मेरे प्रिय पार्थ !
भगवान ने अब अर्जुन को अपने पास बुलाया ।
हे भगवन् ! मैं अब क्या करूं …मेरे लिए क्या आज्ञा है ?
अर्जुन ने भी आकर भगवान के चरण पकड़ लिए ।
तुम मेरी समस्त रानियों को लेकर वृन्दावन जाओ ।
अर्जुन सिर झुकाकर अश्रु बहाते रहा ।
मैं तुम्हे पहले भी कह रहा था वृन्दावन की भूमि उन्हें शांति प्रदान करेगी ….. हे अर्जुन ! मेरी ये कृष्ण लीला जो अवतार काल की है वो अब यहीं विश्राम ले रही है ….तुम जाओ ।
मेरे इस धरा को छोड़ते ही द्वारिका समुद्र में समा जायेगी ….
रूक्मणी आदि मेरे साथ ही जाएंगी …..किंतु अन्य जो रानियां हैं उन्हे तुम ले जाना वृन्दावन ।
वैसे वृन्दावन में अब कोई नही है … वृन्दावन का .मेरा पूरा परिकर गोलोक धाम में जा चुका है ….. किन्तु महर्षि शंडिल्य तुम को मिलेंगे उनसे मेरी रानियों को मिला देना …..उन्हे शांति मिलेगी…..मेरी यमुना भी उन्हें संभाल लेगी ।
जाओ अर्जुन ! अब तुम भी जाओ ।
आह , क्या बीत रही होगी उस समय अर्जुन के हृदय में ।
किंतु भगवान की आज्ञा ….अर्जुन को माननी ही पड़ी वो उठा और वहां से चल दिया जहां भगवान की रानियां बैठी थीं ।
ओह ! मेरे उद्धव !
मुझे देखा मेरे भगवान ने तात ! उद्धव ने विदुर को कहा ।
तुम अब जाओ ……तुम समझ ही गए होगे ….. मैं अपने गोलोक में जा रहा हूं ….उद्धव ! बद्रीनाथ में जाकर तुम मेरे द्वारा दिए गए उपदेश का मनन करना …..तुम और मै कोई अलग नही हैं …..ये कहते हुए उद्धव रो रहे थे ….तात ! मैं उठा …तो मुझ से मेरे नाथ बोले ….सुनो उद्धव ! मेरा ये उपदेश मेरे प्रिय काका विदुर को अवश्य सुनाना ।
तात ! आप कितने भाग्यशाली हैं अंतिम समय आपको भगवान ने याद किया ….उद्धव के मुख से ये सुनते ही विदुर जी हिलकियों से रो पड़े थे ।
वो बस रोते ही जा रहे थे ……
तात ! मैं उठा …मैने भगवान श्रीकृष्ण की चार परिक्रमा की , उनके चरणो में लेट गया ….कुछ देर के लिए मैं शून्य हो गया था …..मेरे सिर में उन कमल नयन ने अपने सुकोमल कर रख दिए ….. मैं उठा और जब चलने लगा तब एक बार उन्होंने फिर कहा …तुम मेरे विदुर काका से छोटे हो इसलिए ज्ञान उनको देने के अधिकारी नही हो , उद्धव ! तुम हरिद्वार में विराजमान मैत्रेय ऋषि के पास उनको भेज देना वो द्वेपायन व्यास के मित्र हैं वो उन्हे ज्ञान देंगे ….जाओ अब उद्धव , जाओ । भगवान ने मुझे जब फिर कहा तो एक बार और उनके मुखारविंद को मै देखता रहा ….उनके चरणो को देखा व्याध के बाण के चिन्ह अभी भी उनके चरणो में थे …
उन करुणा निधान को अपने हृदय में बसा कर मैं निकल गया ।
इतना कहकर उद्धव रोने लगे ….विदुर जी ने उठकर उद्धव को अपने हृदय से लगा लिया था ….विदुर जी के अश्रुओ से उद्धव का मस्तक भींग गया था ।
शेष चरित्र कल


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