श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 95 !!
भाग 1
साधकों ! कल रात्रि में प्रभास क्षेत्र ( भालका तीर्थ , जहाँ से भगवान श्रीकृष्ण स्वधाम गए थे )….अपने साधकों के साथ मैं वहाँ गया …रात्रि के करीब आठ बज रहे होंगे , उस पीपल वृक्ष के भी दर्शन किए ….ध्यान लगाकर हम लोग बैठ गए थे …बहुत रोना आया …..मेरे श्रीकृष्ण यहाँ से स्वधाम गए ! इसी पीपल वृक्ष के नीचे विराजे थे और उन कोमल चरणों में व्याध ने बाण मार दिया ! …कोमल चरण ! इतने कोमल की – महारानी रुक्मणी भी जब इन चरणों की सेवा करती थीं तो डर जाती थीं …महारानी रुक्मणी को अपने “कर”कठोर लगते थे और श्रीकृष्ण के चरण अत्यन्त कोमल ! इन्हीं सब भावनाओं के साथ बड़ा रोना आया । इच्छा थी जो राजाधिराज ने पूरी की ….इच्छा थी द्वारिका में ही बैठ कर प्रभास क्षेत्र में ही जाकर समुद्र के तट पर श्रीकृष्णचरितामृतम् के इस अन्तिम अध्याय को लिखूँ …राजाधिराज ने मेरी इस इच्छा को पूर्ण किया ।
मेरी गौरांगी से बात हुई मैं बहुत भावुक हो गया था …..इन बातों का जब मैंने उल्लेख किया तो वो बड़े प्यार से बोली – श्रीधाम वृन्दावन का नाम लेकर वो वहाँ रोते रहते हैं …फिर क्यो नही इच्छा पूर्ण करेंगे हरि जी वे अपने श्रीधाम वृन्दावन वालों की । बात तो सही है …..ये ठसक अच्छी है …..फिर भी कहूँ – धन्यवाद राजाधिराज …आपने मेरी भावनाओं का इतना ध्यान रखा ।
हरिशरण
नभ में विमान छा गए थे ….देवता समस्त अपने अपने विमानों में बैठ कर आगये थे ।
देवराज अपने ऐहरावत हाथी में बैठे थे …..तो उसी समय हंसारूढ़ होकर सृष्टिकर्ता भी इन सोलह कला पूर्ण श्रीकृष्णचन्द्र जू के स्वधाम गमन की लीला का दर्शन करने अपूर्व उत्साह के साथ उपस्थित हो गए थे । पर पीछे से वृषभारूढ़ भगवान शंकर भी उमा के साथ आकर बड़ी उत्सुकता से नीचे देखने लगे थे । ये स्वधाम कैसे जाएँगे पूर्णपुरुषोत्तम , क्यो की इनका वपु कोई पंचतत्व से निर्मित तो है नही …न इनका वपु स्थूल और सूक्ष्म है ..इसलिए इनका देह छूटेगा और चेतन रूप धाम में जाएगा ….येसा कहना भी पाप है ……उद्धव बोले थे विदुर जी को ……हमारी तरह थोड़े ही है भगवान का देह …..वो तो चिन्मय है ।
सबको ये लीला देखनी थी …..तभी गंधर्वों ने नाना प्रकार के वाद्य बजाने शुरू कर दिए ।
अप्सराएँ नृत्य कर रहीं थीं …..ऋषियों ने मन्त्रों का सस्वर गान आरम्भ कर दिया था ….अन्य वरुण कुबेर आदि ने पुष्प बरसाना प्रारम्भ कर दिया था ….नारद जी वीणा लेकर भगवान श्रीकृष्ण के लीला का गान कर रहे थे ….चारों ओर से भगवान श्रीकृष्ण के मंगलमय नामों का गान हो रहा था ।
ये कैसे जाएँगे स्वधाम …..ये रहस्य था ……इसी रहस्य को जानने के लिए तो ब्रह्मा शिव इंद्रादी और समस्त ऋषि आज यहाँ उपस्थित थे ।
स्वर्ग , सत्य लोक होते हुए जाएँगे या सीधे जाएँगे स्वधाम ?
देवराज का प्रश्न था ब्रह्मा जी से ।
किन्तु ब्रह्मा जी को तो इन्होंने मोहित कर दिया था वृन्दावन में …इसलिए ये कुछ बोल न सके थे ।
भगवान शंकर का कहना था …स्वधाम कहाँ ? क्या बैकुण्ठ ? या गोलोक या कुँज या निकुँज ?
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –


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