!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 6 !!
बरसानें ते टीको आयो…..
भाग 3
अरे ! क्या देख रहे हो ……..जाओ ! पूरे बरसानें में ये बात फैला दो कि ……..हम सब “टीका” लेकर जा रहे हैं गोकुल …….बृषभान नें आनन्द की अतिरेकता में ये बात कही ।
टीका लेकर ? यानि सगाई ?
गांव वालों नें पूछना शुरू किया ।
हाँ अभी से मैं कह रहा हूँ …….नन्द राय के पुत्र हुआ है ……अब मेरी पुत्री होगी……ये पक्का है……इसलिये टीका अभी ही जाना चाहिये हमारी तरफ से…..हम लड़की वाले हैं । बृषभान के आनन्द की कोई थाह नही है आज ।
हाँ ……सब सजो ……..सब बरसानें की सखियाँ सजें ………और टीका लेकर हम सब बरसानें से नाचते गाते हुए गोकुल में चलें ।
पूरे बरसानें में ये बात फैला दी गयी …………
सुन्दर से सुन्दर श्रृंगार किया सखियों नें ……हे वज्रनाभ ! बरसानें की सखियाँ तो वैसे ही स्वर्ग की अप्सराओं को अपनी सुन्दरता से चिढ़ाती रहती थीं ……….
पर आज जब सजनें की बारी आयी …….और स्वयं उनके महीपति बृषभान नें आज्ञा दी तब तो उर्वसी और मेनका भी इनकी दासी लग रही थीं ……………
हाथों में सुवर्ण की थाल सजाये …….मोतियों की सुन्दरतम पच्चीकारी चूनर ओढ़े……….घेरदार लंहगा पहनें …।
और नाचते गाते हुए सब चलीं गोकुल की ओर……..कीर्तिरानी नही जा पाईँ ……क्यों की वो गर्भवती थीं…….पर बरसानें के अधिपति बृषभान सुन्दर पगड़ी बाँधे …..चाँदी की छड़ी लिए……आगे आगे चल रहे थे ।
हे वज्रनाभ ! आनन्द का ज्वार ही मानों उमड़ पड़ा गोकुल में ।
बृजपति नन्द के द्वारे कौन नही खड़ा था आज ………मैं देख रहा था सब को ……देवता भी ग्वाल बाल बनकर घूम रहे थे……..देवियों नें रूप धारण किया था गोपियों का ………..पर कहाँ गोपियों का प्रेमपूर्ण सौन्दर्य ……..और कहाँ ये देवियाँ ?
प्रकृति आनन्दित थी ……सब आनन्दित थे…..चारों दिशाएँ प्रसन्न थीं …….पर मैने देखा ……..बृजपति का ध्यान तो अपनें मित्र बृषभान की ओर ही था ……..वो बरसानें वाले मार्ग को ही देखे जा रहे थे ।
मैनें उनसे पूछा भी …….क्या देख रहे हैं बृजपति उस तरफ ?
पता नही मित्र बृषभान अभी तक क्यों नही आये ?
आएंगे ! उनके आये बिना सब कुछ अधूरा है ……..क्यों की इस अवतार को पूर्णता तो उन्हीं से मिलेगी ना !
क्या मतलब गुरुदेव ? मैं समझा नही ।
नही …..कुछ नही बृजपति नन्द ! …………..
तभी सामनें से बृज रज उड़ती हुयी दिखाई दी ………….आवाज आरही थी ……..बड़ी सुमधुर और प्रेमपूर्ण ……..हजारों बरसानें की गोपियाँ एक साथ गाती हुयी चली आरही थीं ………
बृजपति देखिये ! आगये आपके मित्र बृषभान……..और लगता है पुरे बरसानें को ही ले आये हैं …..मैने हँसते हुए बृजपति को बताया था ।
एक ही रँग के सबके वस्त्र थे …………पीले पीले वस्त्र ………सोलह श्रृंगार पूरा था उन सब सखियों का ………….उनका गायन ऐसा लग रहा था जैसे सरस्वती की वीणा झंकृत हो रही हो …….आहा !
बधाई हो मित्र ! बधाई हो !
दूर से ही दौड़ पड़े थे बरसानें के अधिपति बृषभान ।
इधर से बृजपति दौड़े ………………
हे वज्रनाभ ! मैं उस समय भूल गया ……कि मैं तो इनका पुरोहित हूँ, गुरु हूँ ………..पर ……….हँसते हुए बोले महर्षि शाण्डिल्य ………मैं इस लाभ से वंचित नही होना चाहता था ….ये दोनों इतनें महान थे ……..कि एक की गोद में ब्रह्म खेलनें वाला था और एक की गोद में आल्हादिनी शक्ति खेलनें वाली थी ।
दोनों गले मिले ………….मुझे देखा तो मेरी भी पद वन्दना की बृषभान नें …………..फिर मेरी ओर ही देखते हुए बोले…….आज गुरुदेव को मेरी एक सहायता करनी पड़ेगी ……..
मैं ? मैं क्या कर सकता हूँ ?
मैने हँसते हुए पूछा ।
आपको, आज हमारे सम्बन्ध को और प्रगाढ़ बनाना होगा ।
पुण्यश्लोक बृषभान ! मैं समझा नही ।
गुरुदेव ! आप ही ये कार्य कीजिये ……….हम दोनों को समधी बना दीजिये ………..बृषभान नें हाथ जोड़कर कहा ।
हँसे बृजपति नन्द , खूब हँसें …….मैं भी हँसा ………….
बृजपति नें हँसते हुए कहा ……..पर आपकी पुत्री कहाँ है ?
आपकी भाभी गर्भवती है ……….और लक्षणों से स्पष्ट है की गर्भ में पुत्री ही आई है………..चहकते हुए ये बात बृषभान कह रहे थे ।
मैं गम्भीर हो गया …………मेरे मुख से निकला ……..नन्द नन्दन और भानु दुलारी तो अनादि दम्पति हैं …………..वो आये ही इसलिये हैं कि जगत को प्रेम का सन्देश दे सकें ……..विमल प्रेम क्या होता है ……विशुद्ध प्रेम की परिभाषा क्या होती है ………यही बतानें के लिये ये दोनों आये हैं ।
हे वज्रनाभ ! ये सब कहते हुए मेरा मुखमण्डल दिव्य तेज से भर गया था …….मेरी बात सुनते ही स्तब्ध से हो गए थे दोनों ही ।
फिर कुछ देर बाद यही बोले दोनों ……….गुरुदेव ! हम ग्वाले हैं …….आपकी इन गूढ़ बातों को हम नही समझ रहे …….पर हाँ … इतना हमनें समझ लिया है कि……..हमें ये सम्बन्ध बना ही लेना चाहिए ।
बृजपति नन्द की बातें सुनकर बृषभान आनन्दित हो , गले मिले ।
नगाड़े बज उठे बरसानें वालों के ………सब सखियाँ नाच उठीं ………अबीर गुलाल ये सब आकाश में उड़नें लगे ……….
और बरसानें वाली सब सखियाँ तो गा रही थीं ………..
“नन्द महल में लाला जायो, बरसानें ते टीको आयो”
हे वज्रनाभ ! मैं इतना आनन्दित था जिसका मैं वर्णन नही कर सकता ।
शेष चरित्र कल –
