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August 30, 2025 10:29 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 7 !!-श्रीराधारानी का प्राकट्य-भाग 1 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 7 !!-श्रीराधारानी का प्राकट्य-भाग 1 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 7 !!

श्रीराधारानी का प्राकट्य

भाग 1

जय हो प्रेम की …….जय हो इस अनिर्वचनीय प्रेम की ………आहा ! जिसे पाकर सचमुच कुछ और पानें की इच्छा ही नही रह जाती ।

जिस प्रेम से सदा के लिये कामनाएं नष्ट हो जाती हैं…………..उस प्रेम की जय हो ।

जिस प्रेम से ये जगत पावन हो जाता है ………ये पृथ्वी धन्य हो जाती है ………उस प्रेम का वर्णन कौन कर सकता है ।

ईश्वर है प्रेम ?

नही ये कहना भी पूर्ण सत्य नही है ………….प्रेम ईश्वर का भी ईश्वर है ……जय हो ….जय हो प्रेम की ।

जिसकी दृष्टि में प्रेम उतर आता है …….उसे चारों ओर प्रेम की सृष्टि ही तो दिखाई देती है ………राग, द्वेष अहंकार इन सबको मिटानें में योगी एवम् ज्ञानीयों को कितनें परिश्रम करनें पड़ते हैं ……….बारबार उस बदमाश मन को ही साधनें का असफल प्रयास ही करता रहता है साधक ….पर कुछ नही हो पाता ……….मन वैसा ही है ……..।

पर प्रेम के आते ही ……..प्रेम के जीवन में उतरते ही……..राग, द्वेष ईर्श्या अहंकार सब ऐसे गायब हो जाते हैं …..जैसे बाज़ पक्षी को आकाश में देखते ही सामान्य पक्षी कहाँ चले जाते हैं पता ही नही ।

तो अपना सच में कल्याण चाहनें वालों ……क्यों नही प्रेम करते ?

क्यों इधर उधर भटकते रहते हो ………क्यों प्रतिस्पर्धा और महत्वाकांक्षा की अग्नि में झुलसते रहते हो……क्यों कभी ज्ञान मार्ग तो कभी योग मार्ग के चक्कर लगाते रहते हो ……..प्रेम के मार्ग में क्यों नही आते …….कितनी शीतलता है यहाँ …….देखो ! इस प्रेम सरोवर को …..कितना शीतल जल है इसका ……क्यों नही इसमें गोता लगाते ?

प्रेम प्रेम प्रेम ………..निःश्वार्थ प्रेम के प्रचारक …..प्रेमाभक्ति के आचार्य जिन्होनें “शाण्डिल्य भक्ति सूत्र” की रचना कर जगत का कितना उपकार किया है ऐसे महर्षि शाण्डिल्य आज गदगद् हैं ……..और गदगद् क्यों न हों ……….वो जिस प्रेम की चर्चा युगों से कर रहे हैं ……..उसी प्रेम का अवतरण आज होनें वाला है ……..यानि प्रेम आकार लेगा ।

वज्रनाभ आँखें बन्द करके बैठे हैं ……….भूमि बरसानें की है ……प्रेम कथा “श्रीराधाचरित्र” को सुनते हुये वज्रनाभ को रोमांच हो रहा है …….उनके नेत्रों से अश्रु बहते जा रहे हैं ……..ये हैं श्रोता ।

और कहनें वाले वक्ता महर्षि शाण्डिल्य…….ये तो थोडा ही बोलते हैं …….फिर इनकी वाणी ही अवरुद्ध हो जाती है …….आँखें चढ़ जाती हैं ……….साँसें तेज गति से चलनें लगती हैं……..रोमांच के कारण शरीर में सात्विक भाव का प्राकट्य शुरू हो जाता है ……..।

आल्हादिनी का प्राकट्य होनें को है अब – हे वज्रनाभ !

इतना ही बोल पाये थे महर्षि …….फिर प्रेम समाधि में स्थित ।

पर प्रेम की बातें मात्र सुनी नही जातीं ……उसे तो अनुभव किया जाता है …इस बात को वज्रनाभ समझ गए हैं ……………इसलिये वो भी बह जाते हैं ……डूब जाते हैं ………..डूबते तो महर्षि ज्यादा हैं ……..और कभी कभी चिल्ला भी उठते हैं …….”आगे “श्रीराधाचरित्र” को सुनना है तो हे वज्रनाभ ! मुझे बचाओ ……….मुझे निकालो इस “अथाह प्रेमसागर” से …….नही तो हो सकता है मेरी हजारों वर्ष की समाधि लग जाए ………….।

हाँ …….ये है ही ऐसा चरित्र ! प्रेम चरित्र !

श्याम सुन्दर का प्रेम अब आकार लेकर प्रकट होनें को है ………..

महर्षि शाण्डिल्य नें सावधान किया अपनें श्रोता वज्रनाभ को …….और फिर कथा सुनानें लगे ……………


कीर्तिरानी ! मैने आज एक सपना देखा……बड़ा विचित्र सपना था……..मेरा सपना सच होता है ……….इसलिये मैं उस सपनें के बारे में विचार कर रहा हूँ ……और तुम्हे बता रहा हूँ ।

उस दिन बृषभान नें अपनी पत्नी कीर्ति को अपना सपना सुनाया …।

क्या सपना था आपका ? कीर्तिरानी नें पूछा ।

मैं भास्कर हूँ ……..मैं सूर्य हूँ ……….और मेरे सामनें सब देव खड़े हैं ………….वो सब मुझ से कह रहे हैं ……..चन्द्रमा के वंश में भगवान अवतार लेकर आगये ………पर तुम्हारे वंश में तो ………!

मेरी कोई स्पर्धा नही है चन्द्रमा से……पर मेरे यहाँ तो साक्षात् आद्यशक्ति, आल्हादिनी शक्ति अवतरित होनें वाली हैं …..मैनें कहा ।

मेरी बात को सुनकर सब चुप हो गए……….पर मैने देखा मेरा पुत्र शनिदेव जिसकी मेरे से कभी बनी नही …….वो मेरी ये बातें सुनकर मेरे पास आया ……..और बस इतना ही पूछा उसनें …..कहाँ पर प्रकट होनें वालीं हैं मेरी बहन ?

मैने स्पष्ट कहा …..शनिदेव से , बृज में, बृहत्सानुपुर में (बरसाना) ।

बस इतना सुनते ही वो वहाँ से चला गया ………और यहीं बरसानें में ही आकर रहनें लगा ……..और तो और ………इस भूमि में उसनें मणि माणिक्य सुवर्ण ये सब पृथ्वी से प्रकट कर दिए ।

मैने देखा सपनें में कीर्तिरानी ! …..लोग जहाँ से धरती खोद रहे हैं …..वहीं से सोना रजत मणि इत्यादि प्रकट हो रहे हैं …………।

हे कीर्तिरानी ! मैं सपनें से जाग गया था ये सब देखते हुए …….मेरी नींद खुल गयी थी ……….मैं तुम्हारे पास आया …….तो क्या देखता हूँ मैं ……….तुम दिव्य तेज़ से आलोकित हो रही हो ………..तुम एक प्रकाश का पुञ्ज लग रही हो ……..और ये देखो ! तुम्ही देखो ……तुम्हारे उदर में ……..ऐसा प्रतीत हो रहा है कि …….भास्कर ही आगये हैं …….कितना तेज़ है ।

क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –

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